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Nagpur News: वर्क और पर्सनल लाइफ के बीच हो सीमा, कहीं सोशल लाइफ बैलेंस, तो कहीं साइड इफेक्ट्स

Nagpur News. कोरोनाकाल के बाद बदली वर्किंग कल्चर ने वर्क और पर्सनल लाइफ के बीच की पारंपरिक सीमाओं (बॉउंड्री) को लगभग मिटा दिया है। वर्क फ्रॉम होम अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि नई वर्किंग स्टाइल का हिस्सा बन चुका है। पुणे, मुंबई, दिल्ली और बंगलुरु जैसे महानगरों के साथ अब नागपुर भी इस ट्रेंड में शामिल हो रहा है। शहर में 650 से अधिक आईटी और सॉफ्टवेयर कंपनियां सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 20 से 30 प्रतिशत कर्मचारियों को फुल-टाइम या हाइब्रिड वर्क फ्रॉम होम की सुविधा मिल रही है। इस बदलाव ने जहां युवाओं को मेट्रोसिटी की भागदौड़ से राहत दी है, वहीं एक नया सामाजिक और मानसिक परिदृश्य भी खड़ा कर दिया है। घर से काम करने की सुविधा ने समय और पैसे की बचत के साथ परिवार के करीब रहने का अवसर दिया है, लेकिन इसी के साथ वर्क और पर्सनल लाइफ के बीच की स्पष्ट सीमा धुंधली होती जा रही है, जो कई बार संतुलन बिगाड़ देती है।
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करियर ग्रोथ पर भी पड़ता है असर
स्थानीय साइकोलॉजिस्ट डॉ. कविता चांडक के अनुसार वर्क फ्रॉम होम जहां सुविधाजनक है, वहीं यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती भी बन सकता है। लगातार घर में रहने से व्यक्ति आइसोलेशन महसूस करता है और ‘स्विच ऑफ’ करना मुश्किल हो जाता है। इससे स्ट्रेस और थकान बढ़ती है। करियर ग्रोथ पर भी असर पड़ता है, क्योंकि नेटवर्किंग और विजिबिलिटी सीमित हो जाती है। दूसरी ओर नागपुर के युवाओं को इसका बड़ा लाभ मिला है। महंगे शहरों में रहने की जरूरत कम हुई है और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में अवसर बढ़े हैं। मिहान जैसे प्रोजेक्ट्स ने आईटी सेक्टर को मजबूती दी है। बावजूद इसके, संतुलित दिनचर्या, सीमाएं तय करना और सामाजिक जुड़ाव बनाए रखना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
दोस्त नहीं बन पाते
पायल भेंडे, आईटी कर्मचारी ने कहा कि मैं आईटी कंपनी में कार्यरत हूं। मुझे तो एक तरह से यह सुविधा सही लगती है, क्योंकि इससे घंटो ट्रेवल करके ऑफिस नहीं आना पड़ता। समय अपने हिसाब से मैनेज किया जा सकता है। इससे पैसे और समय दोनों की बचत होती है। इसका एक नुक्सान भी है कि हम कई दिनों तक कलिग्स से मिल नहीं पाते हैं। कोई ऑफिसियल मीट रहा, तभी मुलाकात होती है। ऐसे में वो दोस्ती का बांड नहीं बन पाता है।
काम और सोशल लाइफ
सत्यम राऊत, आईटी कर्मचारी ने कहा कि मैं पुणे की एक कंपनी में कार्यरत हूं। घर से ही काम करता हूं। कई बार मन होता है, तो अपने कलिग्स के साथ उत्तरखंड या हिमाचल में जाकर एक स्टे करते हैं और वहीं से काम करते हैं। इससे काम भी हो जाता है और घूमना भी। हां कई दिनों तक घर में रहना मेंटल स्ट्रेस बढ़ाता है। काम के साथ थोड़ा सुकून चाहिए, तो हम सभी ने यही रास्ता चुना है। काम भी करते हैं और सोशल लाइफ एक्सप्लोर भी करते हैं।
काम के लिए ऑफिस ही बेस्ट
अपूर्वा जहांगीरदार, आईटी कर्मचारी ने बताया कि मुंबई, दिल्ली और पुणे जैसे शहरों में इस वर्क फ्रॉम होम का चलन समझ में आता है, क्योंकि वहां रहने-खाने-पीने में इतने पैसे चले जाते हैं, जितनी की सैलरी नहीं होती। नागपुर में यह वर्किंग कल्चर नहीं चाहिए। कोविड के दौरान हमने घर से काम कर के और घर में रहकर देख लिया, बहुत मुश्किल है। घर से काम करना मतलब, ऑफिस स्ट्रेस भी झेलो और घर में होने वाले मेलोड्रामा भी, जिस वजह से काम करने वाले व्यक्ति को मेन्टल पीस नहीं मिल पाता, जो आज के दौर में बहुत जरूरी है। काम के लिए ऑफिस बने हैं। 8 से 10 घंटे की जॉब है वह बेस्ट है।
Created On :   22 March 2026 7:35 PM IST












