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तीन पीढ़ियां, एक सपना Part 2: मुकेश अंबानी - तेल से सौर ऊर्जा तक; जामनगर से दुनिया को ऊर्जा दे रहा गुजरात

पहले भाग में हमने देखा कि कैसे धीरूभाई अंबानी ने भारत के आम बचतकर्ताओं को शेयरधारक बनने का अवसर दिया। इस भाग में कहानी उनके बेटे मुकेश अंबानी की है, जिन्होंने इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए इसका दायरा और बड़ा किया।
एक बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा करना मुश्किल है। लेकिन पहले से स्थापित साम्राज्य की जिम्मेदारी संभालकर उसे कहीं अधिक बड़ा बनाना एक अलग तरह की चुनौती है।
2002 में धीरूभाई अंबानी के निधन के समय रिलायंस भारत के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक समूहों में शामिल हो चुका था। कई लोगों को उम्मीद थी कि उनके उत्तराधिकारी इस विरासत को सुरक्षित रखने पर ध्यान देंगे। लेकिन मुकेश अंबानी ने इससे बड़ा लक्ष्य तय किया—पिता की उस सोच को आगे बढ़ाना, जिसमें बड़े सपने देखना, मांग बढ़ने से पहले निवेश करना और पूरे उद्योगों की दिशा बदलने की क्षमता शामिल थी।
जामनगर: भारत की औद्योगिक क्षमता का प्रतीक
सौराष्ट्र के समुद्री तट पर स्थित जामनगर में यह महत्वाकांक्षा सबसे स्पष्ट दिखाई देती है। मुकेश अंबानी के नेतृत्व में जामनगर दुनिया के सबसे बड़े एकल-स्थल तेल रिफाइनिंग परिसरों में शामिल हुआ। यहां भारतीय इंजीनियरिंग और औद्योगिक क्षमता वैश्विक स्तर पर काम करती है और दुनिया के विभिन्न बाजारों तक पहुंचने वाली ऊर्जा को प्रोसेस किया जाता है।
गुजरात के लिए जामनगर केवल एक औद्योगिक केंद्र नहीं रहा। इसने निवेश, रोजगार, तकनीकी कौशल और सप्लायर व सेवा प्रदाताओं के एक बड़े नेटवर्क को बढ़ावा दिया। साथ ही, गुजरात को वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर मजबूत पहचान दिलाई।
आज इसी क्षेत्र में धीरूभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा कॉम्प्लेक्स भी रिलायंस की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों की दिशा में बढ़ते कदम का प्रतीक है। यह बदलाव पारंपरिक ऊर्जा कारोबार से आगे बढ़कर नई ऊर्जा के क्षेत्र में कंपनी की महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है।
फैक्ट्रियों से आम लोगों की जिंदगी तक पहुंच
नरोदा की टेक्सटाइल मिल ने रिलायंस को भारतीय घरों तक पहुंचाया था। मुकेश अंबानी ने इस जुड़ाव को कई नए क्षेत्रों तक विस्तारित किया।
रिलायंस रिटेल ने बड़े शहरों के साथ छोटे शहरों में भी संगठित रिटेल का विस्तार किया। इसके बाद मीडिया और मनोरंजन, डिजिटल सेवाओं और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में कंपनी की मौजूदगी बढ़ी।
एक ही पीढ़ी में रिलायंस का सफर कपड़ों के धागे से आगे बढ़कर उस परिवार की खरीदारी, मनोरंजन और दुनिया से जुड़ने के तरीकों तक पहुंच गया।
इस विस्तार के पीछे एक साझा कारोबारी सोच रही—ऐसे क्षेत्रों में प्रवेश करना, जिनमें भविष्य की बड़ी संभावनाएं हों; बड़े पैमाने पर निवेश करना; पुरानी धारणाओं को चुनौती देना और नए बाजारों का निर्माण करना।
शेयरधारकों के साथ भरोसे का रिश्ता
रिलायंस की स्थापना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विरासत सार्वजनिक निवेशकों के साथ उसका रिश्ता भी रहा।
2006 में रिलायंस पेट्रोलियम का बड़ा सार्वजनिक निर्गम आया, जिससे रिलायंस के एक और बड़े कारोबार में आम निवेशकों की भागीदारी का अवसर बना। वर्ष 2009 में रिलायंस पेट्रोलियम का रिलायंस इंडस्ट्रीज में विलय हो गया।
1977 से रिलायंस की यात्रा पर नजर रखने वाले परिवारों के लिए यह दशकों से बने रिश्ते का एक और अध्याय था।
धीरूभाई अंबानी ने भारतीय मध्यवर्ग को यह विश्वास दिलाया कि वह देश की औद्योगिक प्रगति में हिस्सेदार बन सकता है। मुकेश अंबानी ने दिखाया कि यही प्रगति वैश्विक स्तर पर कितनी बड़ी हो सकती है।
इसी वजह से मुकेश अंबानी को “नवयुग गुजरात ना शिल्पी”, यानी नए दौर के गुजरात का शिल्पकार, कहा जाता है।
लेकिन इस कहानी का सबसे नाटकीय अध्याय अभी बाकी था। इसकी शुरुआत किसी बोर्डरूम में नहीं, बल्कि परिवार की अपनी डाइनिंग टेबल पर होने वाली बातचीत से होनी थी।
साथ मिलकर बनाया, साथ मिलकर आगे बढ़ाया
जामनगर का निर्माण केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। इसमें गुजरात की जमीन, समुद्री तट, श्रमिकों और उस कारोबार पर भरोसा करने वाले लोगों का भी योगदान रहा है, जिसने समय के साथ अपने विस्तार को व्यापक बनाया।
यह साझेदारी हर पीढ़ी के साथ आगे बढ़ी—1977 के शेयरधारकों से लेकर आज रिलायंस के वैश्विक कारोबार को गति देने वाले समुदायों तक।
गुजरात इस कहानी में कभी केवल दर्शक नहीं रहा। इसने इस यात्रा को आकार देने में भूमिका निभाई है और अब इसके अगले अध्याय में भी राज्य के लिए नई संभावनाएं मौजूद हैं।
सीरीज़ का अगला भाग: एक बेटी की शिकायत, एक बेटे की सोच और वह पारिवारिक बातचीत, जिसने भारत को जोड़ने वाली कहानी को जन्म दिया।
Created On :   13 Oct 2026 6:48 PM IST









