ऐतिहासिक पहल: लंदन में संस्कृत शिक्षा को मिली नई उड़ान, महंत स्वामी महाराज ने अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का किया उद्घाटन

लंदन में संस्कृत शिक्षा को मिली नई उड़ान, महंत स्वामी महाराज ने अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का किया उद्घाटन
  • प्राचीन भारतीय ज्ञान को वैश्विक मंच पर पहुंचाने की पहल
  • उद्घाटन से पहले ही 350 युवा विद्यार्थी संस्कृत अध्ययन से जुड़े
  • संस्कृत से आध्यात्मिक परंपरा, आधुनिक अनुसंधान और नई पीढ़ी को जोड़ने पर जोर

डिजिटल डेस्क, लंदन। प्राचीन भारतीय ज्ञान और संस्कृत भाषा को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में लंदन में एक नई पहल हुई है। परम पूज्य महंत स्वामी महाराज ने BAPS श्री स्वामिनारायण मंदिर में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का उद्घाटन किया। निअस्डेन टेम्पल के नाम से लोकप्रिय यह मंदिर अब संस्कृत अध्ययन और संवाद के नए केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बनाएगा। खास बात यह है कि औपचारिक उद्घाटन से पहले ही करीब 350 युवा विद्यार्थी इस पाठशाला से जुड़ चुके थे।

इस पाठशाला की स्थापना महंत स्वामी महाराज की उस इच्छा को साकार करती है, जिसे उन्होंने 24 सितंबर को सत्संग दीक्षा सन्मान महोत्सव के दौरान लिखे पत्र में व्यक्त किया था। उन्होंने लंदन प्रवास के दौरान मंदिर में संस्कृत विद्यालय शुरू करने की इच्छा जताई थी। इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं इस संस्था का नाम भी रखा। पाठशाला के माध्यम से बच्चों और युवाओं को संस्कृत भाषा, भारतीय शास्त्रों तथा आध्यात्मिक ज्ञान से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

उद्घाटन समारोह में महामहोपाध्याय भद्रेशदास स्वामी ने संस्कृत अध्ययन की ऐतिहासिक परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भगवान स्वामिनारायण ने संतों को संस्कृत और शास्त्रों के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया तथा उच्च शिक्षा के लिए अनेक संतों को काशी भेजा। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए योगीजी महाराज ने 1961 में मुंबई में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। इसके बाद प्रमुखस्वामी महाराज ने 1973 में सारंगपुर में यज्ञपुरुष संस्कृत पाठशाला शुरू की। अब महंत स्वामी महाराज इस परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं।


भद्रेशदास स्वामी ने संस्कृत और वेदांत के क्षेत्र में किए गए शैक्षणिक कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों पर संस्कृत में पांच खंडों की टीका लिखी है। वर्ष 2018 में वैंकूवर में आयोजित 17वें विश्व संस्कृत सम्मेलन में अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन को वेदांत परंपरा के अंतर्गत एक विशिष्ट दर्शन-परंपरा के रूप में मान्यता दी गई थी।

संस्कृत की प्रासंगिकता केवल धार्मिक और आध्यात्मिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। पाणिनि की व्याकरण व्यवस्था की सटीकता का अध्ययन आज संगणकीय भाषाविज्ञान में भी किया जा रहा है। संस्कृत ग्रंथों के भाषा-प्रसंस्करण उपकरण विकसित करने पर भी काम हो रहा है। इसके अतिरिक्त, 2016 में NeuroImage में प्रकाशित एक समकक्ष-समीक्षित अध्ययन में वैदिक संस्कृत के पेशेवर पाठकों के मस्तिष्क के भाषा, स्मृति और दृश्य-प्रसंस्करण से जुड़े क्षेत्रों में संरचनात्मक भिन्नताओं की जानकारी दी गई थी। अध्ययन में इन भिन्नताओं को वर्षों के गहन कंठस्थ अभ्यास और पाठ से संबंधित बताया गया।

उद्घाटन समारोह में युवा विद्वानों ने संस्कृत में विशेष प्रस्तुति दी। रोचक संवाद के माध्यम से उन्होंने महंत स्वामी महाराज की पेरिस और लंदन यात्रा का उल्लेख करते हुए नई पाठशाला की स्थापना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। इस अवसर पर अक्षर-पुरुषोत्तम महाराज का पूजन, उद्घाटन शिलालेख का पूजन और महंत स्वामी महाराज द्वारा मंगलदीप प्रज्वलन किया गया।

अपने आशीर्वचन में महंत स्वामी महाराज ने संस्कृत में संबोधित करते हुए इस प्राचीन भाषा के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत का ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को अक्षर-पुरुषोत्तम महाराज की महानता समझने और अपनी आध्यात्मिक नींव मजबूत करने में सहायक होगा।

BAPS स्वामिनारायण संस्था आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य करती है। संस्था की शैक्षणिक गतिविधियों में संस्कृत, वेदांत और भारतीय दर्शन का अध्ययन भी शामिल है। संस्था के अनुसार, वर्ष 2026 में सामूहिक पाठ से पहले 3 से 13 वर्ष की आयु के 15,666 बच्चों ने सत्संग दीक्षा के सभी 315 संस्कृत श्लोक कंठस्थ किए थे। इसके बाद 2 फरवरी 2026 को 12,723 बच्चों ने एक साथ ग्रंथ का पाठ कर सबसे बड़े एकसाथ हिंदू ग्रंथ-पाठ का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स खिताब स्थापित किया।

लंदन में शुरू हुई यह पाठशाला भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और संस्कृत को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संवाद से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

Created On :   13 Oct 2026 5:52 PM IST

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