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MP News: बैगा आदिवासी बच्चों की मौत का जिम्मेदार है स्वास्थ्य विभाग, टीकाकरण और निगरानी की कमी

भास्कर ब्यूरो, भोपाल। मप्र के बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी बच्चों की मौत मीजल्स, मलेरिया के साथ गंभीर कुपोषण के चलते हुई है। बच्चों की मौत और रैश-बुखार को लेकर राष्ट्रीय संयुक्त ऑउटब्रेक रिस्पांस टीम (एनजेओआरटी) की रिपोर्ट में बालाघाट में स्वास्थ्य विभाग में कई कमियां मिलीं। रिपोर्ट के मुताबिक जिन घरों में सर्वे किया गया वहां 20-25 प्रतिशत लोग बेहद कमजोर पाए गए। यानी ये लोग गंभीर कुपोषित स्थिति में मिले।
बिरसा में 357 आंगनवाड़ी केंद्रों में 2589 बच्चे एसएएम और एमएएम श्रेणी में दर्ज थे। इनमें 604 बच्चे सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन (एसएएम) की श्रेणी में थे, जो गंभीर कुपोषण के संकेत हैं। वहीं पोषण ट्रैकर में रजिस्टर जानकारी सही नहीं पाई गई। बच्चों का वजन नियमित नहीं किया जा रहा। जिससे कुपोषण की पहचान ही नहीं हुई। फील्ड वेरिफिकेशन के दौरान पोषण ट्रेकर के लिए गए शारीरिक मापदंड सही नहीं निकले।
पोषण संबंधी जांच में सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन और मॉडरेट एक्यूट मालन्यूट्रिशन (एसएएम) जिले में ज्यादा है। सबसे ज्यादा सोंगडा, डबरी और कचनारी में कुपोषण के मामले मिले। मरने वाले एक बच्चे में गंभीर कुपोषण मिला। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि अगर संक्रमित मामलों का उचित प्रबंधन और नियंत्रण नहीं किया गया तो दूसरे गांवों में भी फेल सकती है।
18 मई से 17 अगस्त के दौरान हुई जांच में ज्यादातर मामले 10 साल से कम बच्चों में मिले। रिपोर्ट के मुताबिक 196 में से इसी आयु वर्ग के मरीज मिले। एनजेओआरटी की जांच में, सर्दी-बुखार, मलेरिया, मुंह में घाव, खसरा ,डेंगू, चिकनगुनिया और एंटरोवायरस पॉजिटिव नमूने मिले।
एमआर टीकाकरण कम हुआ
एनजेओआरटी ने मीजल्स-रूबेला (एमआर)टीकाकरण कवरेज कम मिला। जिसकी वजह से यह स्थिति बनी। मौत के मामले ज्यादातर वहीं आए जहां टीकाकरण कम हुआ। मार्च 2026 तक जिले में एमआर 1 कवरेज 64.8 प्रतिशत और एमआर 2 कवरेज 48 प्रतिशत रहा। यानी आधे बच्चों का भी टीकाकरण नहीं हुआ। वहीं पूर्ण टीकाकरण कवरेज (एफआईसी) 42.2 प्रतिशत ही रहा। प्रभावित क्षेत्र बैहर में एफ़आईसी 60.6 प्रतिशत और बिरसा में 67.4 प्रतिशत ही रहा।
मिली कई खामियां
- एपिडेमियोलॉजिस्ट का पद खाली
- जिले में पब्लिक हेल्थ लेबोरेटरी नहीं है
- जिले में माइक्रोबायोलॉजिस्ट नहीं है
- जिला सर्विलांस यूनिट (डीएसयू) में कर्मचारियों की कमी
- रेफरल सिस्टम बेहद कमजोर मिला
- एएनएम, आशा और एडब्ल्यूडब्ल्यू वर्करों के गांवों में नियमित दौरे नहीं किये
- पोषण ट्रैकर रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर
- निगरानी तंत्र बहुत कमजोर है
- मीजल्स - रूबेला टीकाकरण धीरे होना
- सबसे प्रभावित जिले में नहीं है आशा कार्यकर्ता
- स्वास्थ्य सेवा के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी
- फील्ड गतिविधियों और फॉलोअप का रिकॉर्ड नहीं होना
- कई पदों की मंजूरी के बाद भी खाली होना, वर्तमान कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ
Created On :   26 Sept 2026 12:08 AM IST












