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प्रदोष व्रत में क्यों की जाती है भगवान शि‍व की पूजा? जानिए पूजन विधि और इसका महत्व

June 24th, 2018 16:42 IST
प्रदोष व्रत में क्यों की जाती है भगवान शि‍व की पूजा? जानिए पूजन विधि और इसका महत्व

डिजिटल डेस्क, भोपाल। सोमवार के दिन प्रदोष व्रत आने की वजह से इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस बार 25 जून 2018 को सोम प्रदोष है। सोमवार के दिन प्रदोष व्रत आरोग्य प्रदान करता है और मनुष्य की सभी इच्छाओं की पूर्ति करता है। संतानहीन दंपत्तियों के लिए इस व्रत पर घर में मिष्ठान या फल इत्यादि गाय को खिलाने से शीघ्र शुभ फलादी की प्राप्ति होती है। संतान की कामना हेतु प्रदोष व्रत करने का विधान हैं, एवं संतान बाधा में प्रदोष व्रत सबसे उत्तम मना गया है।

संतान की कामना हेतु प्रदोष व्रत के दिन पति-पत्नी दोनों प्रातः स्नान इत्यादि नित्य कर्म से निवृत होकर शिव, पार्वती और गणेश जी की एक साथ में आराधना कर किसी भी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक, पीपल की जड़ में जल चढ़ाकर सारे दिन निर्जल रहने का विधान हैं। प्रदोष काल में स्नान करके मौन रहना चाहिए, क्योंकि शिवकर्म सदैव मौन रहकर ही पूर्णता को प्राप्त करता है। इसमें भगवान सदाशिव का पंचामृतों से संध्या के समय अभिषेक किया जाता है।

ज्योतिष की दृष्टि से जो व्यक्ति चंद्रमा के कारण पीड़ित हो उसे वर्षभर उपवास रखना, लोहा, तिल, काली उड़द, शकरकंद, मूली, कंबल, जूता और कोयला आदि दान करने से शनि का प्रकोप भी शांत हो जाता है, जिससे व्यक्ति के रोग, व्याधि, दरिद्रता, घर की शांति, नौकरी या व्यापार में परेशानी आदि का स्वतः निवारण हो जाएगा।

प्रदोष का सबसे बड़ा महत्व है कि सोम (चंद्र) को, प्रदोषकाल पर्व पर भगवान शंकर ने अपने मस्तक पर धारण किया था। यह सोम प्रदोष के नाम से जाना जाता है।

उपासना करने वाले को एवं प्रदोष करने वाले को सोम प्रदोष से व्रत एवं उपवास प्रारंभ करना चाहिए। प्रदोष काल में उपवास में सिर्फ हरे मूंग का सेवन करना चाहिए, क्योंकि हरा मूंग पृथ्वी तत्व है और मंदाग्नि को शांत रखता है।


प्रदोष व्रत की विधि

  • प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।
  • नित्यकर्मों से निवृत्त होकर, भगवान श्री भोलेनाथ का स्मरण करें। 
  • पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते हैं। 
  • पूजा स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है।  
  • अब इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाई जाती है। 
  • प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है।


इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान शंकर की पूजा करना चाहिए। पूजन में भगवान शिव के मंत्र 'ऊँ नम: शिवाय' का जाप या रुद्राष्टक पड़ते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए।  ऊँ नमःशिवाय' मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन करना चाहिए।  हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग किया जाता है हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन या अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

प्रदोष व्रत को लेकर पौराणिक कथा 

पौराणिक कथानुसार चंद्र का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्या जो नक्षत्र हैं उनके साथ संपन्न हुआ। जिसमें रोहिणी बहुत खूबसूरत थीं एवं चंद्र का रोहिणी पर अधिक स्नेह देख शेष कन्याओं ने अपने पिता दक्ष से अपना दु:ख प्रकट किया। दक्ष तो स्वभाव से ही क्रोधी प्रवृत्ति के थे और उन्होंने क्रोध में आकर चंद्र को श्राप दे दिया कि तुम क्षय रोग से ग्रस्त हो जाओगे। उसके बाद से चन्द्र शनै: शनै: क्षय रोग से ग्रसित होने लगे और उनकी कलाएं क्षीण होना प्रारंभ हो गईं। यह देखकर नारदजी ने उन्हें मृत्युंजय भगवान आशुतोष की आराधना करने को कहा, तत्पश्चात चन्द्र और रोहणी दोनों ने भगवान आशुतोष की आराधना की।

चंद्र अंतिम सांसें गिन रहे थे, तभी भगवान शंकर ने प्रदोषकाल में चंद्र को पुनर्जीवन का वरदान देकर उसे अपने मस्तक पर धारण कर लिया अर्थात चंद्र मृत्युतुल्य कष्ट प्राप्त होते हुए भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए। पुन: शनै: शनै: चंद्र स्वस्थ होने लगे और पूर्णमासी पर पूर्ण चंद्र के रूप में प्रकट हुए। चंद्र क्षय रोग से पीड़ित होकर मृत्युतुल्य कष्टों को भोग रहे थे।

'प्रदोष व्रत' इसलिए भी किया जाता है कि भगवान शिव ने उस दोष का निवारण कर उन्हें पुन: जीवन प्रदान किया अत: हमें उस शिव की आराधना करनी चाहिए जिन्होंने मृत्यु को पहुंचे हुए चंद्र को मस्तक पर धारण किया था।


भगवान शिव पंचमुखी होकर 10 भुजाओं से युक्त हैं एवं पृथ्वी, आकाश और पाताल तीनों लोकों के एकमात्र स्वामी हैं। शिव का एक रूप ज्योतिर्मय भी है और एक रूप भौतिकी शिव के नाम से जाना जाता है जिसकी हम सभी आराधना करते हैं। ज्योतिर्मय शिव पंचतत्वों से निर्मित हैं। भौतिकी शिव का वैदिक रीति से अभिषेक एवं मंत्रोच्चारण द्वारा पूजन किया जाता है। ज्योतिर्मय शिव के निकट साधक मौन अर्थात ध्यान कर अपना कर्म करता है।

ज्योतिर्मय शिव तंत्र विज्ञान द्वारा दर्शन देते हैं, किन्तु साधक को गुरु का पूर्ण मार्गदर्शन हो, क्योंकि तं‍त्र विज्ञान शिव का तेज है जिसे उनका तीसरा नेत्र भी माना जाता है। इस विज्ञान को समझने वाले जितने भी हुए और जिन्होंने भी शिव के इस रूप के दर्शन किए, सब ने इस ज्ञान को गोपनीय रखा।

यह सत्य है कि सत्यान्वेषी मनीषियों ने संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन कर अपनी व्याख्याओं में अपने-अपने अनुभवों को अपनी भाषाओं में वर्णित कर समाज के सामने जितना प्रकट करना आवश्यक था उसका प्रचार-प्रसार किया है। तंत्र विज्ञान वास्तविकता के दर्शन कराता है।

इस शास्त्र को गोपनीय रखने के पीछे एक कारण यह भी है कि शिव के तत्वों का संपूर्ण रहस्य उजागर हो जाए तो इसका दुरुपयोग घातक सिद्ध हो सकता है।

एक विशेष बात यह है कि शिवलिंग के सामने सदैव नंदी देव विराजते हैं और शिव के दर्शन करने के पूर्व नंदी देव के सींगों के बीच में से शिव के दर्शन करते हैं, क्योंकि शिव ज्योतिर्मय भी हैं और सीधे दर्शन करने पर उनका तेज सहन नहीं कर सकते।


नंदी देव आकाश तत्व हैं। वे शिव के तेज को सहन करने की पूर्ण क्षमता रखते हैं। 
माता गौरी अग्नि तत्व की प्रधानता लिए हुए हैं। इनका वाहन सिंह है। 
कार्तिकेय वायु तत्व हैं। इनका वाहन मयूर है। 
श्री गणेश पृथ्वीर तत्व है, मूषक इनका वाहन है। 
शिव परिवार इस समस्त चराचर के स्वामी हैं। इन्हीं की माया एवं कृपा से हम सभी संचालित हैं।

शिवपुराण में उल्लेख मिलता है कि शिव के एक अंग से श्री हरि विष्णु, एक अंग से श्री ब्रह्माजी और श्री शिव के मस्तकरूपी तीसरे ने‍त्र से महेश, इस प्रकार से इन सबको अपना-अपना कार्य सौंपकर स्वयं भगवान भभूती (राख) लपेटे ध्यान में मग्न रहते हैं। भगवान शिव रिद्धि-सिद्धि, सुख-समृद्धि के दाता हैं। ऐसे शिव को बारंबार प्रणाम। 

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