राहत : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- 96.8 प्रतिशत वयस्कों को मिली कोविड वैक्सीन की पहली खुराक

March 2nd, 2022

हाईलाइट

  • मामले में सुनवाई अगले हफ्ते भी जारी रहेगी

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केंद्र ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि भारत की 96.8 प्रतिशत वयस्क आबादी को कोविड के टीके की पहली खुराक और 81.3 प्रतिशत को दूसरी खुराक दी जा चुकी है।

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की पीठ को बताया कि कुल 177,50,86,335 (177.5 करोड़) टीके लगाए जा चुके हैं।

वयस्क आबादी में, 96.8 प्रतिशत आबादी (90,92,27,350) को पहली खुराक से कवर किया गया है और 81.3 प्रतिशत आबादी (76,35,65,779) को दूसरी खुराक के साथ कवर किया गया है।

15-18 वर्ष की आयु के बीच की आबादी को देखा जाए तो इस आयु वर्ग में 74 प्रतिशत (5,47,94,459) को पहली खुराक और 37.1 प्रतिशत (2,74,87,370) को दूसरी खुराक के साथ कवर किया गया है। वयस्क आबादी को एहतियाती खुराक (बूस्टर डोज) की संख्या 2,00,11,377 तक पहुंच चुकी है। ये आंकड़े 28 फरवरी को एकत्रित आंकड़ों पर आधारित हैं।

शीर्ष अदालत विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए वैक्सीन जनादेश को चुनौती देने वाली जैकब पुलियेल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में वैक्सीन के बाद प्रतिकूल घटनाओं के संबंध में आंकड़ों का खुलासा करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह के पूर्व सदस्य पुलियेल का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि टीका नहीं लेने के किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार को केवल यह कहकर सरकार द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता है कि टीका नहीं लेने वाला व्यक्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक स्पष्ट खतरा पैदा करेगा।

भूषण ने कहा, यहां तक कि, मुझे भी कोविड था। लेकिन, मैंने टीका नहीं लिया है। मैंने वैक्सीन नहीं लेने का फैसला किया है, चाहे कुछ भी हो जाए।

उन्होंने जोर देकर कहा कि कोविड टीकाकरण के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में पता नहीं है और सवाल किया कि सरकार टीकाकरण को अनिवार्य बनाकर लोगों को सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश करने से रोकने के लिए वैक्सीन जनादेश क्यों जारी कर रही है। भूषण ने कहा, यदि कोई व्यक्ति कोविड से संक्रमित था (और ठीक हो गया), तो उस व्यक्ति को संक्रमण के खिलाफ बेहतर प्राकृतिक प्रतिरक्षा मिलती है।

इस पर जस्टिस गवई ने कहा, क्या हम इस क्षेत्र में जा सकते हैं। हमारे पास बुनियादी ज्ञान नहीं है।

पीठ ने भूषण को याद दिलाया कि याचिका में सवाल है कि क्या राज्य सरकारें टीकाकरण के संबंध में ऐसे फैसले ले सकती हैं। इसमें कहा गया है कि विज्ञान राय का विषय है और भूषण ने भले ही एक राय प्रस्तुत की हो, लेकिन उनका विरोध किया जा सकता है।

पीठ ने कहा, आपकी राय दूसरों द्वारा साझा नहीं की जा सकती है।

न्यायमूर्ति राव ने दोहराया, हम चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ नहीं हैं। हमें वैज्ञानिक मुद्दों में गहराई से लेकर न जाएं।

भूषण ने कहा कि लोगों को उन टीकों को लेने के लिए बाध्य किया जा रहा है, जिनके चरण 3 के परीक्षण के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं और दवा नियंत्रण प्राधिकरण को प्रस्तुत सामग्री भी जनता के सामने प्रस्तुत नहीं की जाती है। उन्होंने कहा, सूचित सहमति का सवाल कहां है?

भूषण ने पूछा, सिर्फ इसलिए कि जिस कंपनी ने नियामक को डेटा जमा किया था, वह डेटा का खुलासा नहीं करने के लिए कहती है, इसका खुलासा नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य पर टीकाकरण के दीर्घकालिक प्रभावों पर कोई अध्ययन नहीं किया गया है और बताया कि बाल देखभाल संस्थानों के लिए टीके अनिवार्य किए जा रहे हैं और आईसीएसई बोर्ड ने बच्चों के लिए परीक्षा में बैठना अनिवार्य कर दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालत को इस तरह के किसी भी मनमाने निर्देश पर न्यायिक समीक्षा की अपनी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए और इस तरह के वैक्सीन जनादेश को रद्द करना चाहिए।

दलीलों को समाप्त करते हुए, भूषण ने कहा कि याचिका में तीन प्रार्थनाएं हैं: एक वैक्सीन जनादेश पर, नैदानिक परीक्षणों पर डेटा के साझा किए जाने पर और प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट करने के लिए प्रणाली को सुधारने की आवश्यकता पर।

भाटी ने प्रस्तुत किया कि केंद्र ने टीकाकरण अनिवार्य नहीं करने का निर्णय लिया है।

मामले में सुनवाई अगले हफ्ते भी जारी रहेगी।

31 जनवरी को, केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि टीकाकरण न होने के कारण किसी की नौकरी नहीं जा रही है।

(आईएएनएस)