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नए मेडिकल कॉलेजों में नियुक्ति प्रक्रिया का रिकॉर्ड तलब, मनमानी कार्यप्रणाली का आरोप

नए मेडिकल कॉलेजों में नियुक्ति प्रक्रिया का रिकॉर्ड तलब, मनमानी कार्यप्रणाली का आरोप

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। हाईकोर्ट ने प्रदेश के 7 नए मेडिकल कॉलेजों में नियुक्ति प्रक्रिया का रिकॉर्ड तलब किया है। जस्टिस विशाल धगट की एकल पीठ ने राज्य शासन को नियुक्ति प्रक्रिया का रिकॉर्ड पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। 

अचानक पहली सूची निरस्त कर दी गई

छिंदवाड़ा निवासी अमृता वामने और अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि प्रदेश के 7 नए मेडिकल कॉलेजों में प्रदर्शक के पद की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया है। नियमों के अनुसार नियुक्ति के लिए इंटरव्यू या लिखित परीक्षा या फिर दोनों प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी होना चाहिए। याचिका में कहा गया कि नियुक्ति के लिए जारी की गई पहली सूची में याचिकाकर्ता का नाम शामिल था। अचानक पहली सूची निरस्त कर दी गई। इसके बाद दूसरी सूची जारी की गई, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम नहीं था। अधिवक्ता मनोज चतुर्वेदी ने तर्क दिया कि नए मेडिकल कॉलेजों में मनमाने तरीके से नियुक्ति की जा रही है। नियुक्ति के लिए किसी भी प्रकार का मापदंड नहीं है। चहेतों की नियुक्ति के लिए अपात्रों को नियुक्त किया जा रहा है। सुनवाई के बाद एकल पीठ ने नियुक्ति प्रक्रिया का रिकॉर्ड दो सप्ताह में पेश करने का आदेश दिया है।
 

ओएफके कर्मी की सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त

केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) ने आयुध निर्माणी खमरिया जबलपुर के कर्मचारी की सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त कर दिया है। कैट के न्यायिक सदस्य रमेश सिंह ठाकुर और प्रशासनिक सदस्य नवीन टंडन की युगल पीठ ने कर्मचारी को 90 दिन में सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। प्रमोद कुमार गौड़ की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि उसने आयुध निर्माणी खमरिया जबलपुर से ट्रेड अप्रेन्टिस की ट्रेनिंग की थी। ट्रेनिंग के बाद उसे वर्ष 2007 में डीबी वर्कर के पद पर नियुक्ति दी गई। नियुक्ति के बाद किसी ने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई कि देवरिया उत्तरप्रदेश में उसके खिलाफ धारा 323, 34 का प्रकरण चला था। विभाग से आपराधिक प्रकरण की जानकारी छिपाने के आधार पर वर्ष 2008 में उसकी सेवा समाप्त कर दी गई। विभाग ने उसकी अपील भी खारिज कर दी। अधिवक्ता विजय त्रिपाठी ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को दोषमुक्त किया जा चुका है। यह प्रकरण पुलिस ने दर्ज नहीं किया था, बल्कि परिवाद के जरिए पंजीकृत कराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अवतार सिंह मामले में न्याय दृष्टांत दिया है कि यदि किसी पर साधारण अपराध है तो नियुक्ति निरस्त करते वक्त उसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए। सुनवाई के बाद कैट ने कर्मचारी की सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त कर दिया।
 

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