दैनिक भास्कर हिंदी: नागपुरी भैंस पालो, कमाओ और स्वस्थ भी रहो

May 20th, 2018

डिजिटल डेस्क, नागपुर। चंद्रशेखर पोलकोंडवार। भैंस की बेहतरीन प्रजातियों में दूसरे नंबर पर है नागपुरी भैंस। यह भैंस न सिर्फ विदर्भ के किसानों को आर्थिक परेशानी से उबार सकती है, बल्कि दुग्ध व्यवसाय के क्षेत्र में देश को बड़े निर्यातक का दर्जा भी दिला सकती है। कानपुर की भागावरी भैंस को भैंस की सर्वश्रेष्ठ प्रजाति माना जाता है। दूसरे नंबर की नागपुरी भैंस के पालन पोषण का खर्च भी बहुत कम है। इस भैंस के दूध में सर्वाधिक 8 से 11 फीसदी स्निग्धता है। दूसरी बड़ी विशेषता यह है कि नागपुरी भैंस की रोग प्रतिरोधक क्षमता तुलनात्मक रूप से अत्यधिक सुदृढ़ है तथा विदर्भ के ग्रीष्म मौसम में भी यह स्वयं को अनुकुल बना लेती है। चारे के रूप में इसे किसी भी प्रकार का बाहरी खाद्य देने की आवश्यकता नहीं है।

विदर्भ के गोपालक भी नागपुरी भैंस को ही अधिक पसंद करते हैं। बावजूद इसके सरकारी संरक्षण प्राप्त न हो पाने की वजह से विदर्भ क्षेत्र में न ताे नागपुरी भैंस के संवर्धन व प्रजनन का वृहत पैमाने पर प्रयास हो रहा है और न ही गोपालकों को किसी प्रकार की विशेष सुविधा उपलब्ध हो पा रही कि वे इस प्रजाति का उपयोग आय के स्रोत के रूप में कर सकें। आत्महत्या की वीभीषिका से जूझते किसानों को इस व्यवसाय से राहत दिलायी जा सकती है किंतु वह भी नहीं हो पा रहा है।

1300 लीटर दूध का उत्पादन 
नागपुरी भैंस को कुछ इलाकों में वहृाडी, गणगाैरी, गवलगांव, बेरारी आदि नाम से भी जाना जाता है। महाराष्ट्र में सर्वाधिक नागपुरी, मराठवाड़ी व पंढरपुरी भैंस को ही पाला जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मुर्रा भैंस की मांग बढ़ी है। महाराष्ट्र पशु व मत्स्य विज्ञान विद्यापीठ के एक विशेषज्ञ के मुताबिक मराठवाड़ी व पंढरपुरी भैंस भी नागपुरी भैंस की ही प्रजाति है। वस्तुत: नागपुरी भैंस विदर्भ क्षेत्र में तकरीबन 250 वर्षों से पाली जाती रही है। अधिक दूध प्राप्त करने के लिए गोपालक नागपुरी भैंस की उपेक्षा कर उसके स्थान पर मुर्रा भैंस को अधिक महत्व देते हैं। इसके पीछे का प्रमुख कारण यह है कि मुर्रा भैंस प्रतिदिन 22-25 लीटर दूध देती है, जबकि नागपुरी भैंस एक दिन में अधिकतम 11-12 लीटर ही दूध दे पाती है। बावजूद इसके तुलनात्मक रूप से नागपुरी भैंस को इसलिए श्रेष्ठ माना जाता है कि मुर्रा भैंस के प्रतिलीटर दूध में मात्र 4 फीसदी स्निग्धता (फैट) रहती है जबकि नागपुरी भैंस में स्निग्धता का प्रमाण प्रतिलीटर 8-11 फीसदी होता है। नागपुरी भैंस का दूध हाथों-हाथ बिक जाता है। सामान्य चारा खिलाने पर एक दुग्धकाल में नागपुरी भैंस 1000 से 1300 लीटर दूध का उत्पादन करती है। यह भैंस खुले में चरकर अपेक्षित आहार प्राप्त कर लेती है तथा बगैर खर्च के 1 दुग्धकाल में न्यूनतम 800 लीटर दूध का उत्पादन करने की क्षमता रखती है।

पानी की किल्लत में भी लाभकारी
किसानों की सबसे बड़ी समस्या सिंचाई व्यवस्था का कमजोर होना है। विदर्भ के अधिकांश हिस्सों में पानी की किल्लत किसान आत्महत्या का प्रमुख कारण रही है। इस स्थिति में भी नागपुरी भैंस अधिक किफायती साबित होती है। मुर्रा भैंस को 1 लीटर दूध के लिए 6-7 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है जबकि नागपुरी भैंस कम से कम पानी में भी अपनी दुग्ध उत्पादन क्षमता को बरकरार रखने में सक्षम होती है। इसके अलावा मुर्रा भैंस को हरा चारा, सरकी, ढेप आदि समय-समय पर देना अनिवार्य होता है। नागपुरी भैंस को यह चारा खिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती जिससे गोपालक पर आर्थिक बोझ कम ही पड़ता है।

जामवाड़ी के गोपालक का पुरस्कार के लिए चयन
यवतमाल के जामवाड़ी में रहने वाले किसान व गोपालक गणपतराव कानबाजी डोले काे नागपुरी गाय का उत्कृष्ट पालन व संवर्धन करने पर पुरस्कार के लिए चुना गया है। उन्हें यह पुरस्कार राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संस्थान, करनाल (NBAGR) द्वारा दिया जाएगा। 22 मई को करनाल में आयोजित एक कार्यक्रम में गणपतराव को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। गणपतराव के पास मंदा नामक नागपुरी भैंस हैं, जिसकी उम्र 32 वर्ष बतायी जाती है। इस भैंस ने अब तक 27 बच्चों को जन्म दिया है। नेशनल बायोडायवर्सिटी बोर्ड भी नागपुरी भैंस की प्रजाति के उत्थान के लिए प्रयासरत है। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संस्थान के जरिए विविध योजनाएं संचालित की जाती हैं जिनके जरिए विविध पशुओं के उत्थान के लिए प्रयास किए जाते हैं।