दैनिक भास्कर हिंदी: मेडिकल डिवाइस खरीदने-बेचने औषधि विभाग से लेना होगा लाइसेंस

November 5th, 2019

डिजिटल डेस्क, नागपुर। चिकित्सा  उपकरणों (मेडिकल डिवाइस) की निगरानी और नियंत्रण के लिए देश में नया तंत्र विकसित करने पर विचार किया जा रहा है। सरकार उपकरणों की गुणवत्ता का जिम्मा सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ)  के अधीन लाना चाहती है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया की तर्ज पर चिकित्सा उपकरणों की जांच की नई व्यवस्था जरूरी है, ताकि इसे ड्रग्स कंट्रोल जनरल ऑफ इंडिया  (डीसीजीआई) के तहत लाया जा सके। इस नियम का उद्देश्य सभी प्रकार के मेडिकल यंत्र व उपकरणों को मानकीकरण के अधीन लाना है। अब सरकारी व निजी अस्पतालों में मरीजों की जांच के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अल्ट्रासाउंड उपकरण जैसे कलर डॉप्लर, इकोकार्डियोग्राफी व सोनोग्राफी मशीन समेत अन्य सभी उपकरण ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के सेक्शन 3 के तहत दवा में शामिल होंगे। निर्माता कंपनियों को खरीदने-बेचाने का औषधि विभाग से लाइसेंस लेना पड़ेगा।

नोटिफिकेशन जारी
नए नियमों के तहत अब औषधि विभाग न केवल मॉनिटरिंग, बल्कि किसी भी तरह की गड़बड़ी पाए जाने पर कार्रवाई करेगा। ड्रग टेक्निकल एडवायजरी बोर्ड नई दिल्ली के सदस्यों ने अल्ट्रासाउंड उपकरणों को दवा में शामिल करने की सिफारिश के बाद स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने गजट नोटिफिकेशन जारी किया है। आंतरिक व बाह्य उपयोग के लिए इस्तेमाल किए जाने के कारण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. मनदीप भंडारी अनुसार नियम एक नवंबर 2020 से प्रभावी हो जाएगा।

अब यह होगा
सीएमएचओ के साथ औषधि विभाग में निर्माता कंपनियों को मशीनों का लाइसेंस लेना पड़ेगा। जांच की मशीनों के लिए अस्पताल प्रशासन को सूचना देनी होगी। राजस्थान समेत देशभर में सोनोग्राफी मशीनों को पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत भी पंजीकरण करवाना पड़ता है।

फिलहाल यह व्यवस्था
अल्ट्रासाउंड उपकरण जैसे सोनोग्राफी, कलर डॉप्लर व इकोकार्डियोग्राफी मशीनों को हर एक जिले के सीएमएचओ ऑफिस में रजिस्ट्रेशन करवाना होता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम आने वाले विभिन्न प्रकार के यंत्रों व जांच उपकरणों को कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के सेक्शन 3 के तहत लाने का सुझाव स्वागत योग्य है। इससे उनके मानकीकरण में मदद मिलेगी। फिलहाल स्टेंट जैसे कुछ अति महत्वपूर्ण य॔त्र ही मानकीकरण के अधीन हैं। नियम के लागू होने के बाद प्रतिस्पर्धा के कारण निम्न दर्जे के उपकरणों व जांच यंत्रों पर प्रभावी रोक संभव होगा। - डाॅ विंकी रुघवानी, महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल के सदस्य

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