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हाईकोर्ट : गड्ढों के लिए जिम्मेदारों पर दर्ज हो मामला, 474 लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी

हाईकोर्ट : गड्ढों के लिए जिम्मेदारों पर दर्ज हो मामला, 474 लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी

डिजिटल डेस्क, नागपुर। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने सड़क पर गड्ढे और उनसे होने वाली दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठेकेदारों और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ जांच करके आपराधिक मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। गुरुवार को न्यायमूर्ति जेड.ए.हक और न्यायमूर्ति पुष्पा गनेड़ीवाला के समक्ष सू-मोटो फौजदारी रिट याचिका पर सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने पुलिस से जिम्मेदार ठेकेदारों, अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने पर भूमिका स्पष्ट करने के आदेश दिए थे। जवाब में पुलिस आयुक्त भूषण कुमार उपाध्याय ने शपथपत्र में कोर्ट को जानकारी दी कि बीते पांच महीने में गड्ढों के कारण 22 हादसे हुए हैं, जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु और 28 लोग जख्मी हुए हैं। इस मामले में संबंधित ठेकेदारों और आधिकारियों के खिलाफ भादवि 166, 283, 217 और 304-ए के तहत मामला बनता है। पुलिस आयुक्त ने कोर्ट को बताया कि ट्रैफिक सेल और ट्रैफिक उपायुक्त ने बार-बार मनपा, एनएचएआई, पीडब्लूडी, महामेट्रो और संबंधित अन्य विभागों को पत्र लिख कर बार-बार गड्ढे बुझाने की सूचना भी दी, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।  पुलिस ने अपने शपथपत्र में इसका उल्लेख नहीं किया कि उन्होंने इन मामलों में कितने ठेकेदारों, अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी दर्शाई। कोर्ट ने पुलिस और मनपा दोनों को जम कर लताड़ भी लगाई। कोर्ट ने पुलिस को 22 हादसों की जांच करके ठेकेदारों अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करने के आदेश दिए हैं। मामले में सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रशासन ने शहर की इस ज्वलंत समस्या को कोई महत्व नहीं दिया। यातायात विभाग द्वारा संबंधित विभागों को पत्र भेजने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। पूरा महकमा गड्ढों की समस्या और हादासों पर मूकदर्शक बना रहा, लेकिन पुलिस ने इन प्रकरणों में आपराधिक मामले दर्ज क्यों नहीं िकए, यह समझ के परे है। काम खत्म होने के बाद खुदी हुई सड़क को पहले जैसा नहीं करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ मनपा को कार्रवाई करनी थी, जो नहीं की गई। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को रखी है। मामले में न्यायालयीन मित्र एड. राहिल मिर्जा को एड. परवेज मिर्जा ने सहयोग किया। मनपा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.के. मिश्रा और राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील सुमंत देवपुजारी ने पक्ष रखा। 

नियमों का उल्लंघन करने वाले 474 लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी

इसके अलावा ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर केंद्रित सू-मोटो जनहित याचिका पर गुरुवार को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में सुनवाई हुई, जिसमें आरटीओ ने हाईकोर्ट को जानकारी दी कि यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले 474 लोगों के जब ड्राइविंग लाइसेंस चेक किए गए, तो उनका कोई रिकॉर्ड आरटीओ के पास नहीं मिला। मतलाब साफ है कि ये सभी ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी हैं। इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई में इस पर विस्तार से सुनवाई लेने का निर्णय लिया है। तब तक मामले से जुड़े सभी पक्षों को इस पर अपनी भूमिका तैयार रखने को कहा है। बता दें कि शहर की ट्रैफिक की समस्या पर हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति गठित कर रखी है। मुख्य सचिव ने विभागीय आयुक्त की उपसमिति स्थापित की है। हाईकोर्ट के पिछले आदेश पर आरटीओ ने अपने शपथपत्र में आगे बताया है कि 31 मई तक शहर में 17 लाख 8 हजार 500 वाहनों का पंजीयन हुआ है। वर्ष 2018 में यातायात पुलिस ने 1 हजार 529 वाहनों पर कार्रवाई का प्रस्ताव भेजा था। कार्रवाई करते हुए आरटीओ ने 783 लोगों के लाइसेंस निलंबित किए, 248 लोगों के प्रकरण आरटीओ उपायुक्त, नागपुर पूर्व की ओर, 18 नागपुर ग्रामीण और 6 वर्धा कार्यालय को भेजे गए। शेष 373 वाहन चालकों के लाइसेंस का कोई लेखा-जोखा नहीं मिला, ऐसे में वे बनावटी पाए गए हैं। वर्ष 2018 में 2 हजार 454 मामलों में से 1 हजार 272 लोगों के लाइसेंस निलंबित किए गए। ड्रंक एंड ड्राइव, तेज गाड़ी चलाने और गाड़ी चलाते वक्त फोन पर बात करने वाले इसमें शामिल हैं। वर्ष 2019 के जनवरी और फरवरी में यातायात पुलिस ने 563 प्रकरण आरटीओ को भेजे, जिसमें 154 लोगों के लाइसेंस निलंबित किए गए और 117 प्रकरणर उप क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी, नागपुर पूर्व को भेजे गए। 173 प्रकरण पर कार्रवाई जारी है। 119 लोगों के लाइसेंस का रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है। इस पर अब कोर्ट विस्तार से सुनवाई लेगा। 

पुलिस निरीक्षक पिदूरकर के खिलाफ बैठेगी जांच, हाईकोर्ट का आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने जमानती आरोपियों से पैसे मांगने के आरोपों में घिरे लकड़गंज पुलिस थाने के निरीक्षक भानुदास पिदूरकर की जांच पुलिस आयुक्त या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से करने के आदेश जारी किए है। अग्रिम जमानत पर चल रहे दो आरोपियों से थाने में हाजरी दर्शाने के एवज में पैसे मांगने का पिदूरकर पर आरोप है। हाईकोर्ट ने उन्हें मूल प्रकरण की जांच से हटा कर पुलिस उपायुक्त को सौंप दिया है। साथ ही पिदूरकर के खिलाफ जांच कर 16 अक्टूबर तक रिपोर्ट मंगाई है। लकड़गंज पुलिस थाने में दीना दास और नीरव सांघवी के खिलाफ भादंवि 406, 420 और 34 का मामला दर्ज था। इस मामले में हाईकोर्ट ने आरोपियों को अंतरिम अग्रिम जमानत देते हुए निमयित रूप से लकड़गंज पुलिस में हाजरी लगाने के आदेश दिए थे। आरोपियों ने 28 अगस्त के आदेश के मुताबिक पुलिस थाने में हाजरी लगाई और डायरी प्रस्तुत की। लेकिन इसी थाने के उपनिरिक्षण हरीचंद इंगोले द्वारा दायर शपथपत्र में 27 जुलाई से 2 सितंबर तक आरापियों को अनुपस्थित दर्शाया गया। ऐसे में आरोपियों द्वारा प्रस्तुत डायरी के हस्ताक्षर झूठे होने का दावा भी सरकारी वकील की ओर से हाईकोर्ट में किया गया। इसके बाद दोनों आरोपियों ने अपने शपथपत्र कोर्ट में प्रस्तुत किए। जिसमें जांच अधिकारी भानुदास पिदूरकर पर पैसे मांगने के आरोप लगाया। मामले में एसीबी में भी अधिकारी की शिकायत भी की गई।  इस मामले का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने आदेश जारी किया। आरोपियों की ओर से एड. देवेंद्र चौहान और सरकार की ओर से सरकारी वकील नितीन रोडे ने पक्ष रखा। 

वाड़ी में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने पर जवाब दो

अंबाझरी तालाब में ऑक्सीजन की कमी से मर रहीं मछलियों के मुद्दे पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ द्वारा दायर सू-मोटो जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई हुई। वाड़ी नगर परिषद ने अपना शपथपत्र प्रस्तुत किया। इसमें बताया गया कि अपने क्षेत्र में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए महाराष्ट्र जीवन विकास प्राधिकरण को 35 लाख रुपए भेज दिए गए हैं। इसके पूर्व उन्होंने प्राधिकरण को 17 लाख रुपए अदा किए थे। ऐसे में अब हाईकोर्ट ने प्राधिकरण को सोमवार तक अपना शपथपत्र प्रस्तुत करने के आदेश दिए है। पर्यावरणविदों के अनुसार बगैर प्रोसेस किए ही उद्योगों के रसायनयुक्त पानी को अंबाझरी तालाब में छोड़ा जा रहा है। नजदीकी रिहायशी इलाकों से भी प्रदूषित जल अंबाझरी में मिल रहा है। वाड़ी नगर परिषद मंे सीवेज ट्रीटमंेट प्लांट नहीं होने से सीवेज का सारा पानी तालाब में मिल रहा है। इससे समय के साथ-साथ तालाब में ऑक्सीजन की कमी हो गई, जिससे मछलियां मरने लगीं। तालाब के किनारे जब मरी हुई मछलियों का ढेर इकट्ठा हुआ, तो यह मुद्दा चर्चा में आया। मामले में नासुप्र की ओर से एड. गिरीश कुंटे, परिषद की ओर से एड. मोहित खजांची और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से एड. एस.एस सान्याल ने पक्ष रखा।
अनधिकृत निर्माणकार्य पर बिल्डर से मांगा जवाब

बिजली के तारों से छू कर बच्चों की मौत के बाद हाईकोर्ट ने लिया था संज्ञान

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने सुगतनगर की आर्मर टाउनशीप में अनधिकृत निर्माण करने वाले आर्मर बिल्डर्स से जवाब मांगा है। शहर में कुछ वर्ष पूर्व दो छोटे बच्चों की हाईटेंशन तारों के संपर्क में आने से मृत्यु हो गई थी। वे इसी टाऊनशीप के ही थे। इसके बाद भी ऐसे अन्य मामले सामने आए थे, जिसके बाद कोर्ट ने सूू-मोटो जनहित याचिका दायर की थी। इस मामले में मदद के लिए एक विशेष समिति गठित की गई थी। समिति ने शहर में अनेक निर्माण कार्य नियमों के विरुद्ध पाए। हाईकोर्ट की विशेष समिति ने कोर्ट को बताया था कि उन्हें 3934 परिसरों में बिजली नियमों का उल्लंघन होता मिला था। इसमें 3100 रिहायशी, 650 व्यावसायिक और 122 औद्योगिक इकाइयों का समावेश है। इसमें से 90 प्रतिशत लोगों ने मंजूर प्रारूप का उल्लंघन कर निर्माण कार्य किया है। हाईकोर्ट ने अवैध निर्माण गिराने के आदेश जारी किए थ्ज्ञे। हाईकोर्ट के आदेश पर सुगतनगर स्थित आर्मर टाउनशिप के अनधिकृत निर्माणकार्य को भी प्रशासन ने तोड़ दिया है। टाउनशिप निवासियों की अर्जी को हाईकोर्ट ने ठुकरा दिया था। मामले में दो सप्ताह बाद सुनवाई होगी। एड.श्रीरंग भंडारकर न्यायालीन मित्र है। मनपा की ओर से एड.सुधीर पुराणिक ने पक्ष रखा।
 

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राजस्थान में सियासी घमासान फिर तेज, मंत्रिमंडल विस्तार पर गहलोत-पायलट आमने सामने


डिजिटल डेस्क, जयपुर। पंजाब में जब से कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को दरकिनार कर कांग्रेस प्रदेश कमेटी का अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को बनाया है, तब से राजस्थान में पायलट गुट का भी जोश हाई है। अब पायलट गुट के दबाव के कारण मंत्रिमंडल पर नए सिरे से चर्चा हो रही है। मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल पर अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट के बीच तलवारें खिंच गईं हैं,  दोनों गुट आमने-सामने आ गये हैं। फिलहाल विस्तार की कोई तारीख तय नहीं है लेकिन यह माना जा रहा है कि अगले महीने इस पर कोई फैसला लिया जा सकता है। अभी गहलोत कैबिनेट में 9 पद खाली हैं। अगर कांग्रेस 'एक व्यक्ति एक पद' के फॉर्मूले को मानती है तो शिक्षा राज्य मंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा को अपना पद छोड़ना होगा। वैसे गोविंद डोटासरा ने यह कहकर कि 'मैं दो-चार दिन का मेहमान हूं' अपने जाने के संकेत दे दिये हैं। एक पद विधानसभा उपाध्यक्ष का भी खाली है।   
 
आंकड़ों के हिसाब से गहलोत कैबिनेट में कुल 11 पद खाली हैं। लेकिन इन सभी पदों पर फिलहाल मंत्री नहीं बनाए जाएंगे। अंदेशा है कि विस्तार के बाद भी नाराजगी रह सकती है। उन हालातों का सामना करने के लिए फिलहाल कैबिनेट में दो या तीन पद खाली ही रखे जाएंगे। 
मत्रिमंडल विस्तार पर अगर पूरी तरह गहलोत हावी रहे तो 2 या 3 ही मंत्रियों की छुट्टी होगी। पर ये फैसला लेना भी गहलोत के लिए आसान नहीं होगा,  क्योंकि उन्हें उन लोगों के बीच फैसला लेना होगा जिन लोगों ने मुश्किल वक्त में उनका साथ दिया था। 
अगर विस्तार पर पायलट गुट का दबाव रहा तो फिर 6 से 7 मंत्री आउट होना तय माने जा रहे हैं। और, अगर आलाकमान ने प्रदर्शन को आधार माना तो कई मंत्रियों को जाना पड़ सकता है, लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है। हालांकि, अजय माकन का 28-29 को जयपुर दौरा है। जिसमें वह जयपुर आकर हर विधायक से बात करेंगे। उसके बाद यह तय होगा कि कौन रहेगा और कौन जाएगा?   

इन मंत्रियों की कुर्सी पर खतरा


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इनकी हो सकती मंत्रिमंडल में एंट्री- पायलट गुट के 3 और गहलोत गुट के 7 चहेरों को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। 

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डोटासरा के बयान से उनके जाने के संकेत

प्रदेश में मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाऐं जारी हैं उस बीच शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर छा गया है। इसमें उनको राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डीपी जारोली से कहते सुना जा सकता हैं- ‘मेरे पास एक घंटे फाइल नहीं रुकेगी, आप सोमवार को आ जाओ। एक मिनट में निकाल दूंगा, जितनी कहोगे। मैं दो-पांच दिन का ही मेहमान हूं। मुझसे जो कराना है करा लो।’ इसके बाद बोर्ड अध्यक्ष डीपी जारोली ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं आता हूं सर। इस वायरल वीडियो के बाद से ये कयास तेज हो गए हैं कि मंत्रिमंडल से डोटासरा की रवानगी तय है। 
 

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Habibganj Railway Station: भारत का पहला वर्ल्ड क्लास हबीबगंज रेलवे स्टेशन आपके लिए तैयार, यहां की सेफ्टी, सिक्योरिटी और फैसिलिटी सबसे अलग


डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत का पहला वर्ल्ड क्लास हबीबगंज रेलवे स्टेशन बनकर तैयार हो चुका है। री-डेवलपमेंट के बाद इस स्टेशन पर ऐसी सुविधाएं मिलेंगी जो मौजूदा समय में भारत के किसी भी रेलवे स्टेशन पर नहीं है। हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, अस्पताल, मॉल, स्मार्ट पार्किंग, हाई सिक्योरिटी समेत कई सुविधाएं मिलेंगी। इसके लोकार्पण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। अगले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस स्टेशन का लोकार्पण कर सकते हैं। आइये जानते हैं कैसे एक सामान्य रेलवे स्टेशन बना वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन...

16 अप्रैल 1853 बॉम्बे से 14 कोच और 400 यात्रियों के साथ भारत की पहली ट्रेन ठाणे के लिए रवाना हुई। इस ट्रेन ने 34 किलोमीटर की दूरी तय की। इसके बाद भारत ने नए युग की ओर पहला कदम तब रखा जब उसने स्टीम इंजनों का निर्माण शुरू किया। राजपूताना मालवा के अजमेर वर्कशॉप में पहला स्टीम लोको नंबर F-734 1895 बनाया गया था। इसके बाद बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए 1901 में रेलवे बोर्ड का गठन किया गया।

आजादी के बाद भारत को विरासत में मिले रेल नेटवर्क में काफी सुधार की जरूरत थी। महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ने के लिए कई लाइनों को री-रूट किया गया और नई लाइन का निर्माण किया गया। भारत की 42 रियासतों के स्वामित्व वाले रेलवे को जोड़कर इंडियन रेलवे का गठन हुआ। 1947 में आजादी के बाद भारतीय रेल का 55 हजार किलोमीटर का नेटवर्क था। 1952 में मौजूदा रेल नेटवर्क को एडमिनिस्ट्रेटिव पर्पज के लिए 6 ज़ोन में डिवाइड किया गया। 

भारतीय इकोनॉमी के समृद्ध होने के साथ भारतीय रेलवे ने सभी प्रोडक्शन देश में ही करना शुरू कर दिया। 1985 के बाद धीरे-धीरे स्टीम इंजनों की जगह बिजली और डीजल लोकोमोटिव्स ने ले ली। कई सालों तक इलेक्ट्रिफिकेशन से लेकर ट्रैक और स्टेशनों के डेवलपमेंट पर काम हुआ। फिर आई 14 जुलाई 2016 की तारीख। भारतीय रेल के लिए ऐतिहासिक दिन। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत इंडियन रेलवे ने 1979 में तैयार हुए हबीबगंज स्टेशन के मॉडर्नाइजेशन के लिए पहला कॉन्ट्रेक्ट किया। 

5 सालों तक चले मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट के बाद जुलाई 2021 में हबीबगंज स्टेशन बनकर तैयार हो गया। इस स्टेशन में वर्ल्ड क्लास सुविधाएं है जिसके लिए करीब 100 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। हबीबगंज स्टेशन पर 5 प्लेटफॉर्म है, जिन्हें अलग-अलग शेडों से कवर किया गया है। यात्रियों को किसी तरह की कोई परेशानी न हो उसे ध्यान में रखते हुए सुविधाएं देने की कोशिश की गई है। दिव्यांगों के लिए अलग से शौचालय बनाए गए हैं। आने वाले समय में स्टेशन को ब्रिज के जरिए तैयार हो रहे मेट्रो स्टेशन से भी जोड़ा जाएगा।

हबीबगंज स्टेशन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि प्रवेश करने और ट्रेनों से उतरकर बाहर निकलने वाले यात्री एक-दूसरे से नहीं टकराएंगे। प्रवेश करने वाले यात्री दोनों तरफ मुख्य भवनों से प्रवेश करेंगे। लिफ्ट, ट्रेवलेटर, एस्केलेटर से एयर कॉन्कोर पर पहुंचेंगे। वहां आराम करेंगे और ट्रेन के आने पर प्लेटफार्म पर उतरकर यात्रा शुरू करेंगे। दूसरें शहरों से हबीबगंज पहुंचने वाले यात्री ट्रेन से उतरेंगे और अंडरग्राउंड सब-वे से बाहर निकल जाएंगे। 

स्टेशन पर एक साथ 1100 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है। इस स्टेशन पर साफ-सुथरे AC वेटिंग रूम से लेकर रिटायरिंग रूम और डोर्मिटरी की सुविधा है। वीआईपी लाउंज भी बनाया गया है। एयरपोर्ट टर्मिनल्स पर जिस तरह की शॉप्स होती है उसी तरह की सुविधाओं के लिए यहां रिटेल स्पेस का प्रोविजन किया गया है। 

स्टेशन और लोगों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है। इसके लिए यहां 162 हाई रिजोल्यूशन कैमरे लगाए गए हैं। कंट्रोल रूम में बैठकर पूरे स्टेशन पर नजर रखी जाती है। इन कैमरों के डेटा को डेढ़ सौ टेराबाइट के सर्वर पर एक महीने तक स्टोर किया जाता है। फायर डिटेक्टर से लेकर सुरक्षा से जुड़े अन्य उपकरण यहां इंस्टॉल किए गए हैं। स्टेशन के बाहर के इलाके को 300 करोड़ रुपए की लागत से डेवलप किया जा रहा है जहां मॉल समेत अन्य सुविधाएं होंगी। 

हबीबगंज रेलवे स्टेशन की बिल्डिंग को इनवॉयरमेंट फेंडली बनाया गया है। बिजली की खपत को कम करने के लिए स्टेशन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि दिन में लाइट की जरुरत ही नहीं है। टेंप्रेचर को कंट्रोल करने के लिए छत पर इंसुलेटड शीटिंग की गई है। इसके अलावा बिजली की आपूर्ति के लिए प्लेटफॉर्म के शेड पर सोलर पैनल लगाए गए हैं। इस स्टेशन को बनाते समय कंस्ट्रक्शन टीम को कई तरह के इंजीनियरिंग चैलेंजेज का भी सामना करना पड़ा।

अब सवाल उठता है कि क्या इतनी सारी सुविधाओं से युक्त ये स्टेशन आम लोगों की पहुंच से दूर हो गया है? क्या अब इस स्टेशन पर रेलवे का कोई कंट्रोल नहीं है? क्या ये स्टेशन प्राइवेट है? इसे समझने के लिए हमे समझना होगा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी को।स्टेशन पूरी तरह तैयार है। जैसे ही यात्रियों का दबाव बढ़ेगा, लिफ्ट, ट्रेवलेटर, एस्केलेटर शुरू कर दिए जाएंगे। अभी न के बराबर यात्री आ रहे हैं, इसलिए ये सुविधाएं बंद हैं।

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ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

डिजिटल डेस्क, टोक्यो। टोक्यो ओलंपिक में पूरी दुनिया से आए हुए खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। खेल में अपनी प्रतिभा दिखाने के अलावा जर्मन की महिला जिमनास्टिक्स ने फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपने मन के कपड़े पहनने की आजादी को अपने खेल के जरिए प्रमोट करने का फैसला किया है, जिससे उनकी हर तरफ चर्चा हो रही है। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness

जर्मनी की महिला जिमनास्ट रविवार को हुए टोक्यो ओलंपिक मुकाबले में फुल बॉडी सूट पहने नजर आई। खिलाड़ियों ने बताया कि इस सूट को फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी को बढ़ावा देने साथ ही महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए डिजाइन किया गया है जिसे पहनकर महिला खिलाड़ी आरामदायक महसूस कर सकें।

Germany's gymnasts wear body-covering unitards, rejecting 'sexualization' of sport - CNN 
 

जर्मनी की 4 जिमनास्ट जिनके नाम है पॉलीन शेफर-बेट्ज, सारा वॉस, एलिजाबेथ सेट्ज और किम बुई लाल और सफेद रंग के इस यूनिटार्ड सूट में नजर आई जो लियोटार्ड और लेगिंग्स को मिलाकर बनाया गया था। खिलाड़ी इसी को पहन कर मैदान में उतरीं थी। 

German gymnastics team, tired of 'sexualisation,' wears unitards | Deccan Herald
 

जर्मनी की टीम ने अपनी ट्रेनिंग में भी इसी तरह के कपड़े पहने हुए थे और अपने कई इंटरव्यूज में खिलाड़ियों ने कहा था कि इस साल फाइनल कॉम्पटीशन में भी वो फ्रीडम ऑफ चॉइस को प्रमोट करने के लिए इसी तरह के कपड़े पहनेंगी। खिलाड़ी सारा वॉस ने द जापान टाइम्स को बताया था यूनिटार्ड को फाइनल करने से पहले उन्होंने इस पर चर्चा भी की थी। सारा ने ये भी कहा कि जैसे जैसे एक महिला बड़ी होती जाती है, वैसे ही उसे अपने शरीर के साथ सहज होने में काफी मुश्किल होती हैं। हम ऐसा कुछ करना चाहते थे जिसमें हम अच्छे भी दिखे और सहज भी महसूस करें। चाहे वो कोई लॉन्ग यूनिटार्ड हो या फिर शॉर्ट। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness
 

सारा ने यह भी बताया कि उनकी टीम ने इससे पहले यूरोपीय चैंपियनशिप में भी इसी तरह का फुल बॉडी सूट पहना था और इसका उद्देश्य सेक्सुलाइजेशन को कम करना है। हम लोगों के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहते थे जिससे वो हमे फॉलो कर सकें। जर्मन के खिलाड़ियों की लोग काफी प्रशंसा भी कर रहे हैं। 


ओलंपिक प्रतियोगिताओं में जिमनास्ट महिलाओं को फुल या हाफ बाजू के पारंपरिक लियोटार्ड ही पहनना होता है साथ ही अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में फुल कपड़े पहनने की अनुमति तो है लेकिन किसी भी महिला जिमनास्ट ने इस तरह के कपड़े नहीं पहने थे। यह पहली बार था जब जर्मन खिलाड़ी महिलाओं ने इस तरह के कपड़े पहने थे। 
बीते कुछ सालों में खेल प्रतियोगिताओं में महिलाओं के शारीरिक शोषण के बढ़ते मामलों को देख महिला खिलाड़ियो की चिंता बढ़ती जा रही है अब एथलीटों की सुरक्षा को देखते हुए नए सेफ्टी प्रोटोकॉल बनाए जा रहे हैं।