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गुरु प्रदोष व्रत करने से मनोकामनाएं होती हैं पूरी, ऐसे करें पूजा

गुरु प्रदोष व्रत करने से मनोकामनाएं होती हैं पूरी, ऐसे करें पूजा

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत प्रत्येक मास की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। वैशाख मास की कृष्ण पक्ष यानी कि आज 2 मई को गुरु प्रदोष व्रत है। इस दिन भगवान शिव जी की पूजा की जाती है। सूतजी कहते हैं कि जो व्यक्ति इस गुरु प्रदोष व्रत का पालन करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। धर्म पुराणों के अनुसार माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं।

प्रदोष व्रत का महत्व 
शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि प्रदोष व्रत को रखने से आपको दो गायों को दान देने के समान पुण्य मिलता है। इस दिन व्रत रखने और शिव की आराधना करने पर भगवान की कृपा आप पर हमेशा रहती है। जिससे आपको मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत करने से आप और आपका परिवार हमेशा आरोग्य रहता है। साथ ही आप की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिए किया जाता है। गुरुवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला होता है। जिनको संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष जिसे शनि प्रदोष कहते हैं, व्रत करना चाहिए। इससे आपको अच्छा फल प्राप्त होगा।

ऐसे करें पूजा 
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त काल में उठ कर सभी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर भगवान शिव का स्मरण करें और इस व्रत का संकल्प करें। संध्या काल में सूर्यास्त होने के एक घंटें पहले पुनः स्नान कर सफेद वस्त्र धारण करें। फिर ईशान कोण में किसी एकांत स्थान में पूजा करने का स्थान बनाएं। इसके लिए सबसे पहले गंगाजल से उस जगह को शुद्ध करें फिर इसे गाय के गोबर से लीपे। इसके बाद कमल पुष्प की आकृति को पांच रंगों से मिलाकर रंगोली या चौक तैयार करें। इसके बाद आप कुश के आसन पर उत्तर-पूर्व की दिशा यानि ईशान कोण में बैठकर भगवान शिव की पूजा करें। भगवान शिव का जलाभिषेक करें साथ में ॐ नम: शिवाय: का जाप भी करते रहें। फिर इसके बाद विधि-विधान के साथ शिव की पूजा करें और गुरु प्रदोषव्रत कथा को सुन और सुनाकर आरती करें और सभी को प्रसाद बाटें।

गुरु प्रदोषव्रत कथा 
स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा मांगने जाती थी और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे के नदी किनारे एक सुन्दर सा बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का एक राजकुमार धर्मगुप्त था। 
कुछ समय के बाद ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह एक विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता का भी अकस्मात् देहांत हो गया था। तब ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को गुरु प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। 

ऋषि की आज्ञा से दोनों बालकों ने भी गुरु प्रदोष व्रत करना आरम्भ कर दिया। एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से वार्तालाप करने लगा। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, तब कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से भेंट के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। 

भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कर दिया। इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व की सेना को साथ लेकर विदर्भ देश पर चढाई कर उसे पुनः जीत लिया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के गुरुप्रदोष व्रत करने का ही फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो जातक गुरु प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर गुरु प्रदोषव्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सहस्त्र जन्मों तक कभी दरिद्रता व्याप्त नहीं होती।
 

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