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व्रत: पापमोचनी एकादशी: जानें इसका महत्व और पूजा विधि

व्रत: पापमोचनी एकादशी: जानें इसका महत्व और पूजा विधि

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हिन्दू शास्त्रों में एकादशी का बहुत महत्व है, इसे भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। वहीं चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है, जिसे पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। इस साल यह एकादशी 20 मार्च 2020 को है। मान्यता है कि इस दिन जो मनुष्य पूरे भक्ति भाव से भगवान विष्णु की उपासना करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

मान्यता है कि पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के मोक्ष का द्वार खुल जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस एकादशी के महत्व के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था कि जो भी कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

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पापमोचनी एकादशी व्रत पारण मुहूर्त
पारणा मुहूर्त : दोपहर 01:41 से शाम 04:07 तक
अवधि : 2 घंटे 25 मिनट

पूजन विधि-
- व्रती एकादशी के दिन सूर्योदय होते ही स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
- इस संकल्प के बाद ही भगवान श्री विष्णु की पूजा करें।
- पूजा के बाद भगवान के पास बैठकर भग्वद् कथा का पाठ करें या श्रवण करें।
- एकादशी तिथि को जागरण करने से कईगुणा अधिक पुण्य मिलता है।
  इसलिए रात में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करना चाहिए। 
- द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें।
- पूजा के बाद ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें।
- इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। 

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पापमोचनी एकादशी की कथा
कथा के अनुसार भगवान अर्जुन से कहते हैं, राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे।

इस वन में एक दिन मंजुघोषा नामक अप्सरा की नजर ऋषि पर पड़ी तो वह उन पर मोहित हो गई और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु यत्न करने लगी। कामदेव भी उस समय उधर से गुजर रहे थे कि उनकी नजर अप्सरा पर गयी और वह उसकी मनोभावना को समझते हुए उसकी सहायता करने लगे। अप्सरा अपने यत्न में सफल हुई और ऋषि कामपीड़ित हो गए।

काम के वश में होकर ऋषि शिव की तपस्या का व्रत भूल गए और अप्सरा के साथ रमण करने लगे। कई वर्षों के बाद जब उनकी चेतना जागी तो उन्हें एहसास हुआ कि वह शिव की तपस्या से विरत हो चुके हैं। उन्हें उस अप्सरा पर बहुत क्रोध हुआ और तपस्या भंग करने का दोषी जानकर ऋषि ने अप्सरा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया। श्राप से दुखी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिए अनुनय करने लगी।

अप्सरा की याचना से द्रवित हो मेधावी ऋषि ने उसे विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिए कहा भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था। इसलिए ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया जिससे उनका पाप नष्ट हो गया। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गयी और उसे सुन्दर रूप प्राप्त हुआ व स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गई।

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