बॉम्बे हाई कोर्ट: वृद्ध पिता के अनावश्यक उत्पीड़न के लिए बेटे पर लगाया 5 लाख का जुर्माना, दायर याचिका को किया खारिज

वृद्ध पिता के अनावश्यक उत्पीड़न के लिए बेटे पर लगाया 5 लाख का जुर्माना, दायर याचिका को किया खारिज
  • अदालत ने बेटे की 75 वर्षीय पिता के खिलाफ दायर याचिका को किया खारिज
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 105 के उपयोग पर टिप्पणी
  • किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ चल रहे पारिवारिक मुकदमेबाजी में लाभ प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 105 का उपयोग किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ चल रहे पारिवारिक मुकदमेबाजी में लाभ प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता है। अदालत ने वृद्ध पिता के अनावश्यक उत्पीड़न के लिए बेटे पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है और जुर्माने की रकम पिता को देने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने जितेंद्र गोरख मेघ की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जिस चिकित्सकीय प्रमाणपत्र पर याचिकाकर्ता निर्भर कर रहा था। वह पहले से ही जुलाई 2024 में अभिलेख पर मौजूद था। इसके बावजूद पहले की कार्यवाही में पिता की कथित मानसिक अस्थिरता का मुद्दा नहीं उठाया गया। केवल मधुमेह के कारण होने वाले अस्थायी एवं रक्त-शर्करा सामान्य होने पर समाप्त हो जाने वाले मानसिक लक्षणों को प्रथम दृष्टया अधिनियम के अर्थ में मानसिक बीमारी नहीं माना जा सकता।

पीठ ने इस याचिका को पूर्व आईएएस अधिकारी 75 वर्षीय पिता को अनेक कार्यवाहियों में उलझाकर दबाव डालने और परेशान करने का प्रयास माना और कहा कि यह न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। पीठ ने कहा कि प्रथम न्यायालय के विवेकाधिकार के आदेश में अपीलीय न्यायालय तभी हस्तक्षेप करता है, जब वह आदेश मनमाना, अनुचित, विकृत अथवा स्थापित विधिक सिद्धांतों की अवहेलना करने वाला हो। वर्तमान मामले में एकल न्यायाधीश का आदेश सुविचारित था और उसमें ऐसी कोई त्रुटि नहीं थी।

क्या है पूरा मामला

अंधेरी (प.) के चार बंगला में रहने वाले याचिकाकर्ता जितेंद्र गोरख मेघ ने अपने पिता गोरख गोविंद मेघ के खिलाफ पैतृक संपत्तियों में अपने वैधानिक हिस्से के लिए वर्ष 2015 में विभाजन का मुकदमा दायर किया था। बाद में उन्होंने यह आरोप लगाते हुए याचिका दायर किया कि उनके पिता मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं और इसलिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 105 के अंतर्गत उनका परीक्षण एक स्वतंत्र चिकित्सकीय मंडल से कराया जाना चाहिए। हाई कोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश ने उनकी चिकित्सकीय मंडल से परीक्षण कराने की याचिका अस्वीकार कर दी और माना कि धारा 105 का उद्देश्य मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की सुरक्षा करना है। इसे किसी विरोधी पक्ष द्वारा अपने मुकदमे में लाभ प्राप्त करने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता।

Created On :   27 Aug 2026 9:29 PM IST

Tags

Next Story