उत्तरप्रदेश: बीजेपी के हिंदुत्व के आगे सियासी दलों ने टेके घुटने, सियासत के चुनावी मंच से गुम हुए मुस्लिम नेता!

October 15th, 2021

हाईलाइट

  • चुनावी मंचों से कहां चले गए मुस्लिम नेता

डिजिटल डेस्क, लखनऊ। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के नेतृत्व में बीजेपी ने हिंदुत्व का ऐसा सियासी एजेंडा डिजाइन किया है, जिसके आगे सेक्यूलर कहलाने वाली सभी पार्टियां बौनी नजर आ रही हैं। सभी दल मुस्लिम कार्ड खेलने से घबरा रहे हैं। सभा, यात्राओं, भाषणों से चुनावी शंखनाद हो चुका है। सत्तारूढ़ पार्टी दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए पूरी तैयारी से चुनावी मैदान में उतरने के मूड में हैं।   
 

धुरंधर मुस्लिम नेता कहां खो गए?
बसपा के मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन कांग्रेस में शामिल हो गए। हालफिलहाल वजूद खोई हुई कांग्रेस अपनी सियासी जमीन तलाश करने में लगी है। बहुसंख्यक वोट खिसकने के डर से हर दल मुस्लिम राजनीति भागीदारी से बच रहा है। राजनैतिक मंचों से मुस्लिम चिंता और सियासत घटती हुई नजर आ रही  है। सपा के आजम खान की गिनती एक समय बड़े मुस्लिम नेताओं में हुआ करती थी। इन दिनों वो जेल में बंद हैं। कांग्रेस में मुस्लिम नेता के तौर पर सलमान खुर्शीद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, इमरान मसूद जैसे कद्दावर नेता जरूर हैं। लेकिन इनमें से कोई भी नेता मुस्लिमों को इकट्ठा नहीं कर पा रहा है। उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव के पहले तमाम पार्टियां मुस्लिमों के इर्द-गिर्द अपनी सियासत करती रही हैं। मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तमाम बड़े वादे कर उनका सहयोग लेती हैं। बीजेपी के सियासी पटल पर मजबूत होने के बाद मुस्लिम मतदाता सियासत के हाशिए पर नजर आ रहे हैं। अकेले असदुद्दीन ओवैसी जरूर मुस्लिम वोटों के सहारे सूबे में सियासी जमीन ढूंढ रहे हैं। 

 

                                              
 
कांग्रेस पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी ने बहुसंख्यक वोट छिटकने के डर से मुस्लिम वोटरों की चिंता करना छोड़ दी है। इससे पहले चुनावी मंचों पर मुस्लिम चेहरे खूब दिखाई देते थे। लेकिन इस बार के चुनावी प्रचार में वे छिपे हुए या गायब होते हुए नजर आ रहे हैं।

मंदिर मंदिर नेताजी
प्रियंका गांधी के देवी माता के दर्शन पूजन से लेकर मंत्र उच्चारण तक, ये साफ संकेत हैं कि प्रियंका गांधी अपने हिंदू होने की भावना को चुनाव में प्रकट करना चाहती है। समाजवादी पार्टी की रैलियों में अक्सर मुस्लिम टोपी दिखाई दे जाती थी, लेकिन इस बार की रैली में टोपी के साथ साथ मुस्लिम और मुस्लिम प्रतीक नजर नहीं आते। समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेता अब सफेद जाली की टोपी की जगह लाल टोपी में ही नजर आते है। यही हाल कांग्रेस की सभाओं का है। कांग्रेस की सभाओं में बिना टोपी वाले मुस्लिमों की कुछ तादाद दिखाई पड़ जाती है। लेकिन वो भी मुस्लिम प्रतीकों से दूर। नमाज या जाली टोपी इस बार कांग्रेस की सभाओं से गुम होती हुई दिखाई दे रही है।  

बहुसंख्यक समुदाय केंद्रित आधारित राजनीति कर बीजेपी ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया है।  राजनीति का नया फॉर्मूला तैयार कर बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है। बीजेपी मोदी-योगी जैसे हिंदुत्व के चेहरे पर चुनाव लड़कर सियासत की नई मिसाल पेश कर रही है। बीजेपी के साथ साथ विपक्षी दलों को ये अंदाज हो गया है कि मुस्लिम वोटरों के सहारे कुछ सीट जीती जा सकती है, लेकिन सत्ता तक पहुंच नहीं जा सकता। सभी राजनीतिक दल जानते हैं कि बिना बहुसंख्यक के सत्ता हासिल नहीं की जा सकती। इसके चलते सभी राजनीतिक पार्टीयां मुस्लिमों को मंच देने से बचती नजर आ रही हैं।  इस बार मुस्लिम सियासत पूरी तरह चुप है। न तो पार्टियां बात कर रही न ही मुस्लिम समुदाय। ऐसे में मुस्लिम चुप्पी 2022 के चुनाव मे क्या रंग बिखरेगी? 

विशेषज्ञों का मत

उत्तरप्रदेश की राजनीति को बारिकी से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार विकास सिंह से भास्कर हिंदी संवाददाता आनंद जोनवार ने बात की  वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि बीजेपी के हिंदूत्व एजेंडे के सामने यह नहीं कहा जा सकता है कि अन्य विपक्षी पार्टियों ने मुस्लिम सियासत को दरकिनार कर दिया हो, बल्कि सभी पार्टियां मुस्लिम वोट तो चाहती हैं लेकिन मुस्लिम वोट के चक्कर में बहुसंख्यक वोट खोने का डर हर पार्टी को है। बीजेपी आगामी विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। चुनाव मंच से मुस्लिम सियासत गायब नहीं हुई है बल्कि प्रत्येक दल मुस्लिम समुदाय का साथ चाहता है। एआईएमआईएम पार्टी मुस्लिम वोटरों पर सेंध लगाना चाहती है। ध्रुवीकरण के चलते चुनाव में ऐसा हो रहा है लेकिन ये नहीं कहा जा सकता है कि चुनावी मंच से मुस्लिम सियासत नदारद है।