दैनिक भास्कर हिंदी: नागपुर की सेंट्रल जेल में 5 साल पहले याकूब मेमन को दी गई थी फांसी

March 20th, 2020

डिजिटल डेस्क, नागपुर। निर्भया प्रकरण के दोषियों को शुक्रवार की सुबह फांसी दे दी गई।  करीब 5 साल पहले नागपुर की सेंट्रल जेल में मुंबई के 1993 के बम धमाकों में दोषी पाए याकूब मेमन को फांसी दी गई थी। 5 वर्ष में यह देश की अंतिम फांसी थी। यहां पर देश-विदेश की मीडिया उसकी फांसी की तय तारीख 30 जुलाई 2015 से चार दिन पहले ही जमा हो गई थी। हर पल की खबर देश-विदेश में भेजी जा रही थी। उस समय नागपुर की सेंट्रल जेल के चारों आेर 1500 से अधिक पुलिस जवानों को तैनात कर दिया गया था। मीडिया को सेंट्रल जेल के प्रवेश द्वार से करीब 500 मीटर दूर रहने का आदेश दिया गया था।  करीब 42 साल बाद नागपुर की इस जेल में किसी  कैदी को फांसी दी गई थी। जब याकूब को फांसी दी गई थी तब सेंट्रल जेल की ओर आने वाले तमाम रास्तों को सीलबंद कर दिए गए थे।

पूरी रात चलीं टीवी
संतरानगरी के लोग भी उस रात टीवी के स्क्रीन पर नजरें लगाए हुए थे। हर कोई पल-पल की खबरें जानने के लिए बेताब था। उस रात अधिकांश लोग रातभर नहीं सोए थे। याकूब मेमन नागपुर की  सेंट्रल जेल में फांसी पाने वाला 22वां कैदी था। सूत्रों की मानें तो आजादी के बाद से अब तक महाराष्ट्र में कुल 56 कैदियों को फांसी दी गई। इनमें से कुछ को नागपुर जेल में तो कुछ को येरवड़ा जेल में मौत के फंदे पर लटकाया गया है। 

यह भी जानें
नागपुर जेल में याकूब से पहले 17 अप्रैल 1973 को मोरीराम शाद्याजी गोडान को फांसी दी गई थी। नागपुर जेल में करीब 65 साल पहले पहली बार 25 अगस्त 1950 को पांथेयादी नंदल को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था, जबकि महाराष्ट्र राज्य में आखिरी बार 21 नवंबर 2012 को अजमल आमिर कसाब को फांसी के फंदे पर लटकाया गया, 26/11 मुंबई आतंकी हमले का वह एक मात्र जिंदा आतंकी था। उसे येरवड़ा जेल में फांसी हुई थी। इस जेल में पहली बार बालू किशन गोपाल नाम के कैदी को 15 दिसंबर 1952 फांसी दी गई थी। 

फांसी की सुबह सड़कों पर उमड़ पड़ा था सैलाब 
जिस दिन याकूब मेमन को फांसी दी गई थी। उस दिन नागपुर सेंट्रल जेल के सामने वाली सड़क पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। उस दिन याकूब का 53वां जन्मदिन था। कहते हैं कि याकूब को फांसी के लिए जो रस्सी इस्तेमाल की गई, वह भी नागपुर जेल में बनाई  थी। फांसी देने की प्रक्रिया में तकरीबन दो घंटे का समय लगा था। फांसी के समय से दो घंटे पहले याकूब को उठा दिया गया था। उस समय के जेल सुपरिटेंडेंट योगेश देसाई की उपस्थिति में यह कार्रवाई हुई थी। उस समय नागपुर के साथ मुंबई में भी सुरक्षा का इंतजाम किया गया था। जहां याकूब को फांसी दी गई वहां जेल सुपेरिंटेंडेंट, डेप्युटी सुपेरिंटेंडेंट, असिस्टेंट सुपेरिंटेंडेंट, मेडिकल ऑफिसर , 3 कांस्टेबल और फांसी पर चढ़ाने वाला एक शख्स मौजूद था। 

वाहनों की हुई थी जांच 
उस दिन देर रात से ही सेंट्रल जेल के सामने के मार्ग के यातायात को बंद कर दिया गया था। शहर में आने वाले तमाम वाहनों की जांच हो रही थी। इतना ही नहीं याकूब आतंकी टाइगर मेमन का भाई था, वह आसमानी मार्ग से अपने भाई को छुड़ाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए सेंट्रल जेल के फांसी घर को सुरक्षा कवच से ढंक दिया गया था। चारों ओर से टीनशेड से ढंक दिया गया था। याकूब को फांसी देने के पहले फांसी घर को दुरुस्त करने के लिए लाखों रुपए खर्च किए गए थे। जिस दिन याकूब को फांसी हुई थी, उस दिन शहर के हर गली चौराहे पर बस उसी खबर की चर्चा थी। ठीक इसी तरह से जैसे शुक्रवार को निर्भया प्रकरण के दोषियों को फांसी की सजा होने वाली है।
 

खबरें और भी हैं...