एसजीएसयू में ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गुमनाम जनजातीय नायक: क्षेत्रीय इतिहास का एक पुनर्पाठ’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

क्षेत्रीय इतिहास का एक पुनर्पाठ’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जनजातीय नायकों के योगदान का पुनर्पाठ आवश्यक :- संतोष चौबे

भोपाल। स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय (एसजीएसयू), भोपाल के मानविकी एवं उदार कला संकाय द्वारा आयोजित तथा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर), नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित “भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गुमनाम जनजातीय नायक : क्षेत्रीय इतिहास का एक पुनर्पाठ” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हुआ। संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए इतिहासविदों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने जनजातीय इतिहास, प्रतिरोध, क्षेत्रीय इतिहास और लोक परंपराओं के विविध पक्षों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, आईसेक्ट समूह के अध्यक्ष, कथाकार एवं कवि संतोष चौबे ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को समग्रता से समझने के लिए जनजातीय नायकों के संघर्ष, प्रतिरोध और बलिदान को इतिहास के मुख्य विमर्श में उचित स्थान दिया जाना आवश्यक है। उन्होंने क्षेत्रीय इतिहास के पुनर्पाठ को इतिहास लेखन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताते हुए स्थानीय स्मृतियों, मौखिक परंपराओं और जनकथाओं के दस्तावेजीकरण पर जोर दिया।

एसजीएसयू के कुलाधिपति डॉ. सिद्धार्थ चतुर्वेदी ने कहा कि क्षेत्रीय एवं जनजातीय इतिहास पर केंद्रित ऐसे अकादमिक आयोजन विविध ऐतिहासिक अनुभवों को व्यापक विमर्श से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन शोधार्थियों और शिक्षाविदों को संवाद तथा शोध के लिए सार्थक मंच उपलब्ध कराते हैं।

एसजीएसयू के कुलपति डॉ. विजय सिंह ने कहा कि जनजातीय समुदायों के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को समझने के लिए शोध और अकादमिक संवाद आवश्यक हैं। संगोष्ठी ने शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को जनजातीय प्रतिरोध और क्षेत्रीय इतिहास को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का अवसर दिया।

एसजीएसयू के कुलसचिव डॉ. सीतेश कुमार सिन्हा ने कहा कि इस तरह के अकादमिक आयोजन क्षेत्रीय एवं जनजातीय इतिहास पर शोध, संवाद और ज्ञान-विनिमय को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने विभिन्न संस्थानों के शोधार्थियों एवं शिक्षाविदों को एक मंच पर लाकर विविध ऐतिहासिक स्रोतों, स्थानीय परंपराओं तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों के योगदान को समझने के लिए ऐसे आयोजनों को महत्वपूर्ण बताया।

भोपाल के वरिष्ठ पुरातत्वविद् एवं पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास ने जनजातीय इतिहास से जुड़े पुरातात्विक एवं क्षेत्रीय स्रोतों के संरक्षण तथा उनके वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। क्षेत्रीय इतिहासविद् डॉ. आनंद सिंह राणा ने स्थानीय इतिहास और जनजातीय आंदोलनों को राष्ट्रीय इतिहास की व्यापक धारा से जोड़ने की आवश्यकता रेखांकित की।

सीएसडीएस, नई दिल्ली के प्रो. रविकांत ने कहा कि जनजातीय समुदायों के इतिहास, स्मृतियों और प्रतिरोध की परंपराओं को समझे बिना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता। वर्धा विश्वविद्यालय के गांधी एवं शांति विभाग के अध्यक्ष डॉ. राकेश मिश्रा ने जनजातीय संघर्षों को सामाजिक न्याय, शांति, सांस्कृतिक अस्मिता और समुदायों के अधिकारों के संदर्भ में समझने पर बल दिया।

संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों में जनजातीय प्रतिरोध, स्थानीय ऐतिहासिक स्रोतों, शिक्षा, सामाजिक सरोकारों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए शोधार्थियों और शिक्षाविदों ने जनजातीय इतिहास तथा क्षेत्रीय इतिहास लेखन के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने की। उन्होंने कहा कि जनजातीय इतिहास को केवल लिखित अभिलेखों तक सीमित न रखते हुए स्थानीय स्मृतियों, मौखिक परंपराओं और जनजीवन से जोड़कर समझने की आवश्यकता है। बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रो. अजय घोष ने जनजातीय इतिहास के अध्ययन में अंतर्विषयक शोध दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण बताया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों का संचालन आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. आशी दीक्षित, डॉ. मौसमी परिहार एवं डॉ. आलोक झा ने किया। कार्यक्रम के संयोजक एवं मानविकी एवं उदार कला संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रिंस कुमार सिंह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

दो दिवसीय संगोष्ठी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय नायकों के योगदान, जनजातीय प्रतिरोध, स्थानीय इतिहास, लोक परंपराओं और क्षेत्रीय स्रोतों के महत्व पर सार्थक अकादमिक विमर्श को मंच प्रदान किया।

Created On :   30 Sept 2026 7:29 PM IST

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