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व्रत: आमलकी एकादशी व्रत आज, इस पूजा से मिलेगा मन चाहा वरदान

व्रत: आमलकी एकादशी व्रत आज, इस पूजा से मिलेगा मन चाहा वरदान

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष 6 मार्च 2020, शुक्रवार यानी कि आज यह व्रत रखा गया है।आमलकी यानी आंवला। आंवला को शास्त्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। भगवान विष्णु ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया, उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है। इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है। माना जाता है कि जो जातक आमलकी एकादशी व्रत कथा का पाठ करता है, एसे श्रीलक्ष्मी नायारण जी से मनचाहा वरदान प्राप्त होता है।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में आमलकी एकादशी का महत्व विस्तार से बताया गया है। हरिवंश पुराण में भगवान श्रीविष्णु जी ने आमलकी एकादशी का महत्व का वर्णन किया है। जिसके अनुसार जो भी प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उन्हें फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष में पुष्य नक्षत्र में आने वाली आमलकी एकादशी का व्रत रखना चाहिए। 

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ऐसे रखें व्रत

आमलकी एकादशी व्रत के पहले दिन व्रती को दशमी की रात्रि में एकादशी व्रत के साथ भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। आमलकी एकादशी के दिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए श्रीहरि मुझे अपनी शरण में रखें।

इसके बाद निम्न मंत्र से संकल्प लेने के पश्चात षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें।

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मंत्र

'मम कायिकवाचिकमानसिक 
सांसर्गिकपातकोपपातकदुरित 
क्षयपूर्वक श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त 
फल प्राप्तयै श्री परमेश्वरप्रीति 
कामनायै आमलकी 
एकादशी व्रतमहं करिष्ये'

- भगवान की पूजा के बाद पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें।
- पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें।
- कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं।  
- अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें।  
- रात्रि में भगवत कथा व भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। 
- द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्तिसहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें।  

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