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नाराज जिला पंचायत की सीईओ ने कर दिया बैठक का बहिष्कार! 

नाराज जिला पंचायत की सीईओ ने कर दिया बैठक का बहिष्कार! 

डिजिटल डेस्क सतना। राज्य वित्त आयोग अनुदान मद की राशि के आवंटन पर सहमति नहीं बनने से नाराज जिला पंचायत की सीईओ ऋजु बाफना  सामान्य सम्मिलन की बैठक छोड़ कर चली गईं। सूत्रों के मुताबिक बाद में कुछ सदस्यों ने बैकडोर से खेद जताने की भी कोशिश की लेकिन जब ये कोशिश नाकाम रही तो जिला पंचायत की अध्यक्ष सुधा सिंह के नेतृत्व में सदस्यों के एक प्रतिनिधि मंडल ने कलेक्टर डा.सत्येन्द्र सिंह से मिलकर इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की। सीईओ बाफना के लिए जिला पंचायत का ये पहला सामान्य सम्मिलन था। राज्य वित्त आयोग अनुदान मद के तहत जिला पंचायत को 8 माह बाद 4 करोड़ 30 लाख रुपए की  राशि मिली है। इस मद के तहत जिला पंचायत अध्यक्ष 50 लाख, उपाध्यक्ष 20 लाख और सदस्य 15-15 लाख के अधोसंरचना के कार्य प्रस्तावित कर सकते हैं।
30 वर्ष में ऐसा पहली बार 
जानकारों ने बताया कि जिला पंचायत के 30 वर्ष के कार्यकाल में ये पहला मामला था जब किसी मुद्दे पर असहमति बनने पर स्वयं पदेन सचिव ने सामान्य सम्मिलन का बहिष्कार कर दिया हो। आमतौर पर ऐसा सदस्य ही करते रहे हैं। जिला पंचायत से जुड़ा अब तक ऐसा ये भी दूसरा मसला है,जब जिला पंचायत के लामबंद सदस्यों ने अपने ही मुख्य कार्यपालन अधिकारी के विरुद्ध कलेक्टर के पास जाकर हस्तक्षेप की गुहार लगाई हो। तकरीबन 3 वर्ष पहले तबके सीईओ संदीप शर्मा के खिलाफ सदस्यों ने तत्कालीन कलेक्टर नरेशपाल के सामने जा कर लामबंदी दिखाई थी।  
क्या है पूरा मामला 
सूत्रों ने बताया कि जिला पंचायत के सामान्य सम्मिलन की बैठक मंगलवार को  दोपहर एक बजे सीईओ और पदेन सचिव ऋजु बाफना की मौजूदगी में शुरु हुई। बैठक के एक सूत्रीय एजेंडा के तहत वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए सदस्यों द्वारा प्रस्तावित अधोसंरचना के कार्यों का अनुमोदन किया जाना था। इसी बीच कई सदस्यों ने कहा कि राज्य वित्त आयोग अनुदान मद से प्राप्त राशि में से उन हितग्राहियों को घर निर्माण के लिए राशि आवंटित की जानी चाहिए, जिनके घर हाल ही में हुई अतिवृष्टि से नष्ट हो चुके हैं। सदस्य इस बात पर  सहमत थे कि इसके लिए जनपद पंचायतों के माध्यम से जिला पंचायत में संबंधित पटवारियों से क्षति से संबंधित प्रतिवेदन  प्राप्त किए जाएं और उसी आधार पर पात्र ग्रामीणों को भवन निर्माण की राशि आवंटित कर दी जाए। जवाब में जिला पंचायत की सीईओ ने गाइड लाइन का हवाला देते हुए कहा कि अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और सदस्य स्वयं इस संबंध में प्रस्ताव प्रस्तुत करें। प्राप्त प्रस्तावों के परीक्षण के बाद राशि का आवंटन  कर दिया जाएगा।   
आखिर,क्यों बिगड़ी बात 
राज्य वित्त आयोग अनुदान मद की राशि आवंटन के मद में प्रकिया के प्रश्न पर तर्क-वितर्क चल ही रहे थे कि इसी बीच एक बड़बोले किस्म के सदस्य ने कुछ इस तरह से तंज कस दिया कि अंधेर नगरी और चौपट राजा। माना जा रहा है कि जिला पंचायत की सीईओ के लिए सदस्य का ऐसा व्यवहार अप्रत्याशित था। उन्होंने बीच में ही बैठक छोड़ी और चली गईं। उधर, कुछ सदस्यों ने दावे के साथ कहा कि तंज उनके जाने के बाद सामने आया। कुल मिलाकर असहमति के बीच बैठक महज 20 मिनट में ही बोल गई। कहते हैं, कुछ सदस्यों ने मीटिंग आफीसर के माध्यम से खेद जताने का संदेश सीईओ तक भेजा, लेकिन ये कोशिश भी नाकाम रही।   
 

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Real Estate: खरीदना चाहते हैं अपने सपनों का घर तो रखे इन बातों का ध्यान, भास्कर प्रॉपर्टी करेगा मदद

Real Estate: खरीदना चाहते हैं अपने सपनों का घर तो रखे इन बातों का ध्यान, भास्कर प्रॉपर्टी करेगा मदद

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। किसी के लिए भी प्रॉपर्टी खरीदना जीवन के महत्वपूर्ण कामों में से एक होता है। आप सारी जमा पूंजी और कर्ज लेकर अपने सपनों के घर को खरीदते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इसमें इतनी ही सावधानी बरती जाय जिससे कि आपकी मेहनत की कमाई को कोई चट ना कर सके। प्रॉपर्टी की कोई भी डील करने से पहले पूरा रिसर्च वर्क होना चाहिए। हर कागजात को सावधानी से चेक करने के बाद ही डील पर आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि कई बार हमें मालूम नहीं होता कि सही और सटीक जानकारी कहा से मिलेगी। इसमें bhaskarproperty.com आपकी मदद कर सकता  है। 

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ध्यान रखें की प्रॉपर्टी RERA अप्रूव्ड हो 
कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इस बात का ध्यान रखे कि वो भारतीय रियल एस्टेट इंडस्ट्री के रेगुलेटर RERA से अप्रूव्ड हो। रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवेलपमेंट एक्ट, 2016 (RERA) को भारतीय संसद ने पास किया था। RERA का मकसद प्रॉपर्टी खरीदारों के हितों की रक्षा करना और रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देना है। राज्य सभा ने RERA को 10 मार्च और लोकसभा ने 15 मार्च, 2016 को किया था। 1 मई, 2016 को यह लागू हो गया। 92 में से 59 सेक्शंस 1 मई, 2016 और बाकी 1 मई, 2017 को अस्तित्व में आए। 6 महीने के भीतर केंद्र व राज्य सरकारों को अपने नियमों को केंद्रीय कानून के तहत नोटिफाई करना था।