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बासु चटर्जी : आम जिंदगी के कहानीकार

June 04th, 2020 17:30 IST
 बासु चटर्जी : आम जिंदगी के कहानीकार

हाईलाइट

  • बासु चटर्जी : आम जिंदगी के कहानीकार

नई दिल्ली, 4 जून (आईएएनएस)। उस दौर की कहानियां आम इंसान की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसमें वास्तविकता को हंसी-मजाक के साथ पेश किया जाता था। इसमें छोटी-छोटी खुशियों व दुखों को बेहद ही सहजता के साथ दर्शकों के सामने लाया जाता था। बॉलीवुड में सत्तर व अस्सी के दशक में मुख्यधारा की फिल्मों में आमतौर पर इसी का चलन रहा है।

फिल्मों की यह शैली ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी और अमोल पालेकर के बिना अधूरी रह जाती।

कुछ समय पहले ऋषि दा के निधन के बाद, बॉलीवुड में इस दौर को बासु चटर्जी ने अपने अकेले के दम पर बरकरार रखा, लेकिन गुरुवार को उनके चले जाने के बाद इस शैली की फिल्मों ने भी अपना दम तोड़ दिया।

बासु चटर्जी ने गुरुवार को मुंबई में 93 वर्ष की आयु में अपनी आखिरी सांस ली। उम्र संबधी बीमारियों के चलते उनका निधन हुआ। यहां स्थित सांता क्रूज श्मशान घाट में दोपहर को उनका अंतिम संस्कार किया गया।

बासु ने अपनी फिल्मों में हीरो को एक आम इंसान के रूप में दिखाया, जो कि हम में से ही कोई एक रहा। अपनी फिल्मों में इंसान की तमाम भावनाओं को उन्होंने बड़ी ही सुगमता के साथ पेश किया। फिल्मों में उनकी कहानी एक आम इंसान की जिंदगी से हूबहू मिलती-जुलती थी।

अभिनेता अमोल पालेकर वह शख्स रहे हैं, जिन्होंने उनकी फिल्मों के किरदारों में जान डालने का बीड़ा उठाया और उन्होंने इस काम को सफलतापूर्वक अंजाम भी दिया। छोटी सी बात (1975), चितचोर (1976), रजनीगंधा (1974) और बातों बातों में (1979) कुछ ऐसी ही फिल्मों के उदाहरण हैं, जिसमें अमोल पालेकर मुख्य भूमिका में रहे हैं।

बासु चटर्जी पिया का घर (1972), खट्टा मीठा, चक्रव्यूह(1978), प्रियतमा (1977), मन पसंद, हमारी बहू अल्का, शौकीन (1982) और चमेली की शादी (1986) जैसी अपनी फिल्मों में कई इंसानी संवेदनाओं को हंसी के तड़के के साथ पेश किया।

अपने करियर में वह केवल बड़े पर्दे तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि छोटे पर्दे पर भी अभूतपूर्व काम किया।

इसमें कक्काजी कहिन (1998) शामिल है, जिसमें दिग्गज अभिनेता ओम पुरी मुख्य किरदार में रहे हैं। यह एक राजनीतिक व्यंग्य है, जो मशहूर लेखक मनोहर श्याम जोशी की किताब नेताजी कहिन पर आधारित थी। इसके अलावा दर्पण (1985), भीम भवानी (1990-1991) और बेहतरीन टीवी फिल्म एक रूका हुआ फैसला (1986) भी टेलीविजन पर उनकी सफल परियोजनाओं में शामिल रही है।

साल 1993 में ब्योमकेश बख्शी धारावाहिक के साथ उन्होंने टीवी पर अपना दबदबा काफी लंबे समय तक बनाए रखा। दर्शकों ने इसे काफी पसंद किया। साल 1997 में जब इसके दूसरे सीजन को पेश किया गया, तो उस वक्त भी यह काफी सफल रहा। आज भी इसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाता है और लोग इसके मुरीद हैं।

गुरुवार अपराह्न् दो बजे सांताक्रूज श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया। फिल्मकार अशोक पंडित ने उनके निधन की पुष्टि की, जो इंडियन फिल्म एंड टीवी डायरेक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं।

पंडित ने ट्वीट करते हुए कहा, दिग्गज फिल्मकार बासु चटर्जी के निधन के बारे में आप सभी को बेहद दुख के साथ सूचित कर रहा हूं। यह फिल्म उद्योग के लिए एक भारी क्षति है। आपकी याद आएगी सर।

उनके निधन की खबर से बॉलीवुड में शोक की लहर है।

फिल्मकार सुजॉय घोष ने लिखा, बासु चटर्जी चले गए। मेरे लिए वह कुछ ऐसे चुनिंदा लोगों में से हैं, जिनकी नजर हमेशा जिंदगी के एक अलग खुशनुमा पहलू पर रही है। उन्होंने हल्के मिजाज की कई असाधारण फिल्में दी हैं, जिसके चलते वह हमेशा याद किए जाएंगे। हैशटैगओमशांति।

उन्हें उनकी फिल्मों स्वामी (1978) और दुर्गा (1992) के लिए प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

साल 1997 में आई फिल्म गुदगुदी उनकी आखिरी फिल्म है, जिसमें अनुपम खेर और प्रतिभा सिन्हा जैसे कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में थे।

उनका जन्म 10 जनवरी, 1927 को राजस्थान के अजमेर में हुआ था। आखिरी वक्त में उनकी दो बेटियां उनके साथ थीं।

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क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

क्या है ड्रोन ? देश की सुरक्षा के लिए कितना घातक हो सकता है, जानें सबकुछ

डिजिटल डेस्क, श्रीनगरजम्मू कश्मीर की सीमा के आसपास ड्रोन की हलचलें लगातार तेज होती जा रही हैं। इसके बाद भारत ने भी ये मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है कि ड्रोन की इस तरह की गतिविधियां न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से घातक साबित हो सकती हैं। इस हमले के बाद से भारत में ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर बहस छिड़ गई है। इस रिपोर्ट में जानिए आखिर ड्रोन है क्या और यह कैसे ऑपरेट होते हैं? इसके इस्तेमाल और इससे क्या नुकसान हो सकता है और देश में ड्रोन्स को उड़ाने को लेकर सरकार की क्या गाइडलाइन्स हैं।

ड्रोन क्या होता है?
ड्रोन्स को UAV यानी Unmanned aerial vehicles या RPAS यानी Remotely Piloted Aerial Systems भी कहा जाता है। आम बोल चाल वाली भाषा में इसे मिनी हैलिकॉप्टर भी कहते हैं। अक्सर शादी के दौरान फोटोग्राफी के लिए आपने ड्रोन का इस्तेमाल होते हुए देखा होगा। यह एक ऐसा यंत्र है, जिसमें एचडी कैमरे, ऑनबोर्ड सेंसर और जीपीएस लगा होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए एक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। इसके चारों और 4 रोटर्स लगे होते हैं, जिनकी मदद से यह आसमान में ऊंचा उड़ने में सक्षम होता है। एक ड्रोन का वजन 250 ग्राम से लेकर 150 किलोग्राम से भी ज्यादा हो सकता है।

ड्रोन को उड़ाने के लिए सॉफ्टवेयर, जीपीएस और रिमोट की आवश्यकता होती है। रिमोट के जरिए ही ड्रोन को ऑपरेट और कंट्रोल कर सकते हैं। ड्रोन पर लगे रोटर्स की गति को रिमोट की जॉयस्टिक के जरिए कंट्रोल किया जाता है। वहीं, जीपीएस दिशाएं बताता हैं, जीपीएस दुर्घटना होने से पहले ही ऑपरेटर को चेतावनी भेज देता है। 

ड्रोन हमले किस तरह से हो सकते हैं?
ड्रोन का इस्तेमाल कई देशों की सेनाएं कर रही हैं, क्योंकि ये साइज में छोटे होते हैं इसलिए रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आ पाते हैं, साथ ही दुर्गम इलाकों में भी गुपचुप घुसपैठ कर सकते हैं। यही कारण है कि सेना में इनका इस्तेमाल बढ़ने लगा है।ड्रोन हमले दो प्रकार से संभव हैं। एक तरीका ये है कि ड्रोन में हथियार या विस्फोटक लगा दिए जाते हैं और ड्रोन इन हथियारों या विस्फोटक को लक्ष्य पर ड्रॉप कर देता है। ड्रोन से हमले का दूसरा तरीका है ड्रोन को खुद ही एक विस्फोटक में बदल दिया जाए। 

कितने घातक हो सकते हैं ड्रोन हमले?
ये ड्रोन के प्रकार और पेलोड पर निर्भर है। पेलोड मतलब ड्रोन कितना वजन अपने साथ लेकर उड़ सकता है। ड्रोन की पेलोड क्षमता जितनी ज्यादा होगी वो अपने साथ उतनी ज्यादा मात्रा में विस्फोटक सामग्री लेकर उड़ सकता है। अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन अपने साथ 1700 किलो तक वजन ले जाने में सक्षम हैं।

ड्रोन से अबतक के बड़े हमले
2020 में अमेरिका ने ईरानी मेजर जनरल सुलेमानी को मार गिराया था। इससे पहले 2019 में यमन के हूती विद्रोहियों ने साऊदी अरब की अरामको ऑयल कंपनी पर ड्रोन हमला किया था। पाकिस्तान के वजीरिस्तान में 2009 के दौरान एक ड्रोन हमले में 60 लोग मारे गए थे।

देश में ड्रोन्स के इस्तेमाल को लेकर गाइडलाइन्स 
देश में नागरिक उड्डयन मंत्रालय(Ministry of Civil Aviation) ने ड्रोन उड़ाने पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। ड्रोन के वजन और साइज के अनुसार इन प्रतिबंधों को कई वर्ग में बांटा गया है।

1.नेनो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं पड़ती।

2.माइक्रो ड्रोन्स- इसको उड़ाने के लिए UAS Operator Permit-I से अनुमति लेनी पड़ती है और ड्रोन पायलट को SOP(Standard operating procedure) का पालन करना होता है। 

इनसे बड़े ड्रोन उड़ाने के लिए डीजीसीए से परमिट(लाइसेंस ) की आवश्यकता होती है। अगर आप किसी प्रतिबंधित जगह पर ड्रोन उड़ाना चाहते हैं तो इसके लिए भी आपको डीजीसीए से अनुमति लेनी पड़ेगी। बिना अनुमति के ड्रोन उड़ाना गैरकानूनी है और इसके लिए ड्रोन ऑपरेटर पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है।

ड्रोन उड़ाने के लिए प्रतिबंधित जगह

  • मिलिट्री एरिया के आसपास या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका।
  • इंटरनेशनल एयरपोर्ट के 5 किलोमीटर और नेशनल एयरपोर्ट के 3 किलोमीटर का दायरा।
  • इंटरनेशनल बॉर्डर के 25 किलोमीटर का दायरा ।
  • इसके अलावा ड्रोन की कैटेगरी को मद्देनजर रखते हुए इन्हें कितनी ऊंचाई तक उड़ाया जा सकता है वो भी निर्धारित है।

ड्रोन उड़ाने के लिए जरूरी हैं लाइसेंस
नैनो ड्रोन्स को छोडकर किसी भी तरह के ड्रोन्स को उड़ाने के लिए लाइसेंस या परमिट की जरूरत पड़ती है।ड्रोन उड़ाने के लिए लाइसेंस दो कैटेगरी के अंतर्गत दिए जाते हैं, जिसमें पहला है स्टूडेंट रिमोट पायलट लाइसेंस और दूसरा है रिमोट पायलट लाइसेंस।इन दोनों लाइसेंस को प्राप्त करने के लिए ड्रोन ऑपरेटर की न्यूनतम उम्र 18 साल और अधिकतम 65 साल होनी चाहिए। लाइसेंस के लिए ऑपरेटर कम से कम 10वीं पास या 10वीं क्लास के बराबर उसके पास किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से डिग्री होना अति आवश्यक हैं।आवेदन करने वाले व्यक्ति को डीजीसीए स्पेसिफाइड मेडिकल एग्जामिनेशन भी पास करना जरूरी है। लाइसेंस के लिए बैकग्राउंड भी चेक होता है।

जुर्माने का प्रावधान

  • बिना लाइसेंस उड़ाने पर 25000 रुपए का जुर्माना।
  • नो-ऑपरेशन जोन यानी प्रतिबंधित क्षेत्र में उड़ान भरने पर 50000 रुपए का जुर्माना।
  • ड्रोन का थर्ड पार्टी बीमा ना होने पर 10000 रुपए का जुर्माना लग सकता है।