बिहार: बिहार के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी अपने नाम करने की भाजपा की दशकों पुरानी ख्वाहिश होगी मुकम्मल

बिहार के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी अपने नाम करने की भाजपा की दशकों पुरानी ख्वाहिश होगी मुकम्मल
  • सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण के साथ ही नई सरकार आकार ले लेगी
  • मुख्यमंत्री पद की कुर्सी अपने नाम करने की भाजपा की दशकों पुरानी ख्वाहिश मुकम्मल हो जाएगी

New Delhi News. अजीत कुमार। बिहार में बुधवार को सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण के साथ ही नई सरकार आकार ले लेगी। इसके साथ ही बिहार के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी अपने नाम करने की भाजपा की दशकों पुरानी ख्वाहिश मुकम्मल हो जाएगी। दिलचस्प यह कि हाल के कुछ वर्षों में भाजपा ने अलग-अलग राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए चौंकाने वाले नाम देकर सियासी भविष्यवक्ताओं का मुंह बंद कर दिया था, लेकिन बिहार के मामले में उसने किसी नए चेहरे को आगे बढ़ाने की बजाय अपने उपमुख्यमंत्री को ही तवज्जो दी। चौधरी के लिए बिहार का सम्राट बनने का रास्ता इतना आसान भी नहीं था। भाजपा ने असम फॉर्मूले की तर्ज पर बिहार में भी मुख्यमंत्री का चयन किया। कांग्रेसी बैकग्राउंड से आने वाले असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की तरह ही सम्राट चौधरी न तो भाजपा पृष्ठभूमि के हैं और न ही संघ से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता रहा है। एेसे में बड़ा सवाल यह है कि सम्राट ही क्यों?

दरसअल, भाजपा शीर्ष नेतृत्व सम्राट को मुख्यमंत्री बनाकर ‘लांग टर्म इन्वेस्टमेंट’ किया है। बिहार में नीतीश कुमार के सत्ता शिखर से हटने के बाद भाजपा के समक्ष कुर्मी और कुशवाहा (लव-कुश) वोटबैंक को साधने की बड़ी चुनौती थी। भाजपा को नीतीश के बाद उनके कोर वोटबैंक (लव-कुश) के नाराज होने का बड़ा खतरा था। चंूकि सम्राट कुशवाहा समाज से आते हैं और प्रदेश में कुशवाहा समाज की अच्छी खासी आबादी है। लिहाजा पार्टी ने सम्राट को आगे लाने का निर्णय लिया। वरिष्ठ पत्रकार संजय राय कहते हैं कि भाजपा ने बिहार की जटिल राजनीति, अगले साल होने वाले उत्तरप्रदेश चुनाव और 2029 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर सम्राट पर दांव लगाया है।

लव-कुश वोटबैंक साधने की है कोशिश

बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी राजद का कोर वोटबैंक मुस्लिम और यादव (एमवाई) हैं। मुस्लिम मतदाता भाजपा को अपना सियासी दुश्मन मानता है। ऐसे में भाजपा ने मुस्लिम वोटबैंक की बजाय यादव वोटबैंक को साधने के लिए कई उपक्रम किए, जिसमें यादव समाज के नित्यानंद राय को प्रदेश अध्यक्ष बनाना और भूपेन्द्र यादव को पार्टी की बिहार इकाई का प्रभारी बनाना शामिल रहा। बावजूद इसके यादव वोटबैंक पर लालू का एकाधिकार बरकरार रहा। लिहाजा पार्टी ने लव-कुश वोटबैंक साधने पर फोकस किया। सूत्रों की मानें तो इस मकसद को पाने के लिए भाजपा ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री व रालोमो प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा को भी अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कराने की पेशकश दी थी, ताकि उन्हें बिहार में पार्टी का चेहरा बनाया जा सके। लेकिन कुशवाहा ने भाजपा की इस पेशकश को खारिज कर दिया। लिहाजा पार्टी को इसी समाज के अपने फायरब्रांड नेता सम्राट पर दांव लगाना पड़ा।

नीतीश और जदयू का मिला पूरा साथ

ऐसे में जब दो दशक से अधिक समय से प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार अपना पद छोड़ रहे हैं, तब उनकी भावना का सम्मान करना भी जरूरी था। सूत्र बताते हैं कि नीतीश और उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह ने सम्राट को ही सूबे की कमान सौंपने की भावना से भाजपा शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा दिया था। ऐसे में सम्राट की लॉटरी लगने में यह बात ज्यादा कारगर रही।

भाजपा में बढ़ता रहा सम्राट का कद

राजद और जदयू होते हुए भाजपा में आए सम्राट चौधरी का कद लगातार बढ़ता रहा। पहले विधान पार्षद, फिर प्रदेश का अध्यक्ष, इसके बाद गृह विभाग के साथ उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी, यह बताती है कि सम्राट भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की नजर में थे। नेतृत्व ने समय-समय पर उनको नई जिम्मेदारी देकर गढ़ने का काम किया। सूत्र बताते हैं कि जदयू के नेताओं ने यही तर्क रखा कि जब पार्टी उन्हें कम समय में इतने सारे दायित्व सौंपे हैं, तो फिर मुख्यमंत्री का पद देने में क्या हिचक है?

Created On :   14 April 2026 8:39 PM IST

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