मंत्रायल: मंत्रियों के अपने लोगों की तैनाती पर फडणवीस का ब्रेक, कर्मचारियों को मूल विभाग में भेजने का सबसे बड़ा झटका एकनाथ शिंदे को लगा

मंत्रियों के अपने लोगों की तैनाती पर फडणवीस का ब्रेक, कर्मचारियों को मूल विभाग में भेजने का सबसे बड़ा झटका एकनाथ शिंदे को लगा
  • स्टाफ की कमी से जूझने लगे हैं मंत्रियों के विभाग
  • सबसे बड़ा झटका एकनाथ शिंदे को लगा
  • करीब 30 प्रतिशत कर्मचारी वापस लौटे

डिजिटल डेस्क, मुंबई। राज्य की महायुति सरकार में मंत्रालय के स्तर पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ऐसा प्रशासनिक शिकंजा कसा है, जिसका सीधा असर मंत्रियों के कामकाज और उनकी पसंद के कर्मचारियों की तैनाती पर पड़ा है। मुख्यमंत्री कार्यालय की समीक्षा के बाद मंत्रियों के कार्यालयों में निर्धारित प्रक्रिया के बिना काम कर रहे सैकड़ों कर्मचारियों और अधिकारियों को उनके मूल विभागों में वापस भेज दिया गया है। इनमें पीए, ओएसडी और निजी सचिव स्तर के कर्मचारी भी शामिल हैं। इसका असर भाजपा के साथ ही शिवसेना (शिंदे) और राकांपा (अजित) से जुड़े मंत्रियों पर भी पड़ा है। हालांकि सबसे बड़ा झटका उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को लगा है। खबर है कि अकेले शिंदे के विभागों से करीब 30 प्रतिशत कर्मचारी वापस लौट गए हैं। जिससे रोजमर्रा के कामकाज में स्टाफ की कमी साफ तौर पर दिखनी शुरू हो गई है।

मंत्री की पसंद नहीं, अब सीएम की मंजूरी जरूरी

दरअसल मंत्रियों के कार्यालयों में कर्मचारियों की तैनाती लंबे समय से प्रतिनियुक्ति, आउटसोर्सिंग और कई मामलों में मौखिक आदेशों के जरिए होती रही थी। पिछले महीने सामान्य प्रशासन विभाग ने ऐसी नियुक्तियों को रद्द करने का आदेश जारी किया था। कर्मचारियों को 10 सितंबर तक मूल विभाग में लौटने का निर्देश दिया गया था। आदेश का पालन नहीं करने पर वेतन रोकने की कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई थी। नई व्यवस्था का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि अब मंत्री अपने कार्यालय में मनमाने ढंग से अतिरिक्त स्टाफ नहीं रख सकेंगे। किसी अतिरिक्त कर्मचारी की जरूरत होने पर प्रस्ताव मुख्य सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास भेजना होगा। अंतिम मंजूरी मुख्यमंत्री कार्यालय से मिलने के बाद ही नियुक्ति संभव होगी।

550 कर्मचारी अनौपचारिक तरीके से काम कर रहे थे

महायुति सरकार ने मुख्यमंत्री कार्यालय समेत 40 मंत्री कार्यालयों के लिए 904 अस्थायी पद मंजूर किए थे। इनमें मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए 164, दोनों उप मुख्यमंत्रियों के कार्यालयों के लिए 72-72, कैबिनेट मंत्रियों के लिए 16-16 और राज्य मंत्रियों के लिए 14-14 पद निर्धारित किए गए थे। समीक्षा में 549 पद नियमित प्रक्रिया से भरे मिले, जबकि करीब 550 कर्मचारी अलग-अलग अनौपचारिक माध्यमों से मंत्री कार्यालयों में काम कर रहे थे। यहीं से विवाद का राजनीतिक पहलू सामने आया। उद्योग विभाग के एक अधिकारी ने दैनिक भास्कर को बताया कि 16 कर्मचारियों का निर्धारित स्टाफ उनके लिए अपर्याप्त है। विधानसभा के सवालों के जवाब, विभागीय फाइलें, सुनवाई, मतदाता क्षेत्र के काम और जनता की शिकायतें संभालने के लिए अतिरिक्त स्टाफ की जरूरत पड़ती है। इसलिए ज्यादातर मंत्रियों ने दूसरे विभागों से कर्मचारी बुलाए थे। अब वही व्यवस्था खत्म कर दी गई है। जिससे काम करने में परेशानी हो रही है।

शिंदे के विभाग सबसे अधिक प्रभावित

एकनाथ शिंदे स्वयं उपमुख्यमंत्री हैं और उनके कार्यालय के लिए 72 पदों का स्वीकृत ढांचा है। ऐसे में अतिरिक्त स्टाफ की वापसी का असर उनके कार्यालय पर भी पड़ना स्वाभाविक है। मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार शिंदे के विभाग में सबसे ज्यादा कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग पर रखा गया था। ऐसे में उन कर्मचारियों की वापसी से सबसे ज्यादा प्रभावित उनके विभाग ही हुए हैं। करीब 30 प्रतिशत कर्मचारी शिंदे के विभागों से उनके मूल विभागों में पहुंच गए हैं।

राजनीतिक संदेश साफ है

मंत्रालय में अब ‘मंत्री का आदमी’ होने से ज्यादा जरूरी निर्धारित प्रक्रिया और मुख्यमंत्री कार्यालय की मंजूरी होगी। फडणवीस सरकार ने नियुक्तियों की जांच, सत्यापन और मंजूरी की व्यवस्था को कड़ा कर दिया है। भविष्य में चरित्र प्रमाणपत्र, गोपनीय रिपोर्ट और विभागीय जांच जैसे रिकॉर्ड की जांच के बाद ही नियुक्ति की जाएगी।

Created On :   18 Sept 2026 9:40 PM IST

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