काव्य भास्कर: वो जमाना बहुत अच्छा था जो बीत गया - अब सोचता हूँ कि मैं एक रोबोट बन जाऊँ - डॉ. सुनील कुमार दास

New Delhi News. समय बदल रहा है और उसके साथ रिश्तों, संवेदनाओं और जीवन-मूल्यों को देखने का नजरिया भी बदल रहा है। डॉ. सुनील कुमार दास की यह कविता ‘रोबोट बन जाऊँ...’ इसी बदलते दौर पर एक संवेदनशील सवाल उठाती है। कविता में मां-बाप के प्रति बदलते व्यवहार, रिश्तों में आती दूरी और इंसान के भीतर बढ़ती पीड़ा को सहज शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है। तकनीक के इस दौर में कवि का ‘रोबोट बन जाने’ का विचार दरअसल उस संवेदनशील मन की पुकार है, जो चोट, उपेक्षा और बदलते सामाजिक मूल्यों से बचना चाहता है। डॉ. सुनील कुमार दास इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय EMPC (IGNOU) के एडिशनल डायरेक्टर के पद पर कार्य कर चुके हैं। मीडिया संचार के क्षेत्र में उनका पेशेवर अनुभव महत्वपूर्ण माना जाता है।
वो जमाना जो बीत गया....अब सोचता हूँ कि मैं एक रोबोट बन जाऊँ
अब सोचता हूँ कि मैं एक रोबोट बन जाऊँ,
न कुछ कहूँ... न कुछ सुनाऊँ...
ऐसे ही तो दिन थे कभी,
जब सुबह उठते थे,
तो हम माँ का चेहरा देखते थे।
माँ के चेहरे पर अगर खुशी होती थी,
तो पूरा दिन खुशियों से भरा होता था,
लेकिन अगर माँ के चेहरे पर मायूसी होती,
तो लगता मानो
बगीचे में मुरझा गए हों सभी गुलाब।
मानो हर सुबह माँ इंतज़ार करती है—
कब खुलेगा बच्चों के घरों का दरवाज़ा,
और उनके चेहरे पर खुशी देखकर
वह भी खुश होगी।
नहीं तो ऐसे काटेगी पूरा दिन,
जैसे कोई दे गया हो उसे सज़ा!
पहले माँ बनाती थी घर में
उपमा... दही-बड़े...
और भी बनते थे अच्छे-अच्छे पकवान।
और हम सब भाई-बहन
लाइन में बैठ जाते थे
लकड़ी के पीढ़े पर...
नहीं जाते थे कभी बाहर
खाने की कोई दुकान ढूँढ़ने के लिए।
आज तो स्विगी, ज़ोमैटो का ज़माना है...
किसी भी टाइम, किसी भी दिन,
कुछ भी मँगवाकर खा सकते हैं बच्चे।
मंगलवार और गुरुवार को चिकन...
माँ प्रतिरोध नहीं कर पाती,
कहीं घर में बातों की महाभारत न छिड़ जाए।
पिता का अब कोई महत्त्व नहीं लगता,
उन्हें तो सुनकर
अनसुना कर देते हैं बच्चे।
असमंजस भरा है
माँ-बाप के लिए यह समय—
कहो तो परेशानी,
न कहो तो भी परेशानी।
कहो तो—
"पहले मुझे क्यों नहीं टोका?"
यह कहकर रूठ जाना...
कैसा है यह ज़माना!
अब तो शादी करने की ज़रूरत नहीं है...
लिव-इन रिलेशन में रह लेंगे।
शादी करेंगे तो बच्चा क्यों करें?
कौन पालेगा उन्हें?
फिर कौन बँधा रहेगा
ज़िम्मेदारियों की ज़ंजीरों में?
हाँ, अब सोचता हूँ
कि मैं एक रोबोट बन जाऊँ,
न कुछ कहूँ... न कुछ सुनाऊँ...
मोबाइल जैसे किसी सिस्टम में ढल जाऊँ।
अँगूठा लगाते ही
या आँख का रेटिना स्कैन करने पर
कुछ भी करने को तैयार हो जाऊँ।
अब तो लगता है,
इंसान बना रहा तो तकलीफ़...
लोग भरे बाज़ार में कुछ भी कह देंगे,
पीठ पीछे बुराई करेंगे,
मन खराब होगा...
आँखें नम होंगी...
लेकिन रोबोट और AI के ज़माने में
इंसान का क्या काम है?
इसलिए सोचता हूँ
कि मैं एक रोबोट बन जाऊँ।
शायद इंसान बनकर
जो सम्मान खो चुका हूँ,
वह वापस हासिल कर सकूँ।
क्या मेरे मन-मंदिर के
स्वतंत्र स्वरूप का
बदलते इस दौर में
यही निशान होगा?
या फिर...
इंसान बने रहना ही
सबसे बड़ी चुनौती है?
Created On :   23 Aug 2026 7:11 PM IST











