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अजय देवगन बनेंगे सैयद अब्दुल रहीम, बताएंगे भारतीय फुटबॉल की महान कहानी

July 14th, 2018 13:53 IST
अजय देवगन बनेंगे सैयद अब्दुल रहीम, बताएंगे भारतीय फुटबॉल की महान कहानी

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉलीवुड में इन दिनों बायोपिक की बहार आई हुई है। हर एक बड़ा स्टार और फिल्ममेकर गुजरे दौर के किस्सों और किरदारों को बड़े परदे पर उतारने को तैयार है। रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, दिलजीत दोसांझ और अक्षय कुमार के बाद अब अजय देवगन भी इसी लिस्ट में शामिल हो गए हैं। खबर है कि अजय जल्द ही इंडियन फुटबॉल टीम के कोच रहे सैयद अब्दुल रहीम पर बनने वाली बायोपिक में लीड रोल निभाते नजर आएंगे। गौरतलब है कि सैयद अब्दुल रहीम साल 1950 से 1963 तक भारत की फुटबॉल टीम के कोच और मैनेजर रहे थे। इस बायोपिक से जुड़ी एक तस्वीर रिलीज की गई है, जिसमें भारतीय टीम के खिलाड़ी बिना जूतों के फुटबॉल के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। साथ ही इस तस्वीर पर लिखा है, "भारतीय फुटबॉल के स्वर्ण युग की अनकही कहानी, जल्द ही एक फिल्म के रूप में।"

                      

जब भारत ने FIFA WORLD CUP के लिए किया था क्वालीफाई
फीफा वर्ल्ड कप का फाइनल कुछ ही घंटों में खेला जाना है और हमेशा की तरह भारतीय प्रशंसक इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि करोड़ों की आबादी वाले देश में फुटबॉल को खास तवज्जो नहीं मिलती है। ऐसे प्रशंसकों को सैयद अब्दुल रहीम की ये आने वाली बायोपिक राहत दे सकती है, क्योंकि इसमें भारतीय फुटबॉल के स्वर्ण युग की कहानी को दिखाया जाएगा। आमतौर पर माना जाता है कि 1950 से 1962 तक भारत में फुटबॉल का गोल्डन पीरियड रहा था। साल 1950 में हुए फीफा वर्ल्ड कप के लिए भारत की टीम क्वालिफाई भी कर चुकी थी, लेकिन कुछ वजहों से ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने टीम को वर्ल्ड कप नहीं भेजा। ये भी कहा जाता है कि AIFF उस दौर में FIFA वर्ल्ड कप से ज्यादा तरजीह ओलंपिक्स को देता था, जिसका बड़ा नुकसान भारतीय फुटबॉल को हुआ। 1950 से 1962 के दौरान भारत को एशिया की सबसे शक्तिशाली फुटबॉल टीम माना जाता था। इसी बीच भारत 1951 में हुए एशियन गेम्स में भी भारत ने जीत हासिल की थी। यहां तक की 1956 के ओलंपिक्स में भारत की टीम सेमीफाइनल तक पहुंची थी और ऐसा करने वाली वो पहली एशियाई टीम थी।

                      

बोनी कपूर और जी स्टूडियो मिलकर बनाएंगे ये बायोपिक फिल्म
सैयद अब्दुल रहीम की इस बायोपिक को जी स्टूडियो और बोनी कपूर मिलकर प्रोड्यूस कर रहे हैं। बोनी ने कहा कि, "मैं इस बात को सुनकर हैरान रह गया कि बहुत से लोगों को सैयद अब्दुल रहीम के बारे में मालूम नहीं है। एक ऐसे नायक जिनका ज्यादा बखान नहीं हुआ है, लेकिन उनकी उपलब्धियां सैल्यूट किए जाने लायक हैं। उनकी टीम में चुन्नी गोस्वामी, पीके बनर्जी, बलराम, फ्रैंको और अरुण घोष जैसे हीरो शामिल थे। सैयद अब्दुल रहीम जैसे किरदार को निभाने के लिए अजय देवगन जैसे ही अभिनेता ही जरूरत थी। मुझे उम्मीद है कि ये फिल्म भारत में युवाओं को फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित करेगी।"

                     

पहले भी बायोपिक कर चुके हैं अजय, बने थे सरदार भगत सिंह
वैसे अजय देवगन के लिए बायोपिक में काम करना कोई नई बात नहीं है। वो इससे पहले शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जिंदगी पर बनी फिल्म 'द लीजेंड ऑफ भगत सिंह' में टाइटल रोल निभा चुके हैं। उस दौर में सरदार भगत सिंह पर बनी तमाम फिल्मों के बीच में सिर्फ अजय की ही फिल्म को सराहा गया था और भगत सिंह का किरदार निभाने के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड से भी नवाजा गया था। फिलहाल सैयद अब्दुल रहीम की इस बायोपिक का टाइटल फाइनल नहीं हुआ है। इस फिल्म का डायरेक्शन अमित शर्मा करेंगे जो कि अर्जुन कपूर और सोनाक्षी सिन्हा स्टारर फिल्म "तेवर" को निर्देशित कर चुके हैं।  

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क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

डिजिटल डेस्क, श्रीनगरजम्मू कश्मीर की सीमा के आसपास ड्रोन की हलचलें लगातार तेज होती जा रही हैं। इसके बाद भारत ने भी ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है कि ड्रोन की इस तरह की गतिविधियां न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से घातक साबित हो सकती हैं। इस हमले के बाद से भारत में ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर बहस छिड़ गई है। इस रिपोर्ट में जानिए आखिर ड्रोन है क्या और यह कैसे ऑपरेट होते हैं? इसके इस्तेमाल और इससे क्या नुकसान हो सकता है और देश में ड्रोन्स को उड़ाने को लेकर सरकार की क्या गाइडलाइन्स हैं।

ड्रोन क्या होता है?
ड्रोन्स को UAV यानी Unmanned aerial vehicles या RPAS यानी Remotely Piloted Aerial Systems भी कहा जाता है। आम बोल चाल वाली भाषा में इसे मिनी हैलिकॉप्टर भी कहते हैं। अक्सर शादी के दौरान फोटोग्राफी के लिए आपने ड्रोन का इस्तेमाल होते हुए देखा होगा। यह एक ऐसा यंत्र है, जिसमें एचडी कैमरे, ऑनबोर्ड सेंसर और जीपीएस लगा होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए एक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। इसके चारों और 4 रोटर्स लगे होते हैं, जिनकी मदद से यह आसमान में ऊंचा उड़ने में सक्षम होता है। एक ड्रोन का वजन 250 ग्राम से लेकर 150 किलोग्राम से भी ज्यादा हो सकता है।

ड्रोन को उड़ाने के लिए सॉफ्टवेयर, जीपीएस और रिमोट की आवश्यकता होती है। रिमोट के जरिए ही ड्रोन को ऑपरेट और कंट्रोल कर सकते हैं। ड्रोन पर लगे रोटर्स की गति को रिमोट की जॉयस्टिक के जरिए कंट्रोल किया जाता है। वहीं, जीपीएस दिशाएं बताता हैं, जीपीएस दुर्घटना होने से पहले ही ऑपरेटर को चेतावनी भेज देता है। 

ड्रोन हमले किस तरह से हो सकते हैं?
ड्रोन का इस्तेमाल कई देशों की सेनाएं कर रही हैं, क्योंकि ये साइज में छोटे होते हैं इसलिए रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आ पाते हैं, साथ ही दुर्गम इलाकों में भी गुपचुप घुसपैठ कर सकते हैं। यही कारण है कि सेना में इनका इस्तेमाल बढ़ने लगा है।ड्रोन हमले दो प्रकार से संभव हैं। एक तरीका ये है कि ड्रोन में हथियार या विस्फोटक लगा दिए जाते हैं और ड्रोन इन हथियारों या विस्फोटक को लक्ष्य पर ड्रॉप कर देता है। ड्रोन से हमले का दूसरा तरीका है ड्रोन को खुद ही एक विस्फोटक में बदल दिया जाए। 

कितने घातक हो सकते हैं ड्रोन हमले?
ये ड्रोन के प्रकार और पेलोड पर निर्भर है। पेलोड मतलब ड्रोन कितना वजन अपने साथ लेकर उड़ सकता है। ड्रोन की पेलोड क्षमता जितनी ज्यादा होगी वो अपने साथ उतनी ज्यादा मात्रा में विस्फोटक सामग्री लेकर उड़ सकता है। अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन अपने साथ 1700 किलो तक वजन ले जाने में सक्षम हैं।

ड्रोन से अबतक के बड़े हमले
2020 में अमेरिका ने ईरानी मेजर जनरल सुलेमानी को मार गिराया था। इससे पहले 2019 में यमन के हूती विद्रोहियों ने साऊदी अरब की अरामको ऑयल कंपनी पर ड्रोन हमला किया था। पाकिस्तान के वजीरिस्तान में 2009 के दौरान एक ड्रोन हमले में 60 लोग मारे गए थे।

देश में ड्रोन्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन्स 
देश में नागरिक उड्डयन मंत्रालय(Ministry of Civil Aviation) ने ड्रोन उड़ाने पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। ड्रोन के वजन और साइज के अनुसार इन प्रतिबंधों को कई वर्ग में बांटा गया है।

1.नेनो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं पड़ती।

2.माइक्रो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए UAS Operator Permit-I से अनुमति लेनी पड़ती है और ड्रोन पायलट को SOP(Standard operating procedure) का पालन करना होता है। 

इनसे बड़े ड्रोन उड़ाने के लिए डीजीसीए से परमिट(लाइसेंस ) की आवश्यकता होती है। अगर आप किसी प्रतिबंधित जगह पर ड्रोन उड़ाना चाहते हैं तो इसके लिए भी आपको डीजीसीए से अनुमति लेनी पड़ेगी। बिना अनुमति के ड्रोन उड़ाना गैरकानूनी है और इसके लिए ड्रोन ऑपरेटर पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है।

ड्रोन उड़ाने के लिए प्रतिबंधित जगह

  • मिलिट्री एरिया के आसपास या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका।
  • इंटरनेशनल एयरपोर्ट के 5 किलोमीटर और नेशनल एयरपोर्ट के 3 किलोमीटर का दायरा।
  • इंटरनेशनल बॉर्डर के 25 किलोमीटर का दायरा ।
  • इसके अलावा ड्रोन की कैटेगरी को मद्देनजर रखते हुए इन्हें कितनी ऊंचाई तक उड़ाया जा सकता है वो भी निर्धारित है।

ड्रोन उड़ाने के लिए जरूरी हैं लाइसेंस
नैनो ड्रोन्स को छोडकर किसी भी तरह के ड्रोन्स को उड़ाने के लिए लाइसेंस या परमिट की जरूरत पड़ती है।ड्रोन उड़ाने के लिए लाइसेंस दो कैटेगरी के अंतर्गत दिए जाते हैं, जिसमें पहला है स्टूडेंट रिमोट पायलट लाइसेंस और दूसरा है रिमोट पायलट लाइसेंस।इन दोनों लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए ड्रोन ऑपरेटर की न्यूनतम उम्र 18 साल और अधिकतम 65 साल होनी चाहिए। लाइसेंस के लिए ऑपरेटर कम से कम 10वीं पास या 10वीं क्लास के बराबर उसके पास किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से डिग्री होना अति आवश्यक हैं।आवेदन करने वाले व्यक्ति को डीजीसीए स्पेसिफाइड मेडिकल एग्जामिनेशन भी पास करना जरूरी है। लाइसेंस के लिए बैकग्राउंड भी चेक होता है।

जुर्माने का प्रावधान

  • बिना लाइसेंस उड़ाने पर 25000 रुपए का जुर्माना।
  • नो-ऑपरेशन जोन यानी प्रतिबंधित क्षेत्र में उड़ान भरने पर 50000 रुपए का जुर्माना।
  • ड्रोन का थर्ड पार्टी बीमा ना होने पर 10000 रुपए का जुर्माना लग सकता है।