एनईपी के छह साल: विश्वविद्यालयों के सामने अब सुधारों को परिणामों में बदलने की चुनौती

विश्वविद्यालयों के सामने अब सुधारों को परिणामों में बदलने की चुनौती

नई दिल्ली। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को लागू हुए छह वर्ष पूरे होने के साथ अब उच्च शिक्षा को लेकर चर्चा केवल नीति के प्रावधानों तक सीमित नहीं रह गई है। फोकस इस बात पर है कि इन सुधारों का वास्तविक असर विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था, विद्यार्थियों के सीखने के अनुभव और उनकी रोजगार क्षमता पर कितना दिखाई दे रहा है।

एनईपी लागू होने के बाद देश के कई विश्वविद्यालयों ने बहुविषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) शिक्षा, लचीले पाठ्यक्रम, कौशल विकास और छात्र-केंद्रित शिक्षण पर जोर बढ़ाया है। हालांकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन बदलावों की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होगा कि क्या वे विद्यार्थियों को बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और भविष्य के कार्यक्षेत्र के लिए बेहतर तरीके से तैयार कर पा रहे हैं।

एमिटी विश्वविद्यालय के चांसलर डॉ. असीम चौहान ने कहा कि एनईपी के तहत परिकल्पित बदलावों को धरातल पर उतारने के लिए संस्थानों को निरंतर और दीर्घकालिक प्रयास करने होंगे।

उन्होंने कहा, "छह वर्षों में एनईपी 2020 ने विश्वविद्यालयों की सोच और उनके लक्ष्यों को बदल दिया है तथा यह आज भी उनके काम करने के तरीके को प्रभावित कर रही है। अब संस्थानों से केवल डिग्री देने की नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की वास्तविक क्षमताओं के विकास की अपेक्षा की जा रही है। यह परिवर्तन एक-एक पाठ्यक्रम और एक-एक शिक्षक के माध्यम से वर्षों में आकार लेता है।"

डॉ. चौहान ने कहा कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार वर्ष 2030 तक नौकरियों के लिए आवश्यक प्रमुख कौशलों का बड़ा हिस्सा बदल जाएगा। उसी समय एनईपी को लागू हुए एक दशक पूरा होगा। उन्होंने कहा कि नीति की सफलता का आकलन इस आधार पर होगा कि विश्वविद्यालय से निकलने वाला विद्यार्थी सही निर्णय लेने, बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने और आजीवन सीखते रहने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि एमिटी विश्वविद्यालय की सभी शैक्षणिक पहलें इसी दृष्टिकोण पर आधारित हैं।

प्रेस्टीज यूनिवर्सिटी, इंदौर के कुलपति प्रो. केयूर पुरानी ने कहा कि केवल नीति के प्रावधानों को लागू कर देना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, असली सवाल यह है कि क्या भारतीय विश्वविद्यालय स्वयं को नई सोच और नई कार्यप्रणाली वाले संस्थानों के रूप में विकसित कर पा रहे हैं।

उन्होंने कहा, "एनईपी का प्रभाव इस बात से नहीं मापा जाएगा कि विश्वविद्यालयों ने उसके कितने प्रावधान लागू किए, बल्कि इस बात से तय होगा कि उन्होंने उसकी भावना को कितनी गंभीरता से अपनाया। वास्तविक परिवर्तन नवाचार से आता है, केवल नियमों के पालन से नहीं। नीतियां संभावनाएं पैदा करती हैं, लेकिन भविष्य का निर्माण संस्थान करते हैं।"

एनईपी की छठी वर्षगांठ के साथ एक बार फिर संस्थागत सुधारों की गति पर ध्यान केंद्रित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक ढांचे में बदलाव के साथ-साथ शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन प्रणाली और शिक्षकों के क्षमता विकास में भी समान रूप से सुधार सुनिश्चित करना होगा।

एनईपी 2020 अब अपने सातवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि क्या उच्च शिक्षण संस्थान संरचनात्मक सुधारों को विद्यार्थियों के बेहतर शैक्षणिक परिणामों, रोजगार क्षमता और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप कौशल विकास में बदलने में सफल हो पाते हैं।

Created On :   29 July 2026 5:43 PM IST

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