गणेश पुराण में उल्लेख: यहां पुराणों की आस्था से गूंजती हैं इतिहास की घंटियां, पेशवाकालीन निशानी से जुड़ी है बप्पा की भव्य मूर्ति

यहां पुराणों की आस्था से गूंजती हैं इतिहास की घंटियां, पेशवाकालीन निशानी से जुड़ी है बप्पा की भव्य मूर्ति
  • महागणपति के दरबार में अंगारकी पर उमड़ता है श्रद्धा का सागर
  • स्वयंभू प्रतिमा से पेशवाकालीन निशानी तक हर कड़ी सुनाती है अलग कहानी
  • गणेश पुराण में राजूर का उल्लेख

डिजिटल डेस्क, जालना, संदीप बदनापुरकर. जालना से करीब 27 किलोमीटर दूर राजूर का श्री गणेश मंदिर मराठवाड़ा की धार्मिक पहचान में अहम स्थान रखता है। यहां आस्था केवल गणपति दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराणों की मान्यताओं, प्राचीन परंपराओं और मराठा इतिहास की स्मृतियों से भी जुड़ी है। सामान्य दिनों में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है, जबकि चतुर्थी और विशेषकर अंगारकी चतुर्थी पर भक्तों का सागर उमड़ पड़ता है।


गणेश पुराण में राजूर का उल्लेख

धार्मिक मान्यता के अनुसार, राजूर को गणेशजी के 21 सिद्धस्थानों में विशेष स्थान प्राप्त है। इसे महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में नाभि स्थान तथा पूर्ण पीठ के रूप में भी माना जाता है। गणेश पुराण के क्रीड़ाखंड में इसका उल्लेख ‘राजसदन’ के रूप में मिलता है, जिसे आगे ‘राजापुरी’ और फिर ‘राजूर’ नाम से जोड़ा जाता है। उत्तरखंड की कथा के आधार पर यहां विराजमान गणेश प्रतिमा को स्वयंभू माना जाता है। ये मान्यताएं धार्मिक परंपरा और स्थानीय आस्था पर आधारित हैं।

हेमाडपंथी मंदिर से भव्य स्थापत्य तक

मंदिर मूलतः प्राचीन हेमाडपंथी शैली का बताया जाता है। 26 सितंबर 1985 से इसके पुनर्निर्माण का कार्य शुरू हुआ। वर्तमान मंदिर अष्टपैलू आकार का है और इसके निर्माण में ओडिशा, गुजरात तथा राजस्थान की स्थापत्य शैलियों का समन्वय दिखाई देता है। हेमाडपंथी नक्काशी, ओडिशा शैली का शिखर, राजस्थानी छतरियां, दीपस्तंभ और पंचधातु का विशाल कलश इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। कलश करीब नौ फीट ऊंचा, साढ़े चार फीट चौड़ा और 13 क्विंटल वजनी बताया जाता है।


पेशवाकालीन घंटा और दीपदान की परंपरा

मंदिर परिसर में वर्ष 1722 में पेशवा शासनकाल में भेजे गए घंटे का उल्लेख मिलता है। वहीं, अखंड दीप और दीपदान की परंपरा भी यहां की पहचान है। पेशवा चिमाजी अप्पा द्वारा भी यहां दीपदान किए जाने की परंपरा बताई जाती है।

महागणपति के सामने अखंड दीप जलते रहते हैं। दीप के प्रकाश में राजुरेश्वर की प्रतिमा तेजोमय दिखाई देती है। इस तेजस्वी प्रतिमा के दर्शन से श्रद्धालु स्वयं को धन्य मानते हैं। मान्यता है कि राजुरेश्वर से की गई मनोकामना पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु श्री राजुरेश्वर को नंदादीप अर्पित करते हैं।


अंगारकी पर रात से ही शुरू होती है भक्ति

संकष्टी चतुर्थी पर अभिषेक, अथर्वशीर्ष पाठ और मोदक का भोग लगाया जाता है। अंगारकी चतुर्थी पर मध्यरात्रि में महापूजा के बाद मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं।

श्रावण में सहस्र अथर्वशीर्ष पाठ, भाद्रपद में ध्वजारोहण और शोभायात्रा, अनंत चतुर्दशी की महापूजा, नवरात्र, दशहरा और कार्तिक दीपोत्सव सहित वर्षभर विभिन्न धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। इसी निरंतर भक्ति-परंपरा ने राजूर को महाराष्ट्र के प्रमुख गणेश तीर्थों में अलग पहचान दिलाई है

Created On :   9 Sept 2026 7:47 PM IST

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