हाईकोर्ट के अहम फैसले: शिक्षण संस्थानों के बकाये पर सरकार को आखिरी मौका, पति को सुनवाई का अधिकार और हत्या-डकैती के दोषियों को राहत

शिक्षण संस्थानों के बकाये पर सरकार को आखिरी मौका, पति को सुनवाई का अधिकार और हत्या-डकैती के दोषियों को राहत
  • छात्रवृत्ति-शिक्षण शुल्क का बकाया 15 अक्टूबर तक चुकाने का आदेश, अवमानना की चेतावनी
  • भरण-पोषण मामले में पति को अपना पक्ष रखने का अवसर, पहले जमा करने होंगे 6.50 लाख रुपए
  • घड़ी और 14 हजार रुपए की बरामदगी से दोषसिद्धि नहीं, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां साबित न होने पर दो बरी

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में अहम निर्देश देते हुए राज्य सरकार, फैमिली कोर्ट और अभियोजन पक्ष को कानून के बुनियादी सिद्धांतों की याद दिलाई। एक मामले में शैक्षणिक संस्थानों की छात्रवृत्ति और शिक्षण शुल्क की बकाया राशि को लेकर सरकार को 15 अक्टूबर तक भुगतान और अनुपालन शपथपत्र दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया गया। दूसरे मामले में पत्नी को 35 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश पर पति को अपना पक्ष रखने का सशर्त अवसर दिया गया। वहीं, हत्या और डकैती के मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपी से कथित घड़ी और 14 हजार रुपए की बरामदगी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है।

सरकार को बकाया भुगतान की अंतिम डेडलाइन

न्यायमूर्ति आर. आई. छागला और न्यायमूर्ति फिरदोश पी. पूनीवाला की पीठ ने के. के. वाघ एजुकेशन सोसाइटी सहित विभिन्न गैर-सहायता प्राप्त और व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सरकार को 15 अक्टूबर तक बकाया राशि के भुगतान का आदेश दिया। अदालत ने 15 अप्रैल 2026 को तय समय-सीमा के बावजूद भुगतान पूरा नहीं होने पर नाराजगी जताई। सरकार को 15 अक्टूबर तक अनुपालन शपथपत्र दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 19 अक्टूबर को होगी।

35 हजार भरण-पोषण के आदेश पर पति को सशर्त राहत

न्यायमूर्ति एम. एम. साथये ने पति संघर्ष भीमराव लांजेवार की याचिका पर कहा कि प्राकृतिक न्याय के तहत उसे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए था। रायगढ़ फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 35 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने पति को छह सप्ताह में 6.50 लाख रुपए जमा करने पर साक्ष्य पेश करने और पत्नी के गवाहों से जिरह का अवसर देने का निर्देश दिया। राशि जमा होने पर पुराने आदेश पर पुनर्विचार होगा। राशि जमा नहीं करने पर फैमिली कोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा।

हत्या-डकैती में दो दोषी बरी, साक्ष्यों की कड़ी नहीं हुई साबित

न्यायमूर्ति एम. एस. कार्निक और न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटील की पीठ ने 2011 के मुंबई फ्लैट हत्या-डकैती मामले में आजीवन कारावास पाए दो आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपी से कथित घड़ी और 14 हजार रुपए की बरामदगी अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती। अभियोजन पक्ष घटना स्थल पर आरोपियों की मौजूदगी और अपराध में उनकी भूमिका को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। महत्वपूर्ण गवाह को अदालत में पेश नहीं किया गया, जबकि अन्य गवाहों के बयानों में विरोधाभास था। हाई कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए सेशन कोर्ट की सजा रद्द कर दोनों को रिहा करने का आदेश दिया।

Created On :   4 Oct 2026 10:05 PM IST

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