सुप्रीम कोर्ट: शिवसेना मामले पर सुनवाई में सिब्बल ने पूछा - क्या विधायक दल की फूट को राजनीतिक दल की फूट माना जाए

शिवसेना मामले पर सुनवाई में सिब्बल ने पूछा - क्या विधायक दल की फूट को राजनीतिक दल की फूट माना जाए
  • संवैधानिक कामों के लिए ईमानदारी का स्तर ऊंचा होना चाहिए
  • उद्धव गुट के साथ थे 160 से ज़्यादा पदाधिकारी

New Delhi News. सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ मामले पर दूसरे दिन गुरुवार को भी सुनवाई जारी रही। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिवसेना (उद्धव) के अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करते हुए उसके फैसले को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची विधायक दल और राजनीतिक दल को अलग-अलग मानता है। शिवसेना में जो फूट हुई, वह विधायक दल में फूट थी। लेकिन इसे दल की फूट माना गया और चुनाव आयोग ने उसके आधार पर फैसला किया, जो गलत है। आयोग ने उस घटना को भी खारिज कर दिया जिसके आधार पर उद्धव ठाकरे के पार्टी प्रमुख रहते हुए एकनाथ शिंदे विधायक और मंत्री बने। कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।

विधायक दल को ही दल मानना गैर-संवैधानिक

उद्धव गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अपना पक्ष रखते हुए कई बुनियादी सवाल किए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने शिवसेना के संविधान को खारिज कर दिया था, क्या आयोग के पास ऐसा करने का अधिकार था। उन्होंने दावा किया कि 17 फरवरी, 2023 से सिर्फ़ विधायक दल को ही राजनीतिक दल मानने का चुनाव आयोग का तरीका गैर-संवैधानिक था। आय़ोग ने अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि 21 जून 2022 को शिवसेना में फूट का कोई पहली नजर में सबूत नहीं था।

उद्धव गुट के साथ थे 160 से ज़्यादा पदाधिकारी

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि शुरू में एकनाथ शिंदे के साथ कुछ ही विधायक थे, और विधानसभा अध्यक्ष ने उस पर फैसला किया, जो गलत रहा। शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यसमिति के 160 से ज़्यादा पदाधिकारी उद्धव ठाकरे के साथ थे, इसलिए फूट सिर्फ विधायक दल में हुई, पार्टी में कोई फूट नहीं हुई।उन्होंने कहा कि शिवसेना का संविधान एकनाथ शिंदे की बगावत से पहले भी मौजूद था। फूट के बाद एकनाथ शिंदे ने इसे खारिज कर दिया। शिंदे गुट जो उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के संविधान के आधार पर विधायक और मंत्री बने, उन्हें उसी संविधान को खारिज करने का हक नहीं था। उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे के पास शिवसेना का संविधान बदलने का अधिकार नहीं था।

चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को देने में आयोग ने की जल्दबाजी

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सिब्बल ने कहा कि विधायकों के अयोग्यता पर फैसला आने से पहले शिवसेना का चुनाव चिन्ह (धनुष-बाण) शिंदे गुट को देने का चुनाव आयोग का फैसला सरासर गलत था। उद्धव गुट ने आयोग से आग्रह भी किया था कि जब तक संविधान पीठ अयोग्यता का फैसला न कर दे, तब तक इंतजार करें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि इसके बाद की सभी घटनाएं चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के गलत फैसले की वजह से हुई।

व्हिप नियुक्त करना अयोग्यता का अहम पहलू

सिब्बल ने उद्धव गुट का पक्ष रखते हुए कहा कि शिंदे गुट ने एक अलग प्रस्ताव पारित कर अपना पार्टी व्हिप नियुक्त किया, जो अयोग्यता का एक अहम पहलू भी है। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि भले ही ये घटनाएं अयोग्यता याचिका के बाद हुईं, लेकिन इससे कानूनी नतीजे नहीं बदलते। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अयोग्यता प्रक्रिया में 23 जून, 27 जून और 2 जुलाई, 2022 की तारीखें अहम हैं।

सत्ता चुंबक की तरह होती है

सिब्बल ने उद्धव गुट का पक्ष रखते हुए कहा कि सत्ता चुंबक की तरह होती और हर कोई उसकी तरफ खींचता है। एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री बनने के बाद ही सत्ता का इस्तेमाल करके विधायकों और सांसदों की संख्या बढ़ाई। इस वजह से शिंदे गुट को जो बहुमत मिला वह वास्तविक नहीं था।

संवैधानिक कामों के लिए ईमानदारी का स्तर ऊंचा होना चाहिए

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान सिब्बल से सवाल किया कि जब हम संस्थानों में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन करने की बात करते हैं, तो एक सवाल उठ सकता है कि क्या एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर आपको भी इन सिद्धांतों का पालन नहीं करना चाहिए? इस पर सिब्बल ने कहा कि कुछ संस्थान संवैधानिक काम करते हैं और कुछ राजनीतिक काम। संवैधानिक कामों के लिए ईमानदारी का स्तर बहुत ऊंचा होना चाहिए। राजनीतिक कामों में सुधार किया जा सकता है।

Created On :   6 Aug 2026 9:56 PM IST

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