Vishwa Rang 2026: विश्वरंग 2026 में भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला की वैश्विक चेतना पर हुआ सार्थक विमर्श

विश्वरंग 2026 में भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला की वैश्विक चेतना पर हुआ सार्थक विमर्श
“कला, साहित्य और संस्कृति के माध्यम से विश्वबंधुत्व का संदेश”

भोपाल। भोपाल में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव – ‘विश्वरंग’ इस बार एक नई पहल के रूप में बिहार के पटना एवं नालंदा में 3 से 8 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। ‘विश्वरंग 2026’ का पहला चरण पटना में भारतीय संस्कृति, साहित्य, कला, भाषा और दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की सांस्कृतिक चेतना पर केंद्रित रहा और इसके तहत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। विश्व रंग फाउंडेशन, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल तथा डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, वैशाली की मेजबानी में आयोजित इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के साथ विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों, शिक्षाविदों एवं संस्कृतिकर्मियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में प्रख्यात चिंतक, लेखक एवं पूर्व राजनयिक पवन के. वर्मा ने ‘दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर व्याख्यान देते हुए भारत और इन देशों के बीच भाषा, साहित्य, दर्शन, कला एवं सांस्कृतिक परंपराओं के ऐतिहासिक संबंधों पर प्रकाश डाला। प्रख्यात साहित्यकार एवं लेखक लीलाधर मंडलोई ने भारतीय साहित्य और कला की समृद्ध परंपरा तथा उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर विचार साझा किए।

उद्घाटन अवसर पर बिहार सरकार के मंत्री प्रमोद कुमार ने कहा कि ज्ञान, संतों, साहित्य और संस्कृति की गौरवशाली भूमि बिहार में विश्वरंग का आयोजन ऐतिहासिक अवसर है। उन्होंने कहा कि विश्वरंग कला, संस्कृति, साहित्य और भाषाओं को साझा मंच प्रदान करते हुए भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को वैश्विक संवाद से जोड़ रहा है।

बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि तकनीक और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव के बीच विश्वरंग जैसे आयोजन युवा पीढ़ी को पुस्तकों, साहित्य, कला और संस्कृति से जोड़कर उन्हें रचनात्मक एवं सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

विश्व रंग फाउंडेशन के चेयरमैन एवं डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, वैशाली के कुलाध्यक्ष संतोष चौबे ने कहा कि भारतीय भाषाएँ हमारी संवेदना, संस्कृति और ज्ञान परंपरा की वाहक हैं। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा तथा हिंदी को एक कौशल के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए बताया कि विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप अनुवाद, नाट्य, चित्रकला और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के केंद्रों का विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में कला, साहित्य, संस्कृति और मानवीय अनुभवों से विकसित होने वाली ‘वास्तविक बुद्धिमत्ता’ और संवेदनशीलता की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।

पटना की सड़कों पर निकली विश्वरंग की सांस्कृतिक शोभायात्रा में बिहार के लोक कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और लोकवाद्यों के माध्यम से राज्य की समृद्ध लोकसंस्कृति का जीवंत प्रदर्शन किया। शोभायात्रा ने भारतीय सांस्कृतिक विविधता और एकात्मता का संदेश दिया।

आयोजन के दौरान यह भी घोषणा की गई कि प्रेमचंद रंगशाला, पटना में मुंशी प्रेमचंद की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाएगी। संतोष चौबे ने कहा कि प्रेमचंद की स्मृतियों से जुड़े इस स्थान पर उनकी प्रतिमा स्थापित करना साहित्यिक पूर्वजों और उनकी विरासत के प्रति सम्मान का प्रतीक होगा।

8वीं टैगोर बाल कला कार्यशाला में बच्चों ने दिखाई रचनात्मक प्रतिभा

विश्वरंग के अंतर्गत आयोजित 8वीं टैगोर बाल कला कार्यशाला में सैकड़ों विद्यार्थियों ने चित्रकला, मूर्तिकला, प्रिंटमेकिंग और फोटोग्राफी की विभिन्न विधाओं का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। वरिष्ठ कलाकारों एवं कला विशेषज्ञों ने बच्चों के साथ संवाद करते हुए उन्हें रचनात्मक मार्गदर्शन दिया। कार्यशाला के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

साहित्य और रंगमंच ने भी बांधा दर्शकों को

विश्वरंग के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में साहित्य, कला और रंगमंच की विविध प्रस्तुतियाँ प्रमुख आकर्षण रहीं। समापन अवसर पर प्रख्यात रंग निर्देशक एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में दिल्ली के ‘संभव’ आर्ट ग्रुप ने संतोष चौबे की चर्चित कहानियों ‘उनके हिस्से का प्रेम’ और ‘लेखक बनाने वाले’ का प्रभावशाली मंचन किया। प्रस्तुतियों में प्रेम, लेखकीय महत्वाकांक्षा और साहित्य में बढ़ते बाजारवाद जैसे विषयों को प्रभावी रंगमंचीय शैली में प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत ‘विश्वरंग फिल्म’ के प्रदर्शन से हुई। इसके बाद 8वीं टैगोर राष्ट्रीय कला संगोष्ठी के अंतर्गत महान फिल्मकार सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म The Inner Eye का प्रदर्शन किया गया, जिसने भारतीय कला-दृष्टि और रचनात्मकता के विशिष्ट आयामों से दर्शकों को परिचित कराया।

इस अवसर पर विश्वरंग कैटलॉग तथा चतुर्वेदी समाज की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित 12 खंडों में प्रकाशित ग्रंथों का लोकार्पण भी किया गया।

पटना में आयोजित विश्वरंग 2026 ने साहित्य, कला, लोकसंस्कृति, भाषा और रंगमंच को एक साझा मंच पर लाकर भारतीय सांस्कृतिक चेतना को वैश्विक संवाद से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया। आयोजन का समापन ‘फिर मिलेंगे’ की भावना और नई रचनात्मक यात्रा की उम्मीद के साथ हुआ।

अब अगले चरण में विश्वरंग की गतिविधियां नालंदा विश्वविघालय में 6-8 अक्टूबर तक आयोजित की जाएंगी, इसमें देशभर के शिक्षाविद, साहित्यकार, कलाकार विभिन्न सत्रों में सबङागिता करेंगे। इसमें प्रमुख सत्र “दक्षिण एशियाई भाषाओं का सांस्कृतिक अंतर-संबंध और भारतीय भाषाएं”, “अनुवाद-भाषा, परंपरा और विकास”, “पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्वी देशों की आर्थिक-सांस्कृतिक चेतना”, “नालंदा के ज्ञान-परंपरा और भविष्य के विश्वविघालय”, “भारतीय भाषाई सांस्कृतिक चेतना एवं एकता के सूत्र”, “बहुभाषा कविता पाठ” इत्यादि 30 से अधिक सत्र शामिल हैं।

Created On :   6 Oct 2026 7:42 PM IST

Tags

Next Story