दैनिक भास्कर हिंदी: देवउठनी एकादशी : क्या आप जानते हैं कितना पवित्र है तुलसी पत्र...

August 29th, 2018

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देवउठनी एकादशी या देवप्रबोधिनी एकादशी, इस दिन तुलसी विवाह की पौराणिक परंपरा है। दिवाली के बाद ग्यारस को यह पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इसी दिन भगवान विष्णु 4 माह विश्राम के बाद जागते हैं और फिर शुभ कार्यों का प्रारंभ होता है। वहीं ऐसा भी वर्णन है कि देवताओं का एक दिन मनुष्यों के 6 माह के बराबर होता है। वहीं एक रात भी 6 माह तक चलती है। इसलिए देवशयनी एकादशी अर्थात वर्षा काल में देवों की रात्रि प्रारंभ होती है जो देवउठनी या देव प्रबोधिनी एकादशी को पूर्ण होती है। देवताओं का दिन आरंभ होते ही शुभ कार्यों की झड़ी लग जाती है। मुहूर्त परिवर्तित होते हैं और मंगल धुन सुनाई देने लगती है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार देवउठनी को तुलसी विवाह शालिग्राम से किया जाता है। पुराणों में वृंदा नामक एक स्त्री अपने जन्मकाल से ही श्रीहरि की अनन्य भक्त थी, किंतु उसका विवाह जालंधर से हो जाता है। वह तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करना चाहता है। ऐसी मान्यता है कि वृंदा की पूजा भंग करने के बाद ही देवता जालंधर का वध कर पाते हैं। यह कृत्य श्रीहरि स्वयं करते हैं जिसकी वजह से क्रोधित होकर वृंदा उन्हें पाषाण बना देती हैं। बाद में सत्य का बोध होने पर वे पुनः उन्हें पूर्व अवस्था में लाती हैं और जालंधर के साथ सती हो जाती हैं। इसके बाद से ही तुलसी-शालिग्राम विवाह की परंपरा का श्रीगणेश हुआ। 

खास-खास 

- तुलसी के बगैर विष्णु पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। 
- तुलसी पत्र डालने के बाद के दूध, पानी चरणामृत बन जाता है। 
- तुलसी वाह देवउठनी एकादशी को किया जाता है, किंतु उनके पत्र मंजरी पूरे वर्ष भर देवपूजन में प्रयोग होते हैं।
- तुलसी की माला पहनी जाती है। तुलसी पत्र कई तरह की दवाईयों भी उपयोगी बताए गए हैं। तुलसी दल अकाल मृत्यु से भी बचाता है। 
- ऐसा भी कहा जाता है कि देवउठनी एकादशी के पांच दिनों तक कार्तिक माह में तुलसी विवाह किया जा सकता है। 
- मान्यता है शालिग्राम से विवाह के बाद तुलसी को वैकुंठ विदा होती हैं, किंतु अपनी समस्त शक्तियां पौधे के रूप में धरती पर ही छोड़ जाती हैं। 
- पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार वृंदा की राख से ही तुलसी का पौधा अवतरित हुआ था। तुलसी वृंदा का ही रूप है।