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छठ महापर्व 2018: जानिए 36 घंटे के व्रत में क्या करते हैं लोग?

November 13th, 2018 18:31 IST

डिजिटल डेस्क, भोपाल। बिहार सहित पूरे देश में मनाए जाने वाले छठ पर्व की आज से शुरुआत हो गई है। ये पर्व रविवार से शुरू होकर 14 नवंबर तक चलने वाला है। छठी मईया के इस पर्व को बिहार और उत्तर भारत में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। ये पर्व नहाय-खाए से शुरू होता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस दिन छठ व्रत रखने वाले श्रद्धालु स्नान करके भोजन करते हैं। आम दिनों में भी लोग स्नान करके भोजन करते हैं लेकिन इस दिन कुछ विशेष रीति-रिवाजों और नियमों का पालन करना होता है। इसलिए इसे नहाय-खाए ही नाम दिया गया है। इस दिन व्रती किसी नदी या तालाब में जाकर डुबकी लगाते हैं, इसके बाद सूर्य और छठी मईया का ध्यान कर व्रत के पीरा होने की कामना करते हैं।

दूसरे दिन होगा खरना
नहाय-खाए के बाद बाद खरना होता है। खरना इस पूजा का दूसरा चरण होता है। पूजा का ये दूसरा चरण सबसे कठिन होता है। जिसमें व्रती को निर्जला उपवास रखना होता है। शाम को पूजा के बाद खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। अथर्ववेद के अनुसार षष्ठी देवी भगवान भास्कर की मानस बहन हैं। प्रकृति के छठे अंश से षष्ठी माता उत्पन्न हुई हैं। उन्हें बच्चों की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु द्वारा रची माया भी माना जाता है। इसीलिए बच्चे के जन्म के छठे दिन छठी पूजा की जाती है, ताकि बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं।

जानिए कब है छठ पूजा

नहाय-खाए : रविवार 11 नवंबर 
खरना : सोमवार 12 नवंबर
सायंकालीन अर्घ्य: मंगलवार 13नवंबर
प्रात:कालीन अर्घ्य: बुधवार 14 नवंबर 
सूर्य योग में भगवान भास्कर को पहला अर्घ्य 13 नवंबर को

षष्ठी तिथि समाप्त – 14 नवंबर 2018 को यानि कल 04:22 बजे तक रहेगी 

छठ पूजा की सामग्री 

छठ पूजन के दिन नए वस्त्र ही पहनें। दो से तीन बड़ी बांस से टोकरी, सूप, पानी वाला नारियल, गन्ना, लोटा, लाल सिंदूर, धूप, बड़ा दीपक, चावल, थाली, दूध, गिलास, अदरक और कच्ची हल्दी, केला, सेब, सिंघाड़ा, नाशपाती, मूली, आम के पत्ते, शकरकंद, सुथनी, मीठा नींबू (टाब), मिठाई, शहद, पान, सुपारी, कैराव, कपूर, कुमकुम और चंदन।  

छठी मइया का प्रसाद 

छठ पूजा के समय छठी माता को विशेष भोग अर्पित किया जाता है। ये पूजा तीन दिन होती है और इन तीनों ही दिनों में मईया को अलग-अलग भोग लगाया जाता है। पहले दिन प्रसाद के रूप में सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी का भोग लगाया जाता है। दूसरे दिन प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक और शक्कर का उपयोग नहीं किया जाता है। इसके अलावा ठेकुआ, मालपुआ, खीर, खजूर, चावल का लड्डू और सूजी का हलवा आदि छठ मइया को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।

पूजा विधि 

  • नहाय-खाए के दिन सभी व्रती सिर्फ शुद्ध आहार का सेवन करें।  
  • खरना के दिन शाम के समय गुड़ की खीर और पुड़ी बनाकर छठी माता को भोग लगाएं। सबसे पहले व्रती खीर खाएं बाद में परिवार और ब्राह्मणों को दें। 
  • छठ के दिन घर में बने हुए पकवानों को बड़ी टोकरी में भरें और घाट पर जाएं। 
  • घाट पर ईख का घर बनाकर बड़ा दीपक जलाएं।  
  • व्रती घाट में स्नान करने के लिए उतरें और दोनों हाथों में डाल को लेकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें।  
  • सूर्यास्त के बाद घर जाकर परिवार के साथ रात को सूर्य देवता की ध्यान और जागरण करें। 
  • सप्तमी के दिन सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सारे व्रती घाट पर पहुंचे। इस दौरान वो पकवानों की टोकरियों, नारियल और फलों को साथ रखें।  
  • सभी व्रती उगते सूरज को डाल पकड़कर अर्घ्य दें। 
  • छठी की कथा सुनें और प्रसाद का वितरण करें। 
  • आखिर में व्रती प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोलें।


छठ पूजा के दौरान व्रतियों के लिए नियम 

  • व्रती छठ पर्व के चारों दिन नए कपड़े पहनें। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनें। 
  • छठ पूजा के चारों दिन व्रती जमीन पर चटाई बिछाकर सोएं। 
  • व्रती और घर के सदस्य भी छठ पूजा के दौरान प्याज, लहसुन और मांस-मछली ना खाएं। 
  • पूजा के लिए बांस से बने सूप और टोकरी का इस्तेमाल करें। 
  • छठ पूजा में गुड़ और गेंहू के आटे के ठेपुआ, फलों में केला और गन्ना ध्यान से रखें।  

व्रति के बाद ही भोजन करते हैं घरवाले

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस अवधि में व्रतधारी लोग लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस अवधि में वे जल भी ग्रहण नहीं करता, पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्रता से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत का आरंभ करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रति के भोजन के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।

खाते हैं गन्ने के रस में बनी खीर

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक और शक्कर का उपयोग नहीं किया जाता है। इस समय पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में सम्मिलित किया जाता है। संध्या समय पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा आस-पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रति किसी एक नियत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। 

व्रत रखने वाले कहलातें हैं परवैतनिक

छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। ये छठ व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है; कुछ पुरुष भी इस व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रति को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही बिस्तर का भी त्याग किया जाता है। छठ पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रति फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताते हैं। इस उत्सव में सम्मिलित होने वाले लोग नये कपड़े पहनते हैं। जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गयी होती है व्रति को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलाएँ साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ पूजा करते हैं। ‘छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालों साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।

पांडवों को वापस मिल गया था राजपाट

एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिला। छठ पूजा की परम्परा और उसके महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।

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