सीईसी विवाद और विरोध मार्च: पत्रकारों की हिरासत पर CPI सांसद का अमित शाह को पत्र, दिल्ली पुलिस पर कार्रवाई की मांग

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केरल से CPI सांसद पी. संदोष कुमार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया है कि "CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों को परेशान करना और हिरासत में लेना बंद किया जाए।
राज्यसभा सांसद का कहना है कि राजधानी के कई हिस्सों से आ रही रिपोर्टों से साफतौर पर पता चलता है कि पत्रकारों को जबरदस्ती उनके पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने से रोका जा रहा है। देश के सबसे पुराने अखबारों में से एक, 'द हिंदू' के एक संवाददाता को कल शाम नजरबंद कर दिया गया, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के संवाददाताओं को रिपोर्टिंग करने से रोका गया, और 1947 में बनी समाचार एजेंसी PTI के एक संवाददाता को हिरासत में लिया गया। मलयालम प्रेस (जैसे एशियानेट, मनोरमा, रिपोर्टर टीवी, मातृभूमि, न्यूज़ 24 मलयालम आदि) के पत्रकारों और कैमरा कर्मियों को भी पुलिस के सामने अपनी शिकायतें रखने के बावजूद पाबंदियों का सामना करना पड़ा है। YouTube पर मशहूर हिंदी पत्रकारों, जैसे अजीत अंजुम और श्याम मीरा सिंह (जिन्हें कल शाम हिरासत में लिया गया था), के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया गया। न्यूज़ पोर्टल 'पीकटी' (PeekTy) की एक महिला संवाददाता को बेरहमी से घसीटा गया और हिरासत में लिया गया।
केंद्रीय गृहमंत्रालय को लिखे पत्र में सीपीआई सांसद ने आगे लिखा है कि ज़्यादतियों की यह सूची अंतहीन है। एक वीडियो में कई हिरासत में लिए गए पत्रकारों को पुलिस की हिरासत वाली बस के अंदर से अपने पहचान पत्र दिखाते हुए देखा जा सकता है, जो राष्ट्रीय राजधानी में प्रेस की आज़ादी की स्थिति को दर्शाता है। जब पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने के लिए हिरासत में लिया जाता है, तो जनता के जानने के अधिकार में जानबूझकर बाधा डाली जाती है।
विरोध प्रदर्शनों को कवर करने के लिए पत्रकारों के पास PIB एक्रेडिटेशन (मान्यता) होना ज़रूरी है, इस बात पर पुलिस का बार-बार ज़ोर देना बेतुका और तर्कहीन है। मौजूदा एक्रेडिटेशन दिशानिर्देश मीडिया के बदलते परिदृश्य के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहे हैं। 15-20 साल के अनुभव की जरूरतें 'द वायर', 'द क्विंट' और 'स्क्रॉल' जैसे विश्वसनीय डिजिटल समाचार संगठनों के उदय को समायोजित नहीं कर सकतीं, जबकि स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और YouTube, Facebook और Instagram-आधारित समाचार चैनल भी PIB एक्रेडिटेशन के बिना वैध पत्रकारिता का काम करते हैं। नागरिक भी मोबाइल तकनीक के माध्यम से घटनाओं को रिकॉर्ड करते हैं और साझा करते हैं।
PIB एक्रेडिटेशन को पत्रकारिता के लिए जरूरी शर्त या सार्वजनिक जगहों से रिपोर्टिंग करने का लाइसेंस नहीं माना जा सकता। ऐसी मनमानी पाबंदियां प्रेस की आजादी और जनता के सूचना पाने के अधिकार को कमज़ोर करती हैं, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए बहुत जरूरी है। इस मामले में कल सुप्रीम कोर्ट के दखल और संयुक्त राष्ट्र में जताई गई चिंताओं से इन तौर-तरीकों को खत्म करने की जरूरत और साफ़ हो गई है।
लोकतंत्र में ऐसी मनमानी के लिए कोई जगह नहीं है। स्वतंत्र रिपोर्टिंग में रुकावट डालकर, अधिकारी जनता की इस सोच को और मजबूत करते हैं कि सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों को छिपाने की कोशिश कर रही है। मेरी मांग है कि आप दिल्ली पुलिस को तुरंत साफ निर्देश दें कि वे पत्रकारों को परेशान करना, मनमाने ढंग से हिरासत में लेना और उनके काम में रुकावट डालना बंद करें।
पत्र में सांसद ने यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि वे उन स्थानों पर जा सकें जहां वे कानूनी तौर पर अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं, और सिर्फ PIB एक्रेडिटेशन न होने के आधार पर भेदभाव न करें। गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लेने, डराने-धमकाने और मारपीट करने की सभी घटनाओं की जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। सरकार लोकतंत्र को बनाए रखने का दावा नहीं कर सकती जब वह पुलिस का इस्तेमाल पत्रकारों को लोगों तक जानकारी पहुंचाने से रोकने के लिए कर रही हो। सांसद ने गृहमंत्रालय से इस मामले में तत्काल दखल देने का आग्रह किया है।
Created On :   12 Oct 2026 3:26 PM IST












