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पश्चिम बंगाल में बीजेपी के निशाने पर ममता बनर्जी के सियासी क्लब

June 28th, 2020 20:00 IST
 पश्चिम बंगाल में बीजेपी के निशाने पर ममता बनर्जी के सियासी क्लब

हाईलाइट

  • पश्चिम बंगाल में बीजेपी के निशाने पर ममता बनर्जी के सियासी क्लब

नई दिल्ली/कोलकाता 28 जून (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की क्लब पॉलिटिक्स को अब भारतीय जनता पार्टी तोड़ने में जुटी है। गली-गली में मौजूद क्लबों की फंडिंग कर जमीनी पकड़ बनाने में जुटीं ममता बनर्जी के खिलाफ बीजेपी हमलावर हो उठी है। एक तरफ जहां बीजेपी क्लबों की फंडिंग पर सवाल उठाकर ममता बनर्जी की घेराबंदी कर रही है, वहीं दूसरी तरफ गांव-गांव और कस्बों की गली-गली में नए लोगों को पार्टी से जोड़कर अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है। वहीं टीएमसी के प्रभाव से बाहर के अराजनीतिक क्लबों से संपर्क कर उन्हें पार्टी अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। ताकि ममता बनर्जी की क्लब पॉलिटिक्स को बेअसर किया जा सके।

पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रितेश तिवारी ने आईएएनएस से कहा, यह ममता बनर्जी की घबराहट ही है, जो वह राज्य की जनता को कोरोना से बचाने के लिए सिर्फ दो सौ करोड़ जारी करतीं हैं, तो क्लबों को पांच सौ करोड़ रुपये की मदद देती है। ज्यादातर क्लबों पर सत्ताधारी टीएमसी के लोग काबिज हैं।

भाजपा नेता रितेश तिवारी कहते हैं कि क्लबों का राजनीतिकरण कर अपना हित साधने में जुटीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब कोई फायदा नहीं होने वाला है। 2021 में भाजपा तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर करके ही दम लेगी।

जिस तरह से कई राज्यों में गणेश, दुर्गा पूजा आदि आयोजनों के लिए मंडल या समतियां होतीं हैं, उसी तरह से पश्चिम बंगाल में क्लब होते हैं। यह क्लब सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत होते हैं। दुर्गा पूजा पंडालों का संचालन इन्हीं क्लबों के जरिए होते है। पश्चिम बंगाल में क्लबों के अपने भवन और पदाधिकारी होते हैं। सोसाइटी के नियमों के तहत पदाधिकारियों का चुनाव होता है। कोलकाता में सबसे ज्यादा क्लब हैं। कई गलियों में तो तीन से चार क्लब हैं। आरोप लगते हैं कि पश्चिम बंगाल में ज्यादातर क्लबों में टीएमसी से जुड़े लोग काबिज हैं। सांसद, विधायक और पार्षद इन क्लबों को आर्थिक मदद देकर उनसे अपना राजनीतिक हित साधते हैं।

स्थानीय जानकारों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में 1977 से पहले तक क्लबों पर कांग्रेस का कब्जा हुआ करता था। 1977 में ज्योति बसु के मुख्यमंत्री बनने के बाद मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा) का शासन हुआ तो क्लबों से कांग्रेस का वर्चस्व खत्म हुआ। 1977 से लेकर 2011 तक राज्य में लेफ्ट का शासन रहा। इस दौरान दो माकपा नेता मुख्यमंत्री हुए। 1977 से वर्ष 2000 तक लगातार ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे तो बाद में 2011 तक बुद्ध देव भट्टाचार्य ने पारी खेली।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी की टीएमसी से मिल रही कड़ी चुनौती, लंबे शासन के कारण एंटी इन्कमबेंसी और सरकार के अंदरखाने मची उथलपुथल के कारण राज्य की सत्ता से तीन दशक बाद 2011 में लेफ्ट की विदाई हुई थी। 2011 में सत्ता मिलने के बाद ममता बनर्जी ने जमीनी राजनीति पर और पकड़ बनाने की तैयारी की। तब उनके सिपहसालारों ने क्लबों के राजनीतिकरण पर जोर दिया था। जिसके बाद से ममता बनर्जी क्लबों को काफी महत्व देतीं रहीं हैं।

सूत्रों का कहना है कि लेफ्ट के शासनकाल में भी क्लबों का उतना राजनीतिकरण नहीं हुआ था, जितना ममता बनर्जी के राज में। ममता बनर्जी ने सरकार से आर्थिक सहायता देनी शुरू की। मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों से घिरने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2018 में सभी क्लबों और दुर्गा-पूजा कमेटियों को दस-दस हजार की फंडिंग की थी।

सूत्रों का कहना है कि क्लबों से जुड़े लोग इलाके में रसूखदार होते हैं। वह ओपीनियन मेकर का भी काम करते हैं। ऐसे में क्लबों के जरिए ममता बनर्जी अपनी जमीनी पकड़ बनाती हैं। अब भाजपा ममता बनर्जी की क्लब पॉलिटिक्स को मुद्दा बनाने में जुटी है। भाजपा चाहती है कि राज्य की राजनीति में क्लबों की राजनीति बेअसर हो जाए।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रितेश तिवारी कहते हैं, टीएमसी के खिलाफ लहर चल रही है, अब क्लब की राजनीति काम नहीं आने वाली है।

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