पीएम की अपील, छोटा हुआ काफिला: प्रधानमंत्री, मंत्री, सीएम अपने काफिले में क्यों रखते हैं ज्यादा गाड़ियां? ऐसे तय होती है कारकेड की लंबाई, एक मंत्री के निधन के बाद मप्र में बने थे नए नियम

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। किस दर्जे के नेता कितना बड़ा काफिला रख सकते हैं? क्या सभी के काफिले में गाड़ियों की संख्या समान होती है? क्या हर नेता को काफिला रखने की इजाजत है? आखिर लोग इतने सारे सवाल क्यों कर रहे हैं? दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईंधन बचत वाली अपील के बाद नेताओं का अपने कारकेड का आकार घटाने का सिलसिला जारी है। इसी के बाद से काफी लोग काफिले की सुरक्षा, नियमों सहित अन्य जानकारी पाने में दिलचस्पी रख रहे हैं। तो चलिए एकदम आसान भाषा में जानते हैं कि किस नेता को कितना बड़ा काफिला आवंटित किया जाता है? इसी के साथ ये भी समझने की कोशिश करते हैं कि अगर हर काफिले का आकार एक जैसा नहीं होता तो भी आए दिन सड़कों पर नेताओं के साथ गाड़ियों की लंबी कतार क्यों नजर आती है?
किस दर्जे के नेता के पास कितना बड़ा काफिला?
भारत में मंत्रियों के काफिले का आकार उनके पद, सुरक्षा श्रेणी और खतरे को देखते हुए निर्भर किया जाता है। आमतौर पर राज्य मंत्री और छोटे पद वाले नेताओं के साथ 2 से 4 गाड़ियां चलती हैं जिनमें उनकी मुख्य गाड़ी, एक सुरक्षा वाहन और कभी-कभी पुलिस एस्कॉर्ट शामिल होता है।
केंद्रीय मंत्री और बड़े राज्यों के मंत्री अक्सर 4 से 8 गाड़ियों के काफिले में चलते हैं, जिसमें पायलट गाड़ी, फॉलो वाहन, सुरक्षाकर्मी और पुलिस एस्कॉर्ट शामिल रहते हैं। हालांकि, जरूरत पड़ने पर काफिले में मौजूद गाड़ियों की संख्या कम या ज्यादा भी की जा सकती है। आपको बता दें कि, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री जैसे वीआईपी मंत्रियों को Z+ श्रेणी की सुरक्षा मिलती है। इनके काफिले में आमतौर पर 11 से 15 गाड़ियां (पायलट, एस्कॉर्ट, जैमर और पुलिस गाड़ियां) शामिल होती थीं।
मुख्यमंत्री का काफिला भी वीआईपी मंत्रियों जितना ही बड़ा होता है और उसमें कई सुरक्षा वाहन, पायलट कार, फॉलो गाड़ियां, पुलिस एस्कॉर्ट और कभी-कभी एंबुलेंस भी शामिल रहती है। जानकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्रियों को Z या Z+ श्रेणी की सुरक्षा ही दी जाती है।
प्रधानमंत्री का काफिला देश में सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित माना जाता है, जिसमें बुलेटप्रूफ कार, कई कमांडो वाहन, जैमर वाहन, रिजर्व गाड़ियां, एंबुलेंस और भारी सुरक्षा घेरा शामिल होता है। अलग-अलग राज्यों और परिस्थितियों के हिसाब से गाड़ियों की संख्या कम या ज्यादा हो सकती है।
MP-MLA को नहीं मिलता काफिला!
सांसद और विधायक को आमतौर पर स्थायी रूप से बड़ा काफिला नहीं मिलता है। उनकी सुरक्षा उनके पद, इलाके और खतरे के स्तर पर निर्भर करती है। ज्यादातर विधायकों और सांसदों के पास अपनी निजी या सरकारी गाड़ी होती है। अगर किसी नेता को खतरा माना जाता है तो उन्हें पुलिस गार्ड, एस्कॉर्ट वाहन या सुरक्षा कर्मी दिए जा सकते हैं। कई बार बड़े सांसदों के साथ 1 या 2 फॉलो वाहन भी चलते हैं। किसी भी सामान्य विधायक और सांसद आमतौर पर छोटे काफिले में चलते हैं। वहीं, खतरे के वक्त सुरक्षा बढ़ाई जा सकती है।
सुरक्षा श्रेणी के आधार पर तय होता है काफिले का आकार
X Security
एक्स सुरक्षा में नेता के साथ कम संख्या में सुरक्षाकर्मी रहते हैं और जरूरत पड़ने पर स्थानीय पुलिस भी मदद करती है। इसमे आमतौर पर बड़ा काफिला नहीं होता 1-2 गाड़ियां होती हैं।
Y Security
वाई सुरक्षा में नेता को ज्यादा सुरक्षाकर्मी दिए जाते हैं, जो यात्रा और सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान उनकी सुरक्षा करते हैं। इस सुरक्षा में 2-3 वाहन शामिल होते हैं।
Y+ Security
वाई प्लस सुरक्षा में हथियारबंद कमांडो भी शामिल हो सकते हैं और नेता के आसपास कड़ी निगरानी रखी जाती है। इसमें 3-5 वाहन चलते हैं।
Z Security
जेड सुरक्षा में बड़ी सुरक्षा टीम, एस्कॉर्ट गाड़ियां और कई सुरक्षाकर्मी शामिल होते हैं, जो हर समय नेता की सुरक्षा में तैनात रहते हैं। इसमें 5 से 8 वाहन साथ चलते हैं।
Z+ Security
जेड प्लस सुरक्षा सबसे मजबूत वीआईपी सुरक्षा मानी जाती है जिसमें विशेष कमांडो, बुलेटप्रूफ वाहन, बड़ा काफिला और कई स्तर की सुरक्षा व्यवस्था शामिल होती है। इसमें 8 से 15 वाहन शामिल होते हैं।
SPG सुरक्षा
स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (SPG) भारत की सबसे विशेष सुरक्षा एजेंसी है। इसका काम प्रधानमंत्री और कुछ खास वीआईपी की सुरक्षा करना होता है। इसमें आमतौर पर 10 से 20 या उससे ज्यादा गाड़ियों का बड़ा काफिला शामिल हो सकता है। इसमें बुलेटप्रूफ कार, पायलट गाड़ी, फॉलो वाहन, कमांडो वाहन, जैमर वाहन, स्थानीय पुलिस एस्कॉर्ट, रिजर्व सुरक्षा गाड़ियां और एंबुलेंस शामिल रहती हैं। पूरे काफिले के साथ विशेष प्रशिक्षित कमांडो और सुरक्षा अधिकारी हर समय तैनात रहते हैं। यात्रा से पहले रास्तों, पुलों, भवनों और कार्यक्रम स्थल की पूरी जांच की जाती है ताकि किसी भी खतरे से तुरंत निपटा जा सके।
मप्र में इसलिए बदले नियम
मप्र में पहले मंत्रियों के काफिले को लेकर कोई विशेष नियम नहीं थे। लेकिन मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मण सिंह गौड़ की 11 फरवरी 2008 को देवास बायपास पर एक भयानक कार हादसे में मौत हो गई थी। इंदौर से राजधानी भोपाल जाते वक्त उनकी कार हादसे का शिकार हो गई थी। इसी के बाद से काफिले की सुरक्षा से जुड़े नियमों में भारी बदलाव किए गए ताकि किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचा जा सके।
हादसे के बाद काफिलों में पायलट गाड़ी और फॉलो वाहन की भूमिका बढ़ाई गई, ताकि रास्ता पहले से सुरक्षित रखा जा सके। रात में तेज रफ्तार यात्रा पर ज्यादा सावधानी बरतने की बात हुई। यात्रा से पहले सड़क और रूट की जांच को भी अधिक जरूरी माना जाने लगा। कई जगह काफिले की गाड़ियों के बीच सही दूरी रखने, बेहतर संचार व्यवस्था रखने और आपात स्थिति के लिए एंबुलेंस या रिजर्व वाहन रखने पर भी ध्यान बढ़ा। इसके अलावा रात में जरूरी न होने पर सफर को रोकने पर जोर दिया गया।
बड़ा काफिला बना रौब झाड़ने का जरिया?
काफिला सुरक्षा के लिए दिया जाता है लेकिन कुछ नेता इसे रौब झाड़ने का जरिया बना लेते हैं। यही वजह है कि वह अपने काफिले में जरूरत से ज्यादा गाड़ियां रखते हैं। जरूरी नहीं कि हर नेता को काफिला या फॉलो वाहन आवंटित किया जाए लेकिन इसके बावजूद उन्हें दर्जनों गाड़ियों के बीच से निकलते हुए देखा जा सकता है। इससे केवल और केवल ईंधन का दुरुपयोग होता है। सौभाग्य सिंह ठाकुर (BJP, मध्य प्रदेश), राकेश सिंह जादौन (BJP, मध्य प्रदेश) और अमित सतम (BJP, मुंबई) कुछ ऐसे चेहरे हैं जो बड़े काफिले के चलते सवालों के घेरे में रहे।
पीएम की अपील का नहीं पड़ा कोई असर
मिडिल ईस्ट तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईंधन बचत वाली अपील के बाद कई नेताओं ने अपने काफिलों का आकार कम कर दिया है। लेकिन इसके बावजूद कुछ नेताओं पर अब भी असर नहीं पड़ा है। हाल ही में एमपी के बीजेपी नेता सौभाग्य सिंह ठाकुर को विशाल काफिले के साथ देखा गया था। न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक, ठाकुर सैंकड़ों की संख्या में गाड़ियां लेकर उज्जैन से भोपाल पहुंचे। इसके अलावा भाजपा विधायक प्रीतम लोधी 200 गाड़ियों के काफिले के साथ नजर आए।
ताजा बदलाव
मध्य पूर्व संकट के बीच ईंधन संकट की भी संभावना जताई जा रही है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी बढ़ने लगी हैं। इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईंधन बचत करने की अपील की थी। इसी अपील को ध्यान में रखते हुए कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों ने अपने काफिलों के आकार को लगभग आधा कर दिया है। पीएम ने खुद भी काफिले से गाड़ियां कम कर दी हैं। जानकारी के मुताबिक, पहले पीएम के काफिले में 18-20 गाड़ियां चलती थीं। वहीं, अब इसकी संख्या घट कर 9-10 हो गई है। प्रधानमंत्री के काफिले में ज्यादातर एसयूवी गाड़ियां होती हैं जो आम तौर पर 6 से 8 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती हैं। चलिए एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए पीएम के काफिले की सभी गाड़ियां 100 किलोमीटर चलती हैं। ऐसे में पहले जहां 250-300 लीटर ईंधन लगता था वही अब घट कर केवल 100-150 लीटर लगेगा। इससे पेट्रोल और डीजल की अच्छी खासी बचत होगी और लोगों में जागरूकता भी फैलेगी।
मालूम हो कि, पीएम के अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, एमपी के दोनों उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और जगदीश देवड़ा, एमपी के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने भी अपने काफिले की गाड़ियों को कम कर दिया है। अब देखना यह होगा कि ईंधन संकट से बचने के लिए यह फैसला कितने दिन तक लागू रहता है?
Created On :   14 May 2026 5:31 PM IST












