'रिजीम चेंज': विरोध को विदेशी साजिश बताना कितना सही? भागवत के बयान पर विपक्ष का पलटवार, समर्थन में भी उठे तर्क

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के नागपुर में विजयादशमी पर दिए भाषण के बाद देश में विरोध-प्रदर्शनों, चुनाव आयोग की भूमिका और लोकतंत्र में असहमति के अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। भागवत ने फ्रांस, नेपाल, बांग्लादेश और अल्बानिया की हिंसात्मक प्रदर्शन और घटनाओं का हवाला देते हुए भारत को कमजोर करने की कोशिशों के प्रति सतर्क रहने की बात कही। उन्होंने कहा कि आंदोलन समाधान के लिए होने चाहिए, समाज में विभाजन पैदा करने के लिए नहीं। लेकिन उनके बयान पर सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार से जवाब मांगने वाले हर आंदोलन को राजनीतिक साजिश के चश्मे से देखना उचित है?
विपक्ष के नाराजगी की वजह देखना जरूरी है
भाजपा नेताओं ने भागवत के बयान का समर्थन करते हुए प्रदर्शनों और विदेशी फंडिंग की भूमिका पर सवाल उठाए। दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों ने पलटवार करते हुए पूछा कि जब केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं, तो अलग-अलग वर्गों को सड़कों पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ रही है? विपक्ष के नेताओं का कहना है कि आरोप लगाने की बजाय जनता की नाराजगी के कारणों की जांच होनी चाहिए। कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर उठ रहे सवालों पर भी बीजेपी के रुख को चुनौती दी।
ईसी पर सवाल उठाना व्यवस्था विरोधी कैसे?
आरएसएस चीफ भागवत ने कहा कि आंदोलन संविधान की मर्यादा में रहकर होने चाहिए और उनका उद्देश्य समाधान होना चाहिए। इस तर्क से असहमति जरूरी नहीं है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही अहम होता है,क्योंकि संविधान देश के नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और सत्ता से सवाल करने का अधिकार देता है। चुनाव आयोग जैसे संस्थानों की निष्पक्षता पर सवाल उठें, तो उनका जवाब पारदर्शिता और तथ्यों से देना चाहिए। सवाल पूछने वालों को केवल राजनीतिक या बाहरी ताकतों से प्रभावित बताना उनकी चिंताओं का समाधान नहीं है। साथ ही, किसी भी आंदोलन में हिंसा या कानून उल्लंघन हो तो उसकी जांच प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। ना कि सियासी विरोध में।
भाजपा की राजनीतिक लाइन के करीब भागवत का बयान
भागवत की चेतावनी सामाजिक एकता, अनुशासन और आंदोलनों के दुरुपयोग से सावधान रहने पर जोर देती है। कुछ जानकार हालिया प्रदर्शनों के संदर्भ में भागवत के बयान को भाजपा की राजनीतिक लाइन के करीब बता रहे है। भागवत के बयान के बाद से विपक्षी आंदोलनों पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
एकता जरूरी, लेकिन जवाबदेही भी
भागवत की यह बात महत्वपूर्ण है कि समाज में मतभेद दुश्मनी में न बदलें और आंदोलन का लक्ष्य समाधान हो। लेकिन लोकतंत्र में एकता का अर्थ असहमति छोड़ देना नहीं है। सरकारों की जवाबदेही, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई, शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवाल तथा चुनावी प्रक्रिया में भरोसा भी सामाजिक एकजुटता के ही आधार हैं। विपक्ष को भी अपने आरोप प्रमाणों के साथ रखने चाहिए और आंदोलनों को शांतिपूर्ण बनाए रखना चाहिए। आखिरकार राष्ट्र की एकता केवल विरोध को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि उन समस्याओं का समाधान करने से मजबूत होगी जिनके कारण लोग विरोध करने निकलते हैं।
क्या था संघप्रमुख का बयान?
आपको बता दें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 20 अक्टूबर 2026 को नागपुर में विजयादशमी के वार्षिक उत्सव पर दिए संबोधन में बाहरी ताकतों द्वारा भारत में 'रिजीम चेंज' और अशांति फैलाने की कोशिशों से सावधान रहने की चेतावनी दी। उन्होंने पश्चिम से आ रही संस्कृति विरोधी आंधी और सामाजिक अलगाव की साजिशों के प्रति देशवासियों को आगाह किया। भागवत ने अपने बयान में कहा कि फ्रांस, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों की तरह भारत को भी कमजोर करने और यहां अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही हैं। उन्होंने देश में हो रहे प्रदर्शनों को पश्चिम से आने वाल खतरा बताया। मोहन भागवत ने बीते दिन मंगलवार को कहा कि भारत को तोड़ने की कोशिशें सफल नहीं होंगीयह सोचना ग़लत है कि सत्ता बदलने से परिस्थितियां बदल जाएंगी, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है और आगे भी ऐसा नहीं होगा। आंदोलनों से बदलाव नहीं आता और समस्याओं का समाधान समाज के भीतर से ही निकलता है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम से एक ऐसा तूफान आ रहा है जो व्यवस्था, सुरक्षा और संस्कृति को नष्ट करना चाहता है। आरएसएस चीफ ने अपने भाषण में आंदोलनों के राजनीतिकरण होने के खतरों से आगाह करते हुए कहा कुछ लोग राजनीतिक फायदों के लिए देश में विरोध प्रदर्शनों और मतभेदों का इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए कर रहे हैं। मोहन भागवत ने शताब्दी वर्ष के इस खास मौके पर कहा कि संघ के अनुशासन और सांस्कृतिक प्रयासों के कारण ही भारत का हिंदू समाज और राष्ट्र मजबूत बना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भागवत के भाषण को प्रेरणादायी बताया, जबकि विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दीं।
Created On :   21 Oct 2026 5:49 PM IST












