मूवी रिव्यू ओमलो: पीढ़ियों से चली आ रही घरेलू हिंसा और उम्मीद की एक मार्मिक कहानी

पीढ़ियों से चली आ रही घरेलू हिंसा और उम्मीद की एक मार्मिक कहानी
फ़िल्म समीक्षा: 'ओमलो' | कलाकार: शम्भो महाजन, सोनू रणदीप चौधरी, सोनाली शर्मिष्ठा, देवा शर्मा, महेश जिलोवा, वंदना गुप्ता | निर्देशक: सोनू रणदीप चौधरी | निर्माता: नेहा पांडे, रोहित मखीजा, मनीष गोपलानी, सोनू रणदीप चौधरी | शैली: सामाजिक नाटक | अवधि: 1 घंटा 32 मिनट | भाषा: हिंदी (राजस्थानी) | रिलीज की तारीख: 3 जुलाई 2026 | प्लेटफार्म: वेव्स ओटीटी | रेटिंग :⭐⭐⭐ 1/2

आज के दौर में जब अधिकांश फिल्में मनोरंजन और व्यावसायिक सफलता के इर्द-गिर्द घूमती हैं, ऐसे में हिन्दी (राजस्थानी) फिल्म 'ओमलो' एक ऐसे विषय को सामने लाती है जिस पर समाज में कम ही खुलकर बात होती है। निर्देशक और लेखक सोनू रणदीप चौधरी ने इस फिल्म के माध्यम से घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, पितृसत्तात्मक सोच और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले मानसिक आघात जैसे संवेदनशील विषयों को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। आइए आज के रिव्यू में जानते हैं कैसी है यह फिल्म



कहानी

फिल्म की कहानी राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके के सुदूर क्षेत्र में बसे एक छोटे से गाँव से शुरू होती है जहां गर्मी की चिलचिलाती धूप में दिहाड़ी मजदूर सावित्री अपना काम पूरा करने के बाद ठेकेदार से अपनी कमाई के रुपये साड़ी की टोंक में बाधकर सर पर टोकरी और गोद में दूध पीती बच्ची को लेकर अपने 7 साल के बेटे ओमलो के साथ एक ऊंट गाड़ी पर अपने घर की ओर निकलती है। यह पहला दृश्य ही अपने आप में इतना मार्मिक और सशक्त है कि दर्शक जुड़ाव महसूस करने लगता है। इसी के समानांतर एक और दृश्य चलता है एक ऊंट को उसका मालिक खुले रेगिस्तान में कुछ बबूल के पेड़ों के बीच लाकर उसकी रस्सियाँ खोलकर कहता है जा चर ले मैंने तेरी सारी रस्सियाँ खोल दी हैं जा चला जा। लेकिन शायद ऊंट अपनी इस आजादी से खुश नहीं है और अपनी मंजिल से अनजान वह अपने मालिक के बार बार धक्का देने के बाद भारी मन से धीमी चाल पकड़ लेता है जो फिल्म के अंत तक दिखाई पड़ता है।

सावित्री जैसे ही अपने घर पहुँचती है उसको पता चलता है कि उसके ससुर की मृत्यु हो गई है यह देखते ही वह दहाड़ मार के रोने लगती है। अब सबसे बड़ी समस्या खड़ी होती है अंतिम संस्कार की क्योंकि उसके लिए चाहिए रुपए जो घर में होते नहीं। सावित्री का पति सुभाष एक शराबी और निठल्ला इंसान है वह सावित्री के मेहनत की कमाई अपने नशे में फूँक देता है। हर सिचुऐशन को मासूम बालक ओमलो लाचारी से देखता है और अपने भावों से जताने की कोशिश करता है की वह जल्द से जल्द इन समस्याओं को खत्म कर देना चाहता है लेकिन वह लाचार है। इसी प्रकार की छोटी बड़ी दिक्कतों और पुरुष केंद्रित समाज में महिलाओं की मानसिक प्रताड़ना और अनकही भावनाओं के साथ यह कहानी आगे बढ़ती है। फिल्म का हर सीन वैसे तो देखने में साधारण ही दिखता है लेकिन गहराई इतनी है कि 'टिप ऑफ आइस्बर्ग' जैसा है। फिल्म दर्शकों को एक अलग ही क्षितिज़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहां से वह दुनिया को एक अलग नज़रिये से देखने की कोशिश करता है।

निर्देशन

निर्देशक सोनू रणदीप चौधरी ने कहानी को अनावश्यक नाटकीयता से बचाते हुए वास्तविकता के करीब रखने की सफल कोशिश की है। संवाद सरल हैं, लेकिन कई जगह सीधे दिल को छू जाते हैं। फिल्म के हर सीन में राजस्थानी ग्रामीण परिवेश, परिधान, बोली भाषा, रहन सहन, व्यवहार और रीति रिवाज जैसी बारीक से बारीक पहलुओं का ध्यान रखा गया है और फिल्म देखते समय एक भी सीन अनावश्यक नहीं दिखता और ऐसा लगता है जैसे सब असली में हो रहा हो। फिल्म की मजबूत पटकथा दर्शकों को लगातार सोचने पर मजबूर करती है कि क्या घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना की विरासत को कभी बदला जा सकेगा।

अभिनय

शंभो महाजन ने 'ओमलो' के किरदार के माध्यम से मासूमियत और संवेदनशीलता को बेहद ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। वहीं सोनाली शर्मिष्ठा ने सावित्री के किरदार में जान डाल दी है उनको देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी स्थानीय मजदूर महिला ने ही किरदार निभाया हो। ओमलो की दादी और सावित्री की सास के रूप में वंदना गुप्ता के अभिनय में उनका अनुभव और अभिनय क्षमता साफ दिखाई देती है अपने छोटे लेकिन मजबूत रोल से दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में सफल रही है।

ओमलो के दारूबाज और निठल्ले बाप के रोल में सोनू रणदीप चौधरी बेहद सहज दिखाई पड़ते हैं और अपनी ऐक्टिंग स्किल से दर्शकों के ऊपर एक गहरी छाप छोड़ते है।

देवा शर्मा और महेश जिलोवा अपने-अपने किरदारों के माध्यम से कहानी को मजबूती प्रदान करते हैं। सभी पात्र कहानी का जरूरी हिस्सा बनकर उभरते हैं और फिल्म के संदेश को प्रभावशाली बनाते हैं।

म्यूजिक और तकनीकी पहलू

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गाजी खान बरना और भुवन आहूजा का संगीत तथा देवेंद्र भोमे का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के भावनात्मक पक्ष को और गहराई देते हैं। संगीत फिल्म पर हावी होने के बजाय उसके वातावरण को मजबूत करता है।

राजस्थान के श्री डूंगरगढ़ और बीकानेर की रियल लोकेशन पर फिल्मांकन फिल्म को एक वास्तविक ग्रामीण परिवेश प्रदान करता है। सिनेमैटोग्राफर विल्सन रैबिन्से ने रेगिस्तान की विशालता और गांव की सादगी को खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है।

फाइनल वर्डिक्ट

फिल्म का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह किसी पात्र को पूरी तरह नायक या खलनायक नहीं बनाती, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों और पीढ़ियों से चली आ रही मानसिकता को समस्या की जड़ के रूप में सामने रखती है। कहानी इस बात को बेहद संवेदनशीलता से दिखाती है कि बचपन में देखी गई हिंसा किस तरह अगली पीढ़ी के व्यवहार और सोच को प्रभावित करती है। ओमलो का किरदार केवल एक बच्चा नहीं, बल्कि उस उम्मीद का प्रतीक है जो इस अंतहीन चक्र को तोड़ सकती है। फिल्म का भावनात्मक प्रभाव इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

ओमलो की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह किसी बड़े भाषण या उपदेश का सहारा नहीं लेती, बल्कि एक साधारण परिवार की कहानी के माध्यम से बड़े सामाजिक सवाल खड़े करती है।

यह फिल्म केवल राजस्थानी सिनेमा के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के लिए भी एक महत्वपूर्ण प्रयास कही जा सकती है। ओमलो मनोरंजन से अधिक संवेदनशील अनुभव प्रदान करती है और दर्शकों को अंत तक अपने साथ जोड़े रखने की क्षमता रखती है।

यह एक संवेदनशील, रोचक , भावनात्मक अनुभव देने वाली और मन को उद्वेलित कर देने वाली एक मस्ट वाच फिल्म है, जो लंबे समय तक दर्शकों के मन में अपनी छाप छोड़ेगी।

Created On :   3 July 2026 3:43 PM IST

Tags

Next Story