तीन पीढ़ियां, एक सपना Part 3: एक बेटी की शिकायत, बेटे की सोच और जियो का जन्म: कैसे एक पारिवारिक बातचीत ने भारत को जोड़ा

एक बेटी की शिकायत, बेटे की सोच और जियो का जन्म: कैसे एक पारिवारिक बातचीत ने भारत को जोड़ा

घर पर इंटरनेट की परेशानी से शुरू हुई एक बातचीत ने जियो की नींव रखी। आगे चलकर यही नेटवर्क देश में लॉकडाउन के दौरान लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा बना।

दूसरे भाग में हमने देखा कि कैसे मुकेश अंबानी ने अपने पिता धीरूभाई अंबानी के सपने को वैश्विक स्तर तक पहुंचाया। अब कहानी उस बातचीत की है, जिसने भारत के जुड़ने और संवाद करने का तरीका बदल दिया।

कारोबार की दुनिया के कुछ सबसे बड़े विचार बेहद साधारण परिस्थितियों में जन्म लेते हैं।

एक शिकायत, जिसने बदल दी सोच

वर्ष 2011 में ईशा अंबानी येल यूनिवर्सिटी से घर आई थीं और अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुटी थीं। इस दौरान घर का इंटरनेट कनेक्शन बार-बार परेशान कर रहा था। मुकेश अंबानी ने बाद में सार्वजनिक रूप से बताया था कि ईशा ने शिकायत की थी कि घर में इंटरनेट की सुविधा अच्छी नहीं है।

भारत के लाखों परिवार इस परेशानी को आसानी से समझ सकते थे। लेकिन इस छोटी-सी शिकायत के बाद जो हुआ, उसने देश की डिजिटल यात्रा को एक नई दिशा दी।

आकाश अंबानी की सोच: भविष्य डेटा का है

आकाश अंबानी ने इस समस्या को एक अलग नजरिए से देखा।

उनके पिता की पीढ़ी के लिए टेलीकॉम का मतलब मुख्य रूप से वॉयस कॉल था—कॉलिंग मिनट, टैरिफ और दो लोगों के बीच बातचीत। लेकिन आकाश की पीढ़ी के लिए इंटरनेट जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका था। पढ़ाई, मनोरंजन, खरीदारी, बैंकिंग और अपनों से जुड़े रहने तक, हर काम में इंटरनेट की भूमिका बढ़ रही थी।

आकाश का मानना था कि भविष्य डेटा का है।

मुकेश अंबानी भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि ब्रॉडबैंड और भारत के डिजिटल भविष्य को लेकर ईशा और आकाश के विचारों ने उनकी सोच को प्रभावित किया।

एक शाम की बातचीत ने तीन पीढ़ियों के नजरिए में आए बदलाव को सामने ला दिया। धीरूभाई अंबानी ने भारत के छोटे निवेशकों में छिपी संभावनाओं को पहचाना था। मुकेश अंबानी ने भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप बड़े पैमाने पर कारोबार खड़ा करने का अवसर देखा। वहीं, आकाश ने समझा कि इंटरनेट केवल कुछ संपन्न लोगों की सुविधा बनकर नहीं रहेगा, बल्कि आम जीवन की जरूरी बुनियादी सुविधा बनेगा।

सितंबर 2016: जब भारत तेजी से ऑनलाइन होने लगा

इसी सोच ने जियो की नींव तैयार की। सितंबर 2016 में व्यावसायिक सेवाएं शुरू होने के बाद किफायती मोबाइल डेटा बड़े पैमाने पर भारतीयों तक पहुंचने लगा। कुछ साल पहले तक जिस बदलाव की कल्पना करना मुश्किल था, वह तेजी से हकीकत बन गया।

छात्र ऑनलाइन कक्षाओं से पढ़ाई करने लगे। छोटे दुकानदारों को मोबाइल के जरिए ग्राहक मिलने लगे। गुजरात के गांवों में रहने वाले परिवार मुंबई, दुबई या न्यू जर्सी में काम कर रहे अपने बच्चों से वीडियो कॉल पर बात करने लगे।

मनोरंजन, बैंकिंग और डिजिटल भुगतान जैसी सुविधाएं लोगों के हाथों तक पहुंचने लगीं। इंटरनेट धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया।

जब देश थम गया, तब लाखों लोगों का सहारा बना जियो

जियो की असली परीक्षा वर्ष 2020 में हुई। कोविड-19 महामारी के कारण जब देश में जनजीवन ठहर गया, तब घर ही स्कूल, कार्यालय और कई मामलों में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ने का माध्यम बन गए। ऐसे समय में जियो का नेटवर्क लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा साबित हुआ।

किफायती डेटा की मदद से विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रही, पेशेवर लोग घर से काम करते रहे और छोटे कारोबारियों को अपने ग्राहकों से जुड़े रहने का अवसर मिला। लॉकडाउन के कारण दूर हुए परिवार वीडियो कॉल के जरिए एक-दूसरे के करीब बने रहे।

मूल लेख के अनुसार, जियो ने अपने कम कीमत वाले जियोफोन उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त टॉकटाइम और अतिरिक्त डेटा की सुविधा भी दी, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर लोग संपर्क से कटे न रहें। देश में ऑनलाइन बैठकों का चलन बढ़ने के दौरान कंपनी ने अपना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म जियोमीट भी लॉन्च किया।

भारत के सबसे कठिन दौर में जियो ने दिखाया कि डिजिटल कनेक्टिविटी अब बिजली और पानी जैसी जरूरी सुविधाओं के समान महत्वपूर्ण हो चुकी है।

एक परिवार की इंटरनेट संबंधी परेशानी से शुरू हुई कहानी ने पूरे देश की आदतों को प्रभावित किया। और इस यात्रा के अगले चरण में आकाश अंबानी की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

एक घर से हर घर तक पहुंचा इंटरनेट

कहानी की शुरुआत एक परिवार में धीमे इंटरनेट को लेकर हुई शिकायत से हुई थी। लेकिन आगे चलकर यही सोच ऐसे नेटवर्क के विस्तार से जुड़ी, जिसने देश के कठिन महीनों में लोगों की पढ़ाई, कामकाज और बातचीत को जारी रखने में मदद की।

धीरूभाई से मुकेश और फिर आकाश तक पहुंची रिलायंस की कारोबारी सोच का मूल विचार यही रहा—जिस सुविधा या अवसर का लाभ कुछ लोगों को मिलता है, उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए।

1977 में यह विचार उद्योग में हिस्सेदारी के रूप में सामने आया था। 2016 में यही सोच इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार में दिखाई दी।

इस यात्रा से गुजरात को भी लाभ मिला है। और कहानी का अगला अध्याय भी नई संभावनाओं के साथ आगे बढ़ने वाला है।

जो लोग अब तक इस सफर का हिस्सा रहे हैं, उनके लिए आगे की यात्रा भी महत्वपूर्ण होगी।

अगले सप्ताह, इस सीरीज़ का अंतिम भाग: 1977 से आज तक—कैसे रिलायंस की कहानी गुजरात में एक पूरा चक्र तय करती है।

Created On :   13 Oct 2026 7:02 PM IST

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