दैनिक भास्कर हिंदी: नागरिकता संशोधन बिल बना कानून, राष्ट्रपति कोविंद की मिली मंजूरी

December 13th, 2019

हाईलाइट

  • नागरिकता संशोधन बिल अब कानून बन गया है
  • गुरुवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस बिल को मंजूरी दी
  • इससे पहले बुधवार को राज्यसभा से इस बिल को पास किया गया था

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नागरिकता संशोधन बिल अब कानून बन गया है। गुरुवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस बिल को मंजूरी दी। इससे पहले बुधवार को राज्यसभा से इस बिल को पास किया गया था। बिल के पक्ष में 125 जबकि विरोध में 105 वोट पड़े। लोकसभा में बिल के पक्ष में वोटिंग करने वाली शिवसेना ने राज्यसभा में वॉकआउट किया और वोटिंग में शामिल नहीं हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिल के पास होने के बाद खुशी जताते हुए इसे ऐतिहासिक दिन बताया था। पीएम मोदी ने कहा था, 'भारत और हमारे देश के लिए करुणा और भाईचारे के लिए एक ऐतिहासिक दिन! खुशी है कि राज्यसभा में नागरिकता संशोधन बिल 2019 पास किया गया। सभी सांसदों का आभार जिन्होंने विधेयक के पक्ष में मतदान किया। यह विधेयक कई लोगों की पीड़ा को दूर करेगा जिन्होंने वर्षों तक उत्पीड़न का सामना किया।'

इस बिल पर राज्यसभा में चर्चा के बाद जवाब देते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था, 'ये बिल कभी न लाना पड़ता, ये कभी संसद में न आता, अगर भारत का बंटवारा न हुआ होता। बंटवारे के बाद जो परिस्थितियां आईं, उनके समाधान के लिए मैं ये बिल आज लाया हूं। पिछली सरकारें समाधान लाईं होती तो भी ये बिल न लाना होता।' 

शाह ने कहा था 'नेहरू-लियाकत समझौते के तहत दोनों पक्षों ने स्वीकृति दी कि अल्पसंख्यक समाज के लोगों को बहुसंख्यकों की तरह समानता दी जाएगी, उनके व्यवसाय, अभिव्यक्ति और पूजा करने की आजादी भी सुनिश्चित की जाएगी, ये वादा अल्पसंख्यकों के साथ किया गया। लेकिन, वहां लोगों को चुनाव लड़ने से भी रोका गया, उनकी संख्या लगातार कम होती रही। जबकि यहां राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, चीफ जस्टिस जैसे कई उच्च पदों पर अल्पसंख्यक रहे। यहां अल्पसंख्यकों का संरक्षण हुआ।'

बता दें कि इस कानून के जरिए पड़ोसी तीनों देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता मिल सकेगी। इन लोगों को नागरिकता के लिए भारत में कम से कम 6 साल बिताने होंगे। पहले नागरिकता देने का पैमाना 11 साल से अधिक था। पूर्वोत्तर के राज्यों में इस बिल का जमकर विरोध देखने को मिल रहा है।