वापसी: अफवाह - डर और लोकतंत्र - नाम कटने के डर से पकड़ी मुलुक की राह, मुंबई छोड़ बंगाल पहुंच रहे मजदूर

अफवाह - डर और लोकतंत्र - नाम कटने के डर से पकड़ी मुलुक की राह, मुंबई छोड़ बंगाल पहुंच रहे मजदूर
  • बंगाल में वोट प्रतिशत बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह
  • मुंबई छोड़ बंगाल पहुंच रहे मजदूर

Mumbai News. शैलेश तिवारी। “अगर इस बार वोट नहीं दिया तो आगे नाम कट जाएग” यह एक वाक्य था, जिसने मुंबई और उसके आसपास काम करने वाले हजारों बंगाली मजदूरों को अपने गांव पश्चिम बंगाल लौटने पर मजबूर कर दिया। पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान फैली इसी आशंका अफवाह और अधूरी जानकारी ने ऐसा असर डाला कि काम-धंधा छोड़कर बड़ी संख्या में लोग अपने गांव पहुंच गए। पश्चिम बंगाल विधानसभा के पहले चरण के चुनाव में रिकॉर्ड वोटिंग का एक कारण यह भी रहा है। मुंबई के जवेरी बाजार से संचालित पश्चिम बंगाल वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष रंजीत दत्ता दैनिक भास्कर को बताते हैं कि इस बार का चुनाव सामान्य नहीं है। संस्था से जुड़े अधिकतर सदस्य मजदूर हैं, जो सोने के आभूषण बनाने का काम करते हैं। इस बार लगभग हर कोई वोट डालने के लिए गांव गया है। एसआईआर के चलते कई लोगों के नाम सूची से हटे हैं, और कम पढ़े-लिखे लोग ऑनलाइन चेक नहीं कर पा रहे, इसलिए वे खुद जाकर लिस्ट देख रहे हैं और मतदाता सूची में नाम होने पर वोट डाल रहे हैं। पालघर के कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने वाले मुकेश पाण्डेय कहते हैं कि हर साल गर्मियों में मजदूरों की कमी रहती है, लेकिन इस बार स्थिति कुछ ज्यादा विकट है। यहां ज्यादातर मजदूर बिहार, उड़ीसा, झारखंड और बंगाल के हैं, लेकिन इस बार बंगाल के लगभग सभी लोग चुनाव के लिए गांव चले गए हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। ज्वेलरी उद्योग भी इससे अछूता नहीं रहा। ज्वेल मेकर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय शाह बताते हैं सोने-चांदी की कीमतें पहले ही बढ़ी हुई हैं, जिससे काम थोड़ा धीमा था। ऊपर से मजदूर चुनाव के लिए चले गए हैं।

भिवंडी में मजदूरी करने वाले शंभू मंडल बताते हैं की ’मैं अपने गांव बंगाल के गौतमपुर आ गया हूं और पहले चरण में वोट भी डाल दिया। अब कुछ दिन बाद ही मुंबई लौटूंगा। गांव में मेरे परिवार के पांच वोट थे, लेकिन लिस्ट में सिर्फ मेरा नाम था, भाइयों का नाम नहीं था। हमें समझ नहीं आता ये सब कैसे होता है। लोगों ने कहा कि अगर इस बार वोट नहीं देंगे तो बच्चों का नाम भी आगे वोटर लिस्ट में नहीं जुड़ पाएगा, इसलिए सब काम छोड़कर आना पड़ा है।’ भिवंडी में ठेकेदार के रूप में काम करने वाले एबीदुर प्रधान भी अपने 15 मजदूरों के साथ गांव लौट गए हैं। वे बताते हैं कि वोटर लिस्ट में माता पिता का नाम है और बच्चे का भी है लेकिन मेरा नाम बीच में से कट जाता तो आगे बहुत दिक्कत होती। मुंबई में हमारा वोट है नहीं, इसलिए गांव आकर ही वोट देना जरूरी लगा। अब हमने तय किया है कि हर चुनाव में वोट देंगे। इसी तरह शेख मनीरूल इस्लाम भी डर और जिम्मेदारी के बीच गांव पहुंचे। उन्होंने कहा लोग बता रहे थे कि एसआईआर में नाम कट सकता है। हमें ज्यादा समझ नहीं है, लेकिन वोट देना जरूरी लगा, इसलिए मुंबई से गांव आ गया। मुंबई के उपनगर कुर्ला के एलबीएस रोड पर इमारत बना रहे घनश्याम तिवारी ने बताया कि मेरे पास अधिकांश मजदूर बंगाल से ही थे पर चुनाव में वोट डालने के लिए सभी लोग गांव चले गए। उन्हें रोकने की सारी कोशिश बेकाम रही। वे बोले इस बार वोट नहीं दिया तो हमेशा के लिए लिस्ट से नाम काट जाएगा। समाजिक कार्यकर्ता विनोद तिवारी कहते हैं, एक तरफ लोकतंत्र के प्रति जागरूकता दिखती है, तो दूसरी तरफ जानकारी की कमी और अफवाहों का असर भी साफ नजर आता है। कम पढ़े-लिखे मजदूरों के बीच फैली यह धारणा कि वोट नहीं देने पर भविष्य में उनके परिवार के अधिकार प्रभावित होंगे, उन्हें हजारों किलोमीटर दूर काम छोड़कर गांव खींच ले गई। बंगाल चुनाव में बढ़ा मतदान प्रतिशत जहां लोकतंत्र की मजबूती का संकेत देता है, वहीं यह भी बताता है कि सही जानकारी की कमी किस तरह बड़े स्तर पर सामाजिक और आर्थिक असर पैदा कर सकती है। मुंबई जैसे शहरों में जहां इन मजदूरों की मेहनत से कई उद्योग चलते हैं, वहां अचानक आई इस कमी ने कामकाज की रफ्तार को भी धीमा कर दिया है।

Created On :   26 April 2026 10:08 PM IST

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