दैनिक भास्कर हिंदी: मुश्किल में सिद्धू, सुप्रीम कोर्ट में फिर होगी 30 साल पुराने रोडरेज मामले की सुनवाई

September 13th, 2018

हाईलाइट

  • रोडरेज केस में सिद्धू के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन फाइल हुई
  • सुप्रीम कोर्ट फिर करेगा 30 साल पुराने रोडरेज मामले की सुनवाई
  • 15 मई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धू को इस मामले में जेल की सजा से छूट दी थी

डिजिटल डेस्क, चंडीगढ़। इसी साल मई में 30 साल पुराने रोडरेज मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद पंजाब के मंत्री और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू फिर मुश्किल में पड़ सकते हैं। इस मामले में बुधवार को उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन फाइल हुई है। पीड़ित पक्ष ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह किया है। कोर्ट ने पीड़ित पक्ष की यह याचिका मंजूर भी कर ली है। अब एक बार फिर से इस मामले की सुनवाई होगी। गौरतलब है कि 15 मई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धू को इस मामले में बड़ी राहत दी थी। कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सिद्धू को मिली जेल की सजा निरस्त कर दी थी और केवल 1000 रुपए का जुर्माना लगाया था।

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करते हुए सिद्धू को नोटिस भेज दिया है। यह नोटिस जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच की ओर से जारी किया गया है। बता दें कि साल 1988 में सिद्धू का पटियाला जाते वक्त गुरनाम सिंह नामक एक बुजुर्ग शख्स से विवाद हो गया था। बताया जाता है कि बुजुर्ग ने सिद्धू से पटियाला में बीच सड़क पर खड़ी कार हटाने को कहा था, जिस पर विवाद बढ़ा और मारपीट हुई। इसके बाद गुरनाम सिंह की हॉस्पिटल में मौत हो गई थी। उस समय पुलिस ने नवजोत सिंह सिद्धू और उनके दोस्त रुपिंदर सिंह के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया था।

इस मामले में 10 साल तक चली लम्बी सुनवाई के बाद 22 सितंबर, 1999 को सेशन कोर्ट ने सिद्धू को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था। इसके बाद 1 दिसंबर, 2006 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को पलट दिया था और सिद्धू व रुपिंदर को गैर-इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए तीन साल कैद की सजा और एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। सिद्धू ने यहां से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 15 मई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धू को जेल की सजा से छूट दी और पीड़ित को चोट पहुंचाने का दोषी मानते हुए एक हजार रुपए का जुर्माना लगाया।