दैनिक भास्कर हिंदी: नागपुर की एक बस्ती ऐसी, जहां बनती हैं होली की रंग बिरंगी टोपियां

March 18th, 2019

डिजिटल डेस्क, नागपुर। मस्कासाथ पुलिया के आगे राऊत चौक से बाईं ओर मुड़ने के बाद थोड़ा आगे चलने पर बैरागीपुरा बस्ती है। यहां से पूरे विदर्भ और सीमा से सटे मध्य प्रदेश में टोपियों का निर्यात होता है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन टोपियों को कौन बनाता है, कितनी मेहनत की जाती है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि बैरागीपुरा बस्ती में लगभग हर घर के सामने महिलाएं होली के लिए रंग-बिरंगी टोपियां बनाती नजर आ जाती हैं। लालगंज नाईक तालाब के पास स्थित इस बस्ती के 25 से अधिक बैरागी परिवार टोपियां बनाने का काम करते हैं।  एक परिवार सीजन में 5 से 10 हजार टोपियां बनाता है। 10 हजार टोपी बनाने पर एक लाख रुपए का खर्च आता है। एक परिवार को 40 से 50 हजार रुपए का मुनाफा होता है। टोपियों के लिए रॉ-मटेरियल दिल्ली व शहर के थोक विक्रेताओं से खरीदा जाता है।  बैरागी समाज की महिलाएं दिन निकलते ही टोपियां बनाने में जुट जाती हैं। इसमें 12 साल से अधिक उम्र के बच्चे भी अपना योगदान देते हैं

कागज, खड्डा और रंगबिरंगी प्लास्टिक्स का उपयोग

होली के अवसर पर कई तरह की टोपियां सिर पर सजती हैं। इसमें फैन्सी टोपियां, लंबी तुर्रेवाली टोपियां, गोल राऊंड टोपियां, मोदी टोपी, राहुल टोपी, पिक्चर्स टोपी समेत अनेक डिज़ाइन में टोपियां बनती हैं। टोपियां बनाने के लिए अधिकतर कागज, खड्डा और रंगबिरंगी प्लास्टिक्स का उपयोग किया जाता है। इसके लिए कच्ची सामग्री स्थानीय बाजार से खरीदा जाता है। ज्यादा सामग्री मंगानी हो तो दिल्ली से सीधे खरीदारी की जाती है। इसके लिए दो-चार का समूह इकठ्ठा सामग्री लाते हैं। बाद में यहां बंटवारा होता है। तब जाकर टोपियां बनाने का काम शुरू होता है। पहले कागज या खड्डे को टोपी का आकार दिया जा सके इस हिसाब से कटिंग और आवश्यकतानुसार डिजाइन किया जाता है। इसके बाद उसे टोपी के आकार में चिपका दिया जाता है। चिपकाने के लिए आरारोट की बनायी चिक्की का इस्तेमाल किया जाता है या स्टैपल किया जाता है। सैंकड़ों टोपियां ढलने के बाद उसे रंगबिरंगे कागज चिपकाया जाता है। कुछ टोपियों को इलैस्टिक रबर लगाया जाता है। इस तरह कागज, खड्डा और चमकीली रंगबिरंगी पन्नियों को मिलाकर टोपियां बनती हैं।

विदर्भ व मध्य प्रदेश में होता है निर्यात

नागपुर महानगर पालिका ने बैरागीपुरा बस्ती में यहां के एक उद्यान को शहीद बाबुलालजी बैरागी उद्यान नाम दिया है। उद्यान के सामने बैरागीपुरा बस्ती और आसपास में होली की टोपियां बनायी जाती हैं। यहां से पूरे विदर्भ और सीमा से सटे मध्य प्रदेश में टोपियों का निर्यात होता है। पहले यहां आगरा के पंखों का आयात कर टोपियां बनायी जाती थीं लेकिन जबसे चायनीज टोपियों ने बाजार पर कब्जा किया है तब से आगरा के पंखों की टोपियां बनाने का काम बंद हो गया है। करीब 8 साल से यहां चायनीज स्टाइल टोपियां बन रहीं हैं। सूत्रों ने बताया कि इस समय टाेपियों के लिए जो रॉ-मटेरियल दिल्ली या शहर के होलसेलरों से खरीदा जा रहा है, वह सामग्री चायना की है। टोपियां बनाने वाला बैरागी समाज है। समाज के लोग होली से चार महीने पहले से टोपियां बनाने का काम करते हैं। हर परिवार एक सीजन में कम से कम 5 हजार और अधिक से अधिक 10 हजार टोपियां तैयार करता है। कई परिवार होलसेलरों के ऑर्डर के अनुसार काम करते हैं, तो कई खुद बिक्री करते हैं। 10 हजार टोपियां बनाने के लिए हरेक को 1 लाख रुपए तक लागत आती है। इसके बदले में उन्हें चार माह में 40 से 50 हजार रुपए का मुनाफा होता है। इसी से उनका चार महीने तक गुजारा होता है। बाकी दिनों में यह समाज अलग-अलग अवसरों पर दूसरे गांव-शहरों में लगने वाले तीर्थ मेलों में बिकने वाली अन्य सामग्री तैयार करता है। 

मेहनत के हिसाब से नहीं मिलता मुनाफा

बैरागी समाज के एक पदाधिकारी के अनुसार यह समाज 200 साल पहले पुराने मध्य प्रदेश से नागपुर आकर बसा था। बैरागी समाज 50 साल से टोपियां बनाने का काम कर रहा है। इस समय उनकी दूसरी पीढ़ी टोपियां बनाने का काम कर रही है। पहले 100 से अधिक परिवार यह काम करते थे, लेकिन अब केवल 25 परिवार ही यह काम करते हैं। जितनी मेहनत की जाती है, उस हिसाब से मुनाफा नहीं होने से धीरे-धीरे काम बंद हो रहा है। होलसेलर उनकी बनायी टोपियों पर अच्छी खासी कमाई करता है, लेकिन बनाने वाले को नाममात्र ही कमाई होती है। नागपुर शहर में 400 परिवार हैं। उनकी शहर में जनसंख्या लगभग 3 हजार है। इसके अलावा जबलपुर में बैरागी समाज की सर्वाधिक संख्या है। इसके अलावा भोपाल, सूरत, मुंबई, गोंदिया, भंडारा, रायपुर, अहमदाबाद आदि शहरों में यह समाज है। इसलिए रोटी-बेटी का अधिकतर व्यवहार इन्हीं शहरों के साथ जुड़ा है।