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परेशानी: कोविड के बाद से मरीजों की संख्या हुई दोगुनी से अधिक, अब अस्पतालों में भी तारीख पर तारीख - मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना से बड़ी संख्या में आते हैं मरीज

Nagpur News. मेडिकल हब के रूप में पहचान बना चुके नागपुर में पिछले एक दशक में मरीजों की संख्या में चार गुना तक वृद्धि हुई है। कोविड के बाद मरीजों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। शहर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में रोजाना 10 हजार से अधिक मरीज आ रहे हैं। गर्मी के दिनों में यह आंकड़ा प्रतिदिन 12 हजार से अधिक होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। विदर्भ के 11 जिलों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना से बड़ी संख्या में मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। हर साल तेजी से बढ़ते मरीजों की संख्या के कारण अब मनुष्यबल व संसाधनों की कमी महसूस की जाने लगी है। अलग-अलग जांच के लिए तारीख पर तारीख दी जाती है।
1. शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (मेडिकल) मध्य भारत का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहां प्रतिदिन की ओपीडी औसत 3100 हैं। यहां 1600 से अधिक बेड क्षमता है। आपात स्थिति में 250 से अधिक बेड की व्यवस्था की जाती है।
2. इंदिरा गांधी शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय व अस्पताल (मेयो) की प्रतिदिन की ओपीडी 2700 से अधिक हो चुकी है। यहां 800 से अधिक बेड क्षमता है। आपात स्थिति में 100 से अधिक बेड की व्यवस्था की जा सकती है।
3. एम्स नागपुर में 900 से अधिक बेड क्षमता है। यहां भी आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त बेड की व्यवस्था की जाती है। यहां प्रतिदिन की ओपीडी संख्या औसत 3300 हो चुकी है।
4.डागा मेमोरियल महिला अस्पताल में 300 से अधिक बेड की सुविधा उपलब्ध है। यहां रोजाना की आेपीडी 900 से अधिक है।
5.नये जिला अस्पताल की बेड क्षमता 100 है। यहां की ओपीडी प्रतिदिन औसत 250 मरीज पहुंचते हैं।
हर साल तेजी से बढ़ रही मरीजों की संख्या
शहर के पांच प्रमुख अस्पतालों की रोजाना की कुल ओपीडी संख्या औसत 10150 तक पहुंच चुकी है। सूत्रों के अनुसार, कोराना से पहले ओपीडी आधी हुआ करती थी। कोरोना काल से यानि 2020 से ओपीडी संख्या साल दर साल बढ़ रही है। अब यह संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि शहर ने मेडिकल हब के रूप में बड़ी छलांग लगाई है, लेकिन इसी अनुपात में संसाधनों का विस्तार नहीं हो पाया है। वहीं मनुष्यबल की भी कमी है। सरकार ने मेडिकल और मेयो अस्पताल के लिए 1000 करोड़ रुपए से अधिक की विकास योजनाएं मंजूर की हैं, जिनमें नए भवन, सुविधाओं का विस्तार और सुपर स्पेशालिटी सेवाओं को बढ़ाने की योजना शामिल है।
30 से 40 फीसदी तक पदों की रिक्तियां
सबसे बड़ी समस्या मानव संसाधन की कमी बनी हुई है। डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों के 30 से 40 प्रतिशत तक पद खाली हैं, जिससे काम का दबाव बढ़ गया है। वर्तमान में यह हाल है कि मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। अलग-अलग जांच के लिए तारीख पर तारीख दी जाती है। महीनाभर से अधिक समय तक इंतजार करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब जरूरत केवल इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने की नहीं, बल्कि प्रशिक्षित मानव संसाधन और बेहतर प्रबंधन की है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बढ़ती मरीज संख्या के बीच व्यवस्था पर दबाव और अधिक बढ़ेगा।
Created On :   5 April 2026 8:31 PM IST













