America News: 100 ही नहीं 500% तक टैरिफ लगा सकते हैं ट्रंप? अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कितना टैरिफ लगाने की ताकत, कैसे बनी कम पर सहमति?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका और रूस के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी अब एक बार फिर से भारत और चीन के लिए चिंता का कारण बन सकती है। अमेरिका के सीनेट ने रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने का रास्ता साफ करने वाले एक विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी गई है। इस सूची में भारत और चीन के साथ अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया भी शामिल हैं। विधेयक का उद्देश्य रूस की कमाई पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन में जारी युद्ध के लिए आर्थिक मदद के रास्तों को सीमित करना बताया गया है। सीनेट में हुई वोटिंग में विधेयक के पक्ष में 86 वोट आए हैं और 11 सांसदों ने इसका विरोध किया है।
किन देशों पर साधा है निशाना?
इस प्रस्तावित कानून के तहत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वह रूस से सबसे ज्यादा तेल और गैस खरीदने वाले 5 देशों से इंपोर्ट पर 100 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा सकें। इस लिस्ट में चीन और भारत के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया के नाम शामिल हैं। अगर यह विधेयक आगे की सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करके कानून बन जाता है, तो इन देशों से अमेरिका पहुंचने वाले सामान पर भारी टैरिफ लगाना आसान हो सकता है। हालांकि, अभी भारत पर ऐसा कोई नया टैरिफ लागू नहीं हुआ है। सीनेट से मंजूरी मिलना इस पूरी प्रक्रिया का सिर्फ एक चरण है। आगे कई और कदम उठाने होंगे।
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पहले 500% तक के टैरिफ का था प्रस्ताव
जानकारी के मुताबिक, रूस के तेल बिजनेस से संबंधित देशों पर दबाव बनाने के लिए इससे भी ज्यादा टैरिफ लगाने की योजना बनाई गई थी। बीते साल अप्रैल में रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने ऐसा विधेयक पेश किया था, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया था। 500 प्रतिशत वाले प्रावधान को हटाकर रूस से सबसे ज्यादा तेल और गैस खरीदने वाले 5 देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का ऑप्शन रखा गया है।
भारत पर अभी कितना शुल्क?
सीनेट में विधेयक के पास होने के बाद से ही कई जगहों पर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की चर्चा तेज हो सकती है, लेकिन अभी स्थिति अलग है। सबसे पहले विधेयक को अमेरिका के प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलेगी, इसके बाद राष्ट्रपति के पास जाएगा। अगर प्रतिनिधि सभा इसे पारित कर देती है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी हो जाएंगे, तो यह कानून का रूप ले सकता है। इसके बाद भी भारत से आने वाले हर सामान पर तुरंत ही 100 प्रतिशत टैरिफ लगाना जरूरी नहीं है। प्रस्ताव में राष्ट्रपति को काफी अधिकार दिए गए हैं। वह अमेरिका के राष्ट्रीय हित, दूसरे देशों के साथ संबंधों और कूटनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए टैरिफ में बदलाव या कुछ मामलों में राहत देने का फैसला कर सकते हैं।
ट्रंप की सबसे अहम भूमिका
इस पूरे मामले में सबसे अहम भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हो सकती है। अगर विधेयक कानून बन जाता है तो भी आखिरी फैसला काफी हद तक ट्रंप के हाथ में रहेगा। इसका मतलब साफ है कि भारत के लिए स्थिति अभी तय नहीं हुई है। कानून बनने के बाद भी अमेरिका भारत पर पूरा 100 प्रतिशत शुल्क लगाएगा या कम इंट्रेस्ट रेट रखेगा, या फिर किसी तरह की छूट देगा, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा। हालांकि, भारत के लिए यह मामला काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि, पिछले कुछ सालों में रूस से सस्ता तेल खरीदना भारतीय ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अमेरिका की तरफ से ऐसा कोई कदम उठाया जाता है तो भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है।
ईरान पर भी की जा सकती है सख्ती
बता दें, विधेयक का निशाना सिर्फ रूस नहीं है। इसमें ईरान को लेकर भी एक अहम प्रावधान रखा गया है। प्रस्ताव में 1996 के ईरान प्रतिबंध कानून की अवधि को 2031 तक बढ़ाने की बात कही गई है। इस कानून के तहत ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर अमेरिका की तरफ से प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यानी विधेयक के जरिए अमेरिका रूस के साथ-साथ ईरान पर भी आर्थिक दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
पुतिन और रूस के बिजनेस पर भी कार्रवाई
विधेयक में रूस के बड़े नेताओं, सरकारी अधिकारियों, कारोबारियों और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान है। इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ रूस के अन्य प्रभावशाली लोगों को निशाना बनाने की योजना बनाई जा रही है। विधेयक के प्रमुख समर्थकों में लिंडसे ग्राहम और रिचर्ड ब्लूमेंथल रहे हैं। ग्राहम का 11 जुलाई को निधन हो चुका है। सीनेट में मतदान के बाद ब्लूमेंथल ने कहा कि जो कदम उठाया गया है, उस पर ग्राहम को गर्व होता। उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित प्रतिबंध और शुल्क उन लोगों पर दबाव बढ़ाने का काम करेंगे, जो यूक्रेन के खिलाफ रूस की सैन्य कार्रवाई को किसी न किसी तरह समर्थन दे रहे हैं।
प्रतिनिधि सभा के नए सत्र का इंतजार
सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सामने जाएगा। प्रतिनिधि सभा का नया सत्र 31 अगस्त से शुरू होने वाला है। इसके बाद वहां इस प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग हो सकती है। हालांकि, सभी अमेरिकी सांसद इस पहल के पक्ष में नहीं हैं। कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने चिंता जताई है कि इससे ट्रंप को शुल्क लगाने की अतिरिक्त ताकत मिल सकती है। उनका कहना है कि ट्रंप पहले ही टैरिफ को अपनी आर्थिक और व्यापार नीति का बड़ा हथियार बना चुके हैं। फिलहाल भारत के लिए सबसे अहम बात यही है कि सीनेट की मंजूरी को अंतिम फैसला न माना जाए। अभी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी, राष्ट्रपति की सहमति और उसके बाद शुल्क लागू करने से जुड़े फैसले बाकी हैं। इसलिए आने वाले हफ्तों में अमेरिका की संसद और राष्ट्रपति की तरफ से लिए जाने वाले फैसले ही यह तय करेंगे कि भारत को कितनी बड़ी आर्थिक चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
Created On :   8 Aug 2026 5:18 PM IST












