दैनिक भास्कर हिंदी: पद्मावत का विरोध करने वाली ये करणी सेना है कौन और आई कहां से? 

September 5th, 2018

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावत' गुरुवार को लंबे विवाद के बाद रिलीज हो ही गई। हालांकि, इसका विवाद अभी पूरा थमा नहीं है और अभी भी कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। पद्मावत का विरोध करने वाली करणी सेना का मानना है कि इस फिल्म में संजय लीला भंसाली ने अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) और रानी पद्मावती (दीपिका पादुकोण) के बीच रोमांटिक सीन्स फिल्माए हैं, जिससे राजपूत समुदाय के सम्मान को ठेस पहुंची है। इसके साथ ही इस संगठन ने भंसाली पर इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप भी लगाया है। राजस्थान में विरोध करने वाली करणी सेना आज पूरे देश में पैर पसार चुकी है और इसके समर्थक देशभर में हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले एक साल से करणी सेना का नाम तो सब सुनते आ रहे हैं लेकिन इसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। ऐसे में आज हम आपको करणी सेना के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं।

आरक्षण की मांग से हुई थी शुरुआत

करणी सेना यूं तो 2006 में आई थी, लेकिन इसकी शुरुआत काफी समय पहले ही हो गई थी। बताया जाता है कि राजस्थान में आरक्षण मिलने से गांवों में जाट प्रधान और सरपंच जैसे पदों पर काबिज होने लगे और राजपूतों का वर्चस्व कम होने लगा। इसके बाद बीजेपी नेता देवी सिंह भाटी और लोकेंद्र सिंह कालवी ने अगड़ों को आरक्षण और पिछड़ों को संरक्षण देने के नाम पर राजस्थान में एक 'सामाजिक न्याय मंच' बनाया। इस मंच के बैनर तले प्रदेश में राजपूतों की बड़ी-बड़ी रैलियां होने लगीं। इसके बाद राजपूतों नें इस मंच को राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन 2003 के विधानसभा चुनावों में इस पार्टी को केवल एक ही सीट मिली। ये सीट देवी सिंह भाटी ने जीती और बाद में वो भी बीजेपी में शामिल हो गए।

23 दिसंबर 2006 को बनी करणी सेना

इसके बाद सामाजिक न्याय मंच जब चुनावों में बुरी तरह फेल हुई तो इसने राजपूतों को आरक्षण दिलाने के नाम पर 23 दिसंबर 2006 को करणी सेना की स्थापना की। करणी माता को जगदम्बा का अवतार माना जाता है और कई राजपूत राजघरानों की ये कुल देवी हैं। उस वक्त करणी सेना का प्रदेश अध्यक्ष अजीत सिंह मामडोली को बनाया गया और लोकेंद्र सिंह कालवी करणी सेना के संयोजक बन गए। इसके बाद करणी सेना प्रदेश में राजपूतों को आरक्षण दिलाने की मांग की और जगह-जगह आंदोलन किए।

2008 में कांग्रेस से जुड़े लोकेंद्र सिंह कालवी

2008 में जब 'जोधा-अकबर' फिल्म की शूटिंग जयपुर में हुई तो करणी सेना ने इसका जमकर विरोध किया। इसके बाद करणी सेना लोकप्रिय हो गई और इस वजह से 2008 में कांग्रेस ने करणी सेना के संयोजक लोकेंद्र सिंह कालवी को शामिल कर लिया। लोकेंद्र सिंह कालवी के कांग्रेस में शामिल होने की वजह से करणी सेना में फूट पड़ गई और संगठन के अंदर उनका काफी विरोध भी शुरू हुआ। इसके बाद कालवी ने संगठन को भंग करने का एलान कर दिया।

फिर तीन टुकड़ों में बंटी करणी सेना

लोकेंद्र सिंह कालवी ने जब करणी सेना को भंग करने का एलान किया तो संगठन के प्रदेश अध्यक्ष रहे अजीत सिंह मामडोली ने कालवी को करणी सेना से निकाल दिया और खुद इसके नेता बन गए। इसके बाद 2010 में लोकेंद्र सिंह कालवी ने 'श्री राजपूत करणी सेना' बनाई और श्याम सिंह रुआं को इसका प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। हालांकि बाद में अजय सिंह मामडोली और रुआं के बीच विवाद बढ़ गया और श्यास सिंह रुआं ने करणी सेना को छोड़ दिया। 2012 में लोकेंद्र सिंह कालवी ने सुखदेव सिंह गोगामेड़ी श्री राजपूत करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष बने। सुखदेव सिंह पर कई आपराधिक केस दर्ज थे और वो दो बार बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे। जिस कारण लोकेंद्र सिंह कालवी और सुखदेव सिंह के बीच विवाद हो गया और फिर सुखदेव सिंह ने 'राष्ट्रीय श्री राजपूत करणी सेना' नाम से अलग संदठन बना लिया।

राजनीति में कभी सफल नहीं हुए लोकेंद्र सिंह कालवी

श्री राजपूत करणी सेना के संयोजक लोकेंद्र सिंह कालवी ने कई बार राजनीति में हाथ आजमाया, लेकिन एक बार भी वो इसमें सफल नहीं हो पाए। लोकेंद्र सिंह के पिता कल्याण सिंह कालवी 1990-91 में चंद्रशेखर सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर भी रहे थे। लोकेंद्र सिंह कालवी ने पहली बार 1993 में नागौर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए। इसके बाद 1998 का लोकसभा चुनाव उन्होंने बीजेपी के टिकट पर बाडमेर-जैसलमेर सीट से लड़ा, लेकिन फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बाद में 2003 का विधानसभा चुनाव कालवी ने सामाजिक न्याय मंच के उम्मीदवार के तौर पर लड़ा और फिर से हार झेलनी पड़ी। 2008 में कालवी कांग्रेस में शामिल नहीं हुए, लेकिन टिकट नहीं मिलने के कारण उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया।

करणी सेना ने कब-कब किया विरोध? 

करणी सेना राजस्थान में यूं तो कई आंदोलन करती रही है, लेकिन उसे असली पहचान विरोध-प्रदर्शनों की वजह से ही मिली है। करणी सेना ने पहली बार 2008 में 'जोधा-अकबर' फिल्म का पूरे राजस्थान में पुरजोर विरोध किया। 2013 में करणी सेना ने फिर 'जोधा-अकबर' सीरीयल का विरोध किया और आरोप लगाया कि इस सीरीयल में इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है। इसके बाद 2014 में इस संगठन ने 'जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल' का विरोध भी किया और 2016 के आखिरी में करणी सेना ने भंसाली की 'पद्मावती' फिल्म का विरोध किया।