Fundamental Rights During Protests: देशभर में प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट के पास क्या हैं अधिकार? जानिए इसकी शक्तियां

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। इंडिया गठबंधन और सीजेपी की ओर से उनके इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इस बीच, प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को जरूरी निर्देश दिए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि देश में बड़े राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन होने पर सुप्रीम कोर्ट की क्या भूमिका होती है? नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत के पास कौन-कौन सी शक्तियां हैं? आइए जानते हैं कि संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट किन मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।
1. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और मौलिक अधिकारों की रक्षा
भारतीय संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार मिला हुआ है।
हालांकि, ये अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं हैं। कानून-व्यवस्था और अन्य संवैधानिक आधारों पर इन पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट यह जांच सकता है कि प्रशासन की ओर से लगाए गए प्रतिबंध कानून के अनुरूप हैं या नहीं और कहीं उनसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नागरिक मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। अदालत मामले की परिस्थितियों के आधार पर उचित आदेश जारी कर सकती है।
2. गैरकानूनी हिरासत और गिरफ्तारी पर कार्रवाई
बड़े राजनीतिक या सामाजिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ लोगों को हिरासत में ले सकती है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने या गिरफ्तार करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
अगर किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है, तो अदालत उसके मामले में हस्तक्षेप कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस जैसी रिट जारी कर सकता है। इसके जरिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करने और हिरासत की वैधता की जांच करने का आदेश दिया जा सकता है।
इस तरह अदालत यह सुनिश्चित करने में भूमिका निभाती है कि प्रशासन की कार्रवाई कानून के दायरे में रहे और किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का मनमाने ढंग से हनन न हो।
3. इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने के लिए जरूरी हैं कानूनी आधार
बड़े प्रदर्शनों या तनावपूर्ण परिस्थितियों के दौरान प्रशासन इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगा सकता है। हालांकि, इस तरह के प्रतिबंध मनमाने तरीके से नहीं लगाए जा सकते। इनके लिए कानूनी आधार होना और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में इंटरनेट सेवाओं पर अनिश्चितकालीन प्रतिबंध को स्वीकार्य नहीं माना था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसे प्रतिबंधों की समीक्षा होनी चाहिए और उन्हें संवैधानिक कसौटियों पर खरा उतरना चाहिए।
इसलिए इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने के फैसले को उचित कानूनी आधार, आवश्यकता और आनुपातिकता के आधार पर परखा जा सकता है। जरूरत पड़ने पर अदालत प्रशासन के फैसले की समीक्षा कर सकती है।
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4. आम लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन का ध्यान
प्रदर्शनों के दौरान कई बार सड़कों पर जाम लग जाता है। इससे मेट्रो, बस और अन्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है। स्कूल-कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों, नौकरीपेशा लोगों और अन्य यात्रियों को परेशानी होती है।
ऐसी स्थिति में प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि वह प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और आम लोगों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए। इसके लिए यातायात के वैकल्पिक रास्ते, सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन को सुचारु रखने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
यदि किसी मामले में मौलिक अधिकारों या कानून के उल्लंघन का सवाल उठता है, तो सुप्रीम कोर्ट उचित परिस्थितियों में सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दे सकता है। हालांकि, हर प्रदर्शन या यातायात संबंधी समस्या में सीधे सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी नहीं होता।
5. हिंसा होने पर पुलिस कर सकती है कानूनी कार्रवाई
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान अगर हिंसा होती है या कुछ लोग सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, तो प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। पुलिस का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
हालांकि, हिंसा रोकने के नाम पर की जाने वाली कार्रवाई भी कानून के दायरे में होनी चाहिए। बल प्रयोग की जरूरत पड़ने पर उसकी मात्रा और तरीका परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। कार्रवाई के दौरान नागरिकों के अधिकारों का ध्यान रखना भी जरूरी है।
अगर पुलिस की कार्रवाई में गैरकानूनी बल प्रयोग, मनमानी या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप सामने आता है, तो मामले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। अदालत संबंधित तथ्यों और कानून के आधार पर उचित आदेश दे सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों है अहम?
सुप्रीम कोर्ट का प्रमुख दायित्व संविधान की रक्षा करना और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में उचित न्यायिक राहत देना है। वह एक ओर नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा कर सकता है, तो दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित कर सकता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन की कार्रवाई कानूनी सीमाओं के भीतर रहे। हालांकि, अदालत की शक्तियों का इस्तेमाल मामले के तथ्यों, लागू कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर होता है। हर विवाद में एक जैसा आदेश लागू नहीं होता।
Created On :   12 Oct 2026 11:24 PM IST














