दैनिक भास्कर हिंदी: सेवाग्राम से उठी चिंगारी ने दिया था अगस्त क्रांति को जन्म, नागपुरवासियों की कुर्बानी अहम

August 9th, 2018

डिजिटल डेस्क, नागपुर। वर्धा के सेवाग्राम में 6 से 14 जुलाई 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की रणनीति पर महात्मा गांधी के समक्ष लंबी चर्चा चली। वर्धा प्रस्ताव के नाम से प्रसिद्ध यह विमर्श 5 अगस्त 1942 तक मुंबई पहुंचते-पहुंचते चिंगारी में तब्दील हो गया और फिर 9 अगस्त से पूरा देश इस आंदोलन से धधक उठा। नागपुरवासियों ने भी कुर्बानी देकर आजादी के आंदोलन में खुद को आगे रखा। अंग्रेजों के जुल्म के खिलाफ यहां आवाज इतनी बुलंद हुई कि इसे कुचलने पुलिस और सेना को नागपुर शहर में कुल 38 स्थानों पर 214 राउंड फायर करने पड़े। इस गोलीबारी में शहर के 30 स्वाधीनता सेनानियों को प्राण भी गंवाने पड़े। 14 लोग गंभीर रूप से घायल हुए पर आंदोलन को शांत नहीं होने दिया।

आंदोलनकारियों ने अंग्रेजों को खदेड़ते हुए शहर के 6 थानों को फूंक डाला। अंग्रेजों की हुकुमत का अड्डा रहे प्रशासनिक मार्गों को खोद डाला और वहां पेड़ काटकर बिछा दिए गए। बिजली व टेलीफोन के खंभों को उखाड़कर यातायात ठप कर दिया। अगस्त क्रांति की इस ज्वाला को प्रतिवर्ष देश 9 अगस्त को नमन करता है।

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत
6 से 14 जुलाई 1942 को वर्धा के सेवाग्राम में कांग्रेस की कार्यकारिणी की बैठक में महात्मा गांधी के समक्ष भारत छोड़ा आंदोलन की नीति पर लंबी चर्चा के बाद इसे वर्धा प्रस्ताव का नाम दिया गया। पश्चात 5 अगस्त 1942 को मुंबई में इसे अंतिम स्वरूप दिया गया। वर्धा प्रस्ताव भारत के इतिहास का एक क्रांतिकारी कदम था। सीपी एंड बेरार प्रांत के गवर्नर सर हेन्री ट्वायनॅम के माध्यम से अंग्रेजों को वर्धा प्रस्ताव की जानकारी मिली। 8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने मुंबई में भारत छोड़ो प्रस्ताव को मंजूर कर लिया। 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी व महादेवभाई देसाई को मुंबई के पुलिस आयुक्त बटलर ने बिड़ला भवन से गिरफ्तार कर लिया।

विदर्भ के नेता बुलढाणा में गिरफ्तार
9 अगस्त की सुबह से ही राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू हो गया। देश के कोने-कोने में प्रदर्शन हो रहे थे। इस बीच मुंबई से विदर्भ की ओर लौट रहे विदर्भवासी नेताओं को मलकापुर रेलवे स्टेशन पर बुलढाणा पुलिस अधीक्षक ने गिरफ्तार कर लिया था। इनमें नारायण बापू पाटील, ब्रिजलाल बियाणी, बी.जे.देशमुख, सेठ पूनमचंद रांका, सेठ शिवदास डागा, महंत लक्ष्मीनारायण दास, जत्ती जतनलाल, नारायण बालाजी पाटील व चतुर्भुजभाई देसाई का समावेश था। 

जब्ती, वारंट व बंद से दहला नागपुर
नागपुर शहर व जिले में इस आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने वामनराव गावंडे, बजरंग ठेकेदार, वी.एस.दांडेकर, मगनलाल बागडी, शामनारायण काश्मिरी व भिकूलाल चांडक के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। मगनलाल बागड़ी की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। 9 अगस्त को नागपुर शहर के सभी क्षेत्रों से मोर्चा निकाला गया। सभी कपड़ा मिल, बाजार व स्कूल-कालेज बंद रखे गए। शहर शत-प्रतिशत बंद रहा।  

कर्फ्यू व गोलीबारी नहीं रोक सकी हौसला
12 से 14 अगस्त के दौरान अनेक हिंसक झड़पें हुईं। आंदोलनकारियों ने एक सरकारी दुकान को लूटा और इतवारी तथा बर्डी रेलवे स्टेशन पर हमला किया। शहर में कर्फ्यू लगाया गया। 15 अगस्त को पुन: पुलिस ने 3 बार गोलीबारी की। 12 से 15 अगस्त के दौरान सेना व पुलिस ने कुल 38 स्थानों पर गोलीबारी की। करीब 214 राउंड फायर किए गए। नागपुरवासी 30 स्वाधीनता सेनानियों को प्राण गंवाने पड़े थे। 14 आंदोलनकारी घायल हुए।

पुलिस स्टेशन भी लूट लिए
12 अगस्त को इन सैनिकों को 7 बार गोली-बारी करनी पड़ी। 13 अगस्त को आंदोलनकारियों ने 6 पुलिस स्टेशनों पर हमला कर उसे लूट लिया। भंडारा से अनाज ले जा रहे सेना के वाहन पर हमला कर उसे भी लूट लिया गया। शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस व सेना के जवानों को तैनात किया गया था। इसके बावजूद आजादी की मांग को लेकर हिंदुस्तानी लालसेना एवं राष्ट्रीय युवक संघ के हजारों युवाओं ने जिलाधिकारी कार्यालय पर मोर्चा निकाला। वहां उन्होंने तिरंगा फहरा दिया। मोर्चा जब सभा में रुपांतरित हुई और भाषण चल रहा था तो पुलिस दलों की टीम ने बर्बरता से लाठीचार्ज कर दिया। आंसू गैस के गोले दागे तो लोगों ने पथराव कर दिया। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने गोलीबारी की। 

बैंक व थानों को जला दिया
11 अगस्त को आंदोलन हिंसक हुआ। आंदोलनकारियों ने बड़े पैमाने पर सरकारी संपत्ति की तोड़-फोड़ व आगजनी की। डाक विभाग, पावर हाउस, एक बैंक के अलावा 3 पुलिस थानों को आग के हवाले कर दिया। जिला न्यायालय, सचिवालय, जिला कार्यालय व तहसील ऑफिस पर मोर्चे पहुंचे। लोगों ने सड़कों को खोद दिया। पेड़ काटकर बिछा दिए गए। बिजली व टेलीफोन के खंभे गिराकर यातायात ठप कर दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। कुछ आंदोलनकर्ताओं ने डाक विभाग का वाहन लूट लिया। पथराव में अनेक पुलिसकर्मी भी घायल हुए। हालात पर नियंत्रण के लिए सेना के जवानों का काफिला मंगवाया गया। 

जांबाज आज भी गवाह है
स्वाधीनता सेनानी एड. नारायण गणपतराव चांदपुरकर नामक जांबाज आज भी अगस्त आंदोलन के गवाह हैं। उनकी उम्र 96 वर्ष हो चुकी है। शालिनीताई के साथ दांपत्य जीवन गुजारते हुए वे आजादी के आंदोलन की यादें ताजा करते हैं। संघ बिल्डिंग के समक्ष वाली गली में वे आज भी किराए के दो कमरों में जीवन गुजार रहे हैं। 9 अगस्त 1942 के आंदोलन के बारे में वे बताते हैं कि सिटी पोस्ट ऑफिस के गार्ड, उनके दु:स्साहस पर भाग खड़े हुए थे। शहीद शंकर महाले को 16 वर्ष की उम्र में दी गई फांसी को वे आज भी अंग्रेज शासन द्वारा की गई नृशंस हत्या मानते हैं। अब भी उनके चेहरे पर शहीद शंकर की मौत का दर्द देखा जा सकता है।