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नौतपा 2020: इन दिनों में क्यों होता है भीषण गर्मी का प्रकोप, जानें धार्मिक दृष्टि से क्या है इसका महत्व?

नौतपा 2020: इन दिनों में क्यों होता है भीषण गर्मी का प्रकोप, जानें धार्मिक दृष्टि से क्या है इसका महत्व?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सोमवार 25 मई से नौतपा शुरू हो चुके हैं, इन दिनों में पूरे नौ दिनों तक धरती से सूर्य की दूरी कम हो जाती है। जिसके चलते तापमान में वृद्धि होगी और 9 दिनों तक झुलसा देने वाली गर्मी लोगों को बेहाल कर देगी। हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर साल ज्येष्ठ महीने में सूर्य रोहिणी नक्षत्र में आ जाता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस बार ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि 25 मई से सूर्य कृतिका से रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने के साथ ही नौतपा की शुरुआत हो गई है। अब यह 8 जून तक इसी नक्षत्र में रहेगा। 

नौतपा के दिनों में तापमान में उमस और तेज सूर्य की किरणें लोगों को न तो बाहर आराम देगी और न ही घरों के अंदर। नौतपा पूरे गर्मी के सीजन के सबसे गर्म दिन होते हैं। हालांकि अत्यधिक गर्मी के कारण कभी-कभी बारिश के योग भी बन जाते हैं। बता दें कि इस बार नौतपा 25 मई से लेकर 8 जून तक रहेगा। आइए जानते हैं नौतपा के बारे में...

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धार्मिक मान्यता
नौतपा का ज्योतिष के साथ-साथ पौराणिक महत्व भी है। ज्योतिष के सूर्य सिद्धांत और श्रीमद् भागवत में नौतपा का वर्णन आता है। कहते हैं जब से ज्योतिष की रचना हुई, तभी से ही नौतपा भी चला आ रहा है। ज्येष्ठ माह में सूर्य के वृषभ राशि के 10 अंश से लेकर 23 अंश 40 कला तक को नौतपा कहा जाता है। ज्योतिष गणना के अनुसार, जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में 15 दिनों के लिए आता है तो उन पंद्रह दिनों के पहले नौ दिन सर्वाधिक गर्मी वाले होते हैं। इन्हीं शुरुआती नौ दिनों को नौतपा के नाम से जाना जाता है। इसके बाद सूर्य के ताप का उत्तरार्ध होता है, जो नौतपा के लिए त्याज्य है। 

कई ज्योतिषी मानते हैं कि नौतपा के दौरान यदि भीषण गर्मी होती है तो मानसून में अच्छी बारिश होने की संभावना होती है। वहीं यदि इन दिनों में तपिस कम हो वर्षा के योग भी सामान्य ही रहता है। वहीं परंपरा के अनुसार इन दिनों में महिलाएं हाथ पैरों में मेहंदी लगाती हैं। क्योंकि मेहंदी की तासीर ठंडी होने से तेज गर्मी से राहत मिलती है। इन दिनों में जल दान भी किया जाता है ताकि पानी की कमी से लोग बीमार ना हों।

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आखिर क्यों होती है नौतपा में तेज गर्मी
ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र का अधिपति ग्रह चंद्रमा और देवता ब्रह्मा है। सूर्य ताप, तेज का प्रतीक है, जबकि चंद्र शीतलता का। चंद्र से धरती को शीतलता प्राप्त होती है। सूर्य जब चंद्र के नक्षत्र रोहिणी में प्रवेश करता है तो इससे वह उस नक्षत्र को अपने पूर्ण प्रभाव में ले लेता है। जिस तरह कुंडली में सूर्य जिस ग्रह के साथ बैठ जाए वह ग्रह अस्त हो जाता है, उसी तरह चंद्र के नक्षत्र में सूर्य के आ जाने से चंद्र के प्रभाव क्षीण हो जाते हैं यानी पृथ्वी को शीतलता प्राप्त नहीं हो पाती। इस कारण ताप अधिक बढ़ जाता है।

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