FCRA Bill Controversy Explainer: विदेशी चंदे के नियमों को लेकर भारत से लेकर अमेरिका तक मचा बवाल, जानें क्या है FCRA बिल, जिसने दुनियाभर में मचाई हलचल!

विदेशी चंदे के नियमों को लेकर भारत से लेकर अमेरिका तक मचा बवाल, जानें क्या है FCRA बिल, जिसने दुनियाभर में मचाई हलचल!
एफसीआरए संशोधन बिल एक सामान्य विधेयक है, जिसको लेकर दुनियाभर में बवाल मचा हुआ है। इस बिल को पास करने के लिए सदन में मौजूद वोट करने वाले सदस्यों का सिर्फ साधारण बहुमत ही चाहिए होगा।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विदेश से मिलने वाली फंडिंग को लेकर केंद्र सरकार नया कानून लाने की तैयारी में लगी हुई है। इस प्रस्तावित बदलाव को लेकर राजनीतिक दलों, कई सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं के बीच हलचल मची हुई है। मामला संसद तक पहुंच चुका है और तो और अब विदेशों में भी इसकी चर्चा हो रही है। कुछ अमेरिका के नेताओं ने भी इस बिल पर अपनी राय रखी है, जिसके बाद यह मुद्दा और भी ज्यादा चर्चा का विषय बन गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विदेशी चंदे से संबंधित यह कानून आखिर क्या है, सरकार इसमें क्या बदलाव करना चाहती है, विरोध क्यों हो रहा है और इसका असर किन लोगों पर पड़ सकता है।

क्या है FCRA बिल?

विदेशी फंडिंग की निगरानी के लिए यह कानून कई साल पहले बनाया गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाहर से आने वाला पैसा सही काम में खर्च हो और उसके जरिए देश के अंदर किसी तरह का गलत असर न डाला जा सके। इस कानून के तहत यह तय किया जाता है कि कौन-सी संस्था विदेश से पैसा ले सकती है और उसका इस्तेमाल कहां और किस काम में होगा, इसका पूरा हिसाब रखना भी जरूरी होता है। अगर किसी संस्था की गतिविधियां देश की सुरक्षा, कानून व्यवस्था या राष्ट्रीय हित के खिलाफ मानी जाती हैं, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। समय-समय पर इस कानून में बदलाव होते रहे हैं जिससे विदेशी धन के इस्तेमाल पर नजर रखी जा सके और मजबूत बनाई जा सके।

इस बार क्या नए बदलाव प्रस्तावित हैं?

सरकार अब बिल में कई और नए नियम जोड़ना चाहती है। प्रस्ताव के मुताबिक, विदेशी फंडिंग लेने वाली हर संस्था को पहले से बताना होगा कि पैसा किस उद्देश्य के लिए लिया जा रहा है और किस राज्य या क्षेत्र में उसका उपयोग किया जाएगा। अगर किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाए, रद्द हो जाए या समय पर रीन्यू ना कराया जाए, तो उसकी विदेशी धन से बनी संपत्तियों की जिम्मेदारी एक तय सरकारी अथॉरिटी के पास चली जाएगी। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि अगर तय समय तक रजिस्ट्रेशन का रेनोवेशन नहीं कराया गया, तो रजिस्ट्रेशन अपने आप खत्म माना जाएगा। ऐसी स्थिति में विदेशी फंड से खरीदी गई या बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन वही सरकारी अथॉरिटी करेगी। इसके अलावा संस्थाओं को हर साल अपने विदेशी खाते से एक तय न्यूनतम राशि खर्च करनी होगी। नियम तोड़ने पर अधिकतम सजा अवधि को कम करने का भी प्रस्ताव रखा जाएगा। सरकार ने यह साफ तौर पर कहा है कि अगर किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति पर कार्रवाई की जाती है, तब भी उसका धार्मिक स्वरूप नहीं बदला जाएगा। इसका मतलब है कि मंदिर, मस्जिद, चर्च या दूसरे पूजा स्थल पहले की ही तरह बने रहेंगे।

सबसे ज्यादा विवाद किस पर हो रहा है?

बता दें, विरोध करने वालों की सबसे बड़ी चिंता संपत्ति से जुड़े हुए नए प्रावधान को लेकर है। जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि अगर किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन किसी दिक्कत की वजह से या देरी के कारण खत्म होता है, तो उसकी विदेशी धन से बनी इमारतें, स्कूल, हॉस्पिटल या दूसरी संपत्ति सरकारी कंट्रोंल में जा सकती हैं। आलोचकों का यह कहना है कि इससे कई संस्थाओं को परेशानी हो सकती है और उनका मानना है कि सिर्फ कागज की प्रक्रिया पूरी ना होने से बड़ी संपत्तियों का कंट्रोल बदलना बिल्कुल भी सही नहीं है।

धार्मिक संस्थाओं को क्यों हो रही है चिंता?

देश के कई राज्यों में धार्मिक और सेवा कार्य करने वाली संस्थाएं लंबे वक्त से विदेश की सहायता के सहारे स्कूल, हॉस्पिटल और दूसरे सामाजिक काम कर रही हैं। उनको डर है कि अगर किसी भी कारण से उनका रजिस्ट्रेशन समय पर रिन्यू नहीं हुआ तो उनकी संपत्ति पर असर पड़ सकता है। कुछ नेताओं का तो यह भी दावा है कि पहले से लागू सख्त नियमों के कारण विदेश की आर्थिक सहायता में कमी आई है। उनका कहना है कि संस्थाएं पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रही हैं और नए नियम लागू होने पर स्थिति और भी ज्यादा मुश्किल हो सकती है।

अमेरिका ने भी संशोधन पर दी प्रतिक्रिया

इस प्रस्ताविद बदलाव पर अमेरिका ने भी प्रतिक्रिया दी है। अमेरिका के सांसद ने भी इस पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि धार्मिक संस्थाओं को लेकर चिंता पैदा हो सकती है और यह मामला दोनों देशों के संबंधों पर भी असर डाल सकता है। उनके बयान के बाद इस पर अंतर्राष्ट्रीय चर्चा भी शुरू हो गई है। कई जानकारों ने यह भी कहा है कि जब दूसरे देशों में विदेश धन को लेकर सख्त नियम लागू हैं, तो भारत के मामले पर भी अलग प्रतिक्रियाएं क्यों दी जा रही हैं।

बिल पर सरकार का क्या है कहना?

इस बिल को लेकर सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि यह कानून किसी भी धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं लाया जा रहा है। सरकार ने कहा है कि इसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ विदेशी धन के इस्तेमाल को नियमों के दायरे में रखना है। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि धार्मिक स्थलों का स्वरूप नहीं बदलेगा और प्रस्तावित नियम पुराने मामलों पर लागू नहीं होंगे। साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन दोबारा बहाल हो जाता है, तो कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

संसद में आगे क्या होगा?

इस प्रस्ताव पर संसद में चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल कई प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं और कुछ धार्मिक संगठनों ने भी बदलाव की मांग की है। कुछ नेताओं का कहना है कि इस प्रस्ताव को पहले किसी संसदीय समिति के पास भेजा जाना चाहिए, जिससे सभी पक्षों की राय ली जा सके। दूसरी ओर सरकार के पास दोनों सदनों में पर्याप्त समर्थन मौजूद है। इसलिए अगर विधेयक चर्चा के लिए आता है और मतदान होता है, तो उसके पारित होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

आम लोगों पर कितना असर पड़ेगा?

जानकारों का मानना है कि इस कानून का सीधा असर आम नागरिकों पर नहीं पड़ेगा। इसका दायरा सिर्फ उन संस्थाओं तक सीमित है जो विदेश से आर्थिक सहायता लेती हैं। अगर नए नियम लागू होते हैं, तो सबसे ज्यादा असर ऐसे ट्रस्ट, सेवा संस्थानों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ सकता है, जो अपने कामकाज के लिए विदेशी धन पर निर्भर हैं। फिलहाल यह प्रस्ताव अभी कानून नहीं बना है। संसद में चर्चा और मतदान के बाद ही इसका फैसला होगा।

Created On :   7 Aug 2026 7:13 PM IST

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