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पिता अपराजित रहे, ज्योतिरादित्य ने सीट गंवाई

पिता अपराजित रहे, ज्योतिरादित्य ने सीट गंवाई

हाईलाइट

  • सिंधिया राजवंश के प्रभाव का क्षेत्र है गुना
  • मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य की दादी और पिता कभी चुनाव नहीं हारे
  • चार बार से लगातार जीत रहे थे ज्योतिरादित्य सिंधिया

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मप्र का सिंधिया राजवंश भले ही वो हिंदू महासभा, जनसंघ, भाजपा या कांग्रेस में रहा हो, यहां अपराजेय रहा है। 2019 में भाजपा की सुनामी ने इस राजवंश के महाराज को शिकस्त दे दी है। गुना से भाजपा प्रत्याशी केपी यादव ने कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को 1 लाख 25 हजार 549 मतों से हरा दिया है। देश में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बाद कांग्रेस के पास कोई युवा चेहरा नजर आता है तो वह ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। उनके समर्थकों के अलावा उनके पूर्व राजवंश के क्षेत्र में सिंधिया को महाराज कहा जाता है। भाजपा उन पर सामंतशाही के आरोप लगाती रही है। सिंधिया इतनी आसानी से हार जाएंगे, यह खुद भाजपा ने नहीं सोचा था। यही वजह रही कि कभी सिंधिया के समर्थक रहे केपी यादव को ही भाजपा ने उम्मीदवार बनाकर उनके सामने खड़ा कर दिया।

इस बीच यह ध्यान देने वाली बात है कि 2019 सिंधिया पर भारी पड़ा है। ग्वालियर-चंबल से विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बढ़त दिलाने वाले सिंधिया पहले तो मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। राहुल गांधी ने उन्हें पार्टी का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश के एक अंचल की जिम्मेदारी दी। सिंधिया अपनी सीट के साथ उप्र में भी सक्रिय रहे। अपनी सीट गुना पर उन्होंने इस बार पत्नी प्रियदर्शनी राजे और बेटे आर्यमन सिंधिया को भी चुनाव मैदान में सक्रिय किया। इस सबका कोई असर नहीं हुआ। मोदी फैक्टर के अलावा क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता उन्हें भारी पड़ी है। साथ ही यह बात भी साबित हुई है कि आजादी के बाद सात दशकों में जनता की सोच बदली है और वह व्यतिगत प्रभाव को छोड़कर बाकी मुद्दों को भी ध्यान में रखकर वोट कर रही है। 

बात सिंधिया परिवार की करें तो उनकी दादी विजयराजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा से ग्वालियर, गुना और विदिशा से चुनाव जीती हैं। उन्हें मप्र में कभी हार का सामना नहीं करना पड़ा। उनकी दादी को 1980 में भाजपा ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ मैदान में उतारा था, जहां से उन्हें हार का सामना करना पडा। यह मप्र के बाहर की बात थी। ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया भी अजेय रहे और 1984 में भाजपा के अटलबिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज को ग्वालियर से हराकर देश में छा गए थे। वे कभी चुनाव नहीं हारे। हालांकि 1998 के लोकसभा चुनाव में ग्वालियर में भाजपा के जयभान सिंह पवैया से वो बहुत मामूली अंतर से जीत पाए। इस कारण वे वापस उस गुना सीट पर आए, जहां से वे पहली बार 1971 में जनसंघ के टिकट पर जीते थे। इस सीट से उनकी मां राजमाता सिंधिया भी सांसद रहीं। उन्होंने 1999 का चुनाव भी जीता। 1971 में पहली बार माधवराव जनसंघ के टिकट पर सांसद बने थे, बाद में 1977 का चुनाव वो ​निर्दलीय के रूप में जीते और 1980 में कांग्रेस के टिकट पर जीते थे।

माधवराव सिंधिया के निधन के बाद 2002 में हुए उपचुनाव से ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार जीतते रहे। सिंधिया परिवार में ज्योतिरादित्य की दादी, पिता और वे खुद अभी तक चुनाव नहीं हारे थे। ये बात अलग है कि उनकी बुआ वसुंधरा राजे 1984 की सहानुभूति लहर में भिंड से भाजपा के टिकट पर चुनाव हार गईं थी, जबकि उसी वक्त ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ग्वालियर से अटलजी को हराकर राष्ट्रीय परिदृश्य पर छा गए थे। उनकी एक और बुआ यशोधरा राजे और बुआ वसुंधरा के बेटे दुष्यंत भी कभी चुनाव नहीं हारे हैं। 

ये बनी हार की वजह 
मप्र में कांग्रेस के लिए सिंधिया की हार चौंकाने वाली है। कांग्रेस छिंदवाड़ा और गुना को जीता हुआ मान रही थी। सिंधिया न केवल मप्र में बल्कि राहुल गांधी की टीम में बडे नेता हैं। वे प्रदेश और देश की राजनीति के चक्कर में गुना से दूर रहे। उनकी निष्क्रियता हार का बड़ा कारण है। दूसरा, भाजपा ने यहां सोशल इंजीनियरिंग की है। सिंधिया की हार भाजपा की कोई विशेष मेहनत का नतीजा नहीं है। यहां 15 साल की भाजपा सरकार में पार्टी कोई बड़ा नेता तैयार नहीं कर पाई। कांग्रेस से आए केपी यादव को मौका इसलिए मिला कि वहां यादव मतदाता अधिक हैं। यादव वोटर जो कांग्रेस के पक्ष में मतदान करते रहे हैं, वे इस बार भाजपा के साथ आ गए। दूसरा सिंधिया ने अपने भाषणों में सड़क निर्माण को लेकर जो बातें की उससे जाहिर हुआ कि उन्हें क्षेत्र का भौगालिक ज्ञान नहीं है। दूसरा आम जनता और कार्यकर्ताओं की उनसे दूरी भी हार का बड़ा कारण बनी है।
 

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