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आस्था: क्यों लगाई जाती है मंदिर में परिक्रमा, जानिए हिन्दू शास्त्रों में क्या है नियम 

आस्था: क्यों लगाई जाती है मंदिर में परिक्रमा, जानिए हिन्दू शास्त्रों में क्या है नियम 

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मंदिर में पूजा के बाद अधिकांश लोगों को देवी देवाओं या मंदिर के चारों ओर गोल-गोल चक्कर लगाते हुए सभी ने देखा होगा। यह परंपरा काफी प्राचीन है, जिसे परिक्रमा कहा जाता है, संस्कृत में इसे प्रदक्षिणा कहा जाता है। इसे प्रभु की उपासना करने का माध्यम माना गया है। यह परिक्रमा मान्यता के अनुसार भी की जाती है। जब हम किसी भी देवी या देवता की पूजा के बाद उनके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। तो हमें असीम शांति का अहसास होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे क्या कारण है और इसके क्या हैं सही नियम, आइए जानते हैं...

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कारण
श्रृद्धालुओं की मानें तो उनके अनुसार ऐसा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसी भी माना जाता है कि मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करने से सारी सकारात्मक ऊर्जा शरीर में प्रवेश करती है और मन को शांति मिलती है। वहीं कुछ लोगों का मत है कि कि नंगे पांव परिक्रमा करने से अधिक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार जब गणेश और कार्तिक के बीच संसार का चक्कर लगाने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी तब गणेश जी ने अपनी चतुराई से पिता शिव और माता पार्वती के तीन चक्कर लगाए थे। इसी वजह से लोग भी पूजा के बाद संसार के निर्माता के चक्कर लगाते हैं। उनके अनुसार ऐसा करने से धन-समृद्धि होती हैं और जीवन में खुशियां बनी रहती हैं।

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कैसे करें परिक्रमा
हिन्दु धर्म में देवी देवताओं की पूजा अर्चना के साथ साथ उनकी परिक्रमा का भी बहुत महत्व बताया गया है। अपने दक्षिण भाग की ओर से चलना/ गति करना परिक्रमा कहलाता है। परिक्रमा में व्यक्ति का दाहिना अंग देवता की ओर होता है। हमेशा ध्यान रखें कि परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से ही प्रारंभ करनी चाहिए, क्योंकि दैवीय शक्ति के आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है। बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर दैवीय शक्ति के आभामंडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है। जबकि दाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर उस देवी / देवता की कृपा आसानी से प्राप्त होती है।

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