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70 आंबेडकरी विचार से जुड़े दल मैदान में, विचार एक फिर भी अलग-अलग धड़ों में बंटे

70 आंबेडकरी विचार से जुड़े दल मैदान में, विचार एक फिर भी अलग-अलग धड़ों में बंटे

डिजिटल डेस्क, नागपुर। देश में आंबेडकरी विचारों को मानने वाले संगठनों की कमी नहीं है, लेकिन जिनकी बुनियाद ही आंबेडकरी विचारों पर खड़ी है, वे ही अलग-अलग धड़ों में बंटे हैं। बंटते-बंटते इतने बंट गए कि अब गिनना भी मुश्किल है। महाराष्ट्र में करीब 70 के आस-पास आंबेडकरी विचारों से जुड़े राजनीतिक दल चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं। इसमें बसपा, वंचित बहुजन आघाड़ी, बहुजन वंचित आघाड़ी, बहुजन रिपब्लिकन सोशलिस्ट पार्टी, पीपल्स रिपब्लिकन पार्टी, बहुजन मुक्ति पार्टी, आंबेडकराइट पार्टी ऑफ इंडिया और आठवले, गवई, खोब्रागड़े गुट सहित करीब 55 गुटों में विभाजित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया है। इसके अलावा हर चुनाव में अचानक उभरने वाली गैर-पंजीकृत आंबेडकराइट पार्टियां सो अलग। 

जिले में इस बार ऐसे 10 उम्मीदवार
नागपुर जिले में ही आंबेडकरी विचार वाले करीब 10 राजनीतिक दल के उम्मीदवार चुनावी मैदान में डटे हुए हैं। राज्य में आबादी के हिसाब से मजबूत ताकत माने जाने वाला यह विचार आज सिर्फ राजनीतिक बैनर और नारों तक सीमित हो गया है। वह चुनाव में बिना सहारे अपना खाता तक खोलने में असहाय नजर आ रहा है। हालांकि वह कई जगहों पर चुनावी समीकरण बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे में सत्ताधारी व अन्य राष्ट्रीय पार्टियां अपने नफे-नुकसान के हिसाब से उनका उपयोग करने में लगी है। 60 और 70 के दशक में महाराष्ट्र की राजनीति में मजबूत विपक्ष के तौर पर उपस्थिति दर्ज कराने वाली आंबेडकरी पार्टी अब खाता खोलने तक को मोहताज है।

अपनी डफली-अपना राग
आजादी के बाद महाराष्ट्र सहित देश पर कांग्रेस का एक छत्र राज रहा। मजबूत आवाज आसानी से दबा दी जाती थी। ऐसे में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने दबे-कुचले और वंचित वर्गों की आवाज मजबूत करने के लिए शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का गठन किया था। इसमें सभी वर्गों के लोगों का समावेश था। बाद में बाबासाहब ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का विलय कर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की संकल्पना सामने रखी, लेकिन रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का गठन करने के पहले ही बाबासाहब का निधन हो गया। बाबासाहब के निधन के एक साल के भीतर यानी 3 अक्टूबर 1957 को रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का गठन हुआ, लेकिन पार्टी ने अपना एक साल भी पूरा नहीं किया था कि 1958 में इसमें फूट पड़ गई।

एक नए आरपीआई गुट ने जन्म ले लिया। इन गुटों के बावजूद आरपीआई 1970 तक महाराष्ट्र की मजबूत पार्टी और मुख्य विपक्ष के तौर पर रही। इस बीच बसपा का गठन करने से पहले कांशीराम ने आरपीआई से जुड़ने की भी कोशिश की, लेकिन जब 1970-71 में कांग्रेस से एक सीट पर आरपीआई ने समझौता किया तो कांशीराम का आरपीआई से मोहभंग हो गया। उन्होंने इसके बाद डीएसफोर, बामसेफ और बसपा का गठन कर अपना नेतृत्व साबित कर दिया। महाराष्ट्र के बजाए उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी प्रयोगशाला बनाया। वहां चार बार अपनी सरकार बनाई। महाराष्ट्र में उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने बाबासाहब के प्रपौत्र एड. प्रकाश आंबेडकर को भी जोड़ने की कोशिश की, लेकिन प्रकाश आंबेडकर ने उनके साथ जाने के बजाए अपनी खुद की भारिप-बहुजन महासंघ पार्टी बना डाली।

आरपीआई में भी रामदास आठवले, रा. सु. गवई, जोगेंद्र कवाडे, सुलेखा कुंभारे, प्रकाश आंबेडकर, खोब्रागडे गट आदि अपना-अपना गुट अलग कर अपनी पार्टी का गठन किया। अपना-अपना गुट बनाकर ये पार्टियां अपनी सुविधा के हिसाब से राष्ट्रीय पार्टियों से जुड़ते रहे। उधर, बसपा ने अपनी ताकत महाराष्ट्र में बढ़ाई। लेकिन इस स्थिति में नहीं पहुंची कि वह अपना उम्मीदवार जिताकर लाए। पिछले चुनाव में उत्तर नागपुर सीट पर वह जरूर दूसरे नंबर पर रही। बसपा ने अभी तक महाराष्ट्र में किसी के साथ समझौता नहीं किया है, लेकिन रिजल्ट भी नहीं दिया है। इस बीच महाराष्ट्र में भी बसपा में टूट-फूट हुई। जो नेता बाहर निकला, उसने रिपब्लिकन, बहुजन या फिर आंबेडकर के नाम से अपनी पार्टी बना ली। ऐसी करीब 70 पार्टियां महाराष्ट्र में संचालित हो रही हैं, जिसमें आरपीआई के नाम से ही करीब 55 पार्टियां बनने का दावा किया गया है, लेकिन इसमें से किसी को भी अब तक सफलता नहीं मिली।

मानवतावादी विचार ही आंबेडकरवाद
डा. बाबासाहब आंबेडकर समता, स्वतंत्रता, बंधुता, धर्मनिरपेक्षता और बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के हिमायती थे। मानवतावादी विचार को ही आंबेडकरवाद कहा जा सकता है। बाबासाहब ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया, लेकिन कभी भी धार्मिक राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं किया। एक सवाल के जवाब में गोलमेज परिषद में उन्होंने कहा था कि देशभक्त कहलाने वाले लोगों से मेरा बर्ताव अधिकाधिक राष्ट्रीय अभिमान का था।  वे ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को मजदूरों का दुश्मन मानते थे। उन्होंने दलित-शोषित लोगों को संदेश देते हुए कहा था-अपने घरों की दीवारों पर लिख दो कि आपको शासनकर्ता जमात बनना है। यही हमारी आकांक्षा और प्रतिज्ञा है।  -डा. भाऊ लोखंडे, डा. बाबासाहब आंबेडकर विचारधारापीठ के पूर्व प्रमुख, नागपुर विवि
 

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